'हनीमून मर्डर' केस | सोनम रघुवंशी को मिली जमानत, गिरफ्तारी के कारणों की ठीक से जानकारी न देना बना आधार

Update: 2026-04-28 14:54 GMT

मेघालय के शिलांग कोर्ट ने सोनम रघुवंशी को जमानत दी। सोनम मई 2025 में मेघालय में अपने पति (राजा रघुवंशी) के 'हनीमून मर्डर' की मुख्य संदिग्ध है। अदालत ने जमानत इस आधार पर दी कि पुलिस उसे उसकी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में ठीक से जानकारी देने में नाकाम रही थी, जिससे उसके बचाव पक्ष को नुकसान हुआ।

शिलांग की अतिरिक्त उपायुक्त (न्यायिक), दशालिन आर खारबतेंग ने उसकी चौथी जमानत याचिका पर उसे जमानत दी। उन्होंने पाया कि उसे दिए गए "गिरफ्तारी के कारणों की सूचना" वाले फॉर्म में कुछ चेकबॉक्स खाली (बिना टिक किए हुए) थे। उसमें BNS की एक गलत कानूनी धारा का भी ज़िक्र था।

अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि जब याचिकाकर्ता को पहली बार गाजीपुर कोर्ट में पेश किया गया (9 जून, 2025 को), तब उसकी तरफ से कोई वकील मौजूद था। अगर वकील होता तो वह (गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी न दिए जाने वाली) यह दलील उसी समय उठा सकती थी।

इसलिए 'विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और अन्य' (2025 LiveLaw (SC) 169) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए शिलांग कोर्ट ने सोनम को 50,000 रुपये का निजी मुचलका भरने और कुछ अन्य शर्तों को मानने पर जमानत दी।

बता दें, 'विहान कुमार' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि भले ही गिरफ्तारी पर कोई कानूनी रोक लगी हो, लेकिन अगर भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 (1) का उल्लंघन होता है तो गिरफ्तारी को रद्द माना जा सकता है और जमानत दी जा सकती है। अनुच्छेद 22 (1) के तहत यह अनिवार्य है कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में जानकारी दी जाए।

संक्षेप में मामला

संक्षेप में कहें तो याचिकाकर्ता (सोनम) जून 2025 में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से अपने पति की हत्या के मामले में गिरफ्तार होने के बाद से पिछले 10 महीनों से भी ज़्यादा समय से जेल में बंद है। उल्लेखनीय है कि जहां एक ओर उसके खिलाफ BNS की धारा 103(1), 238(a), 309(6) और 3(6) के तहत FIR दर्ज की गई, वहीं उसे दिए गए अरेस्ट मेमो और अन्य सभी पुलिस दस्तावेजों में गलती से धारा 103(1) [हत्या] के बजाय धारा 403(1) [संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग] का उल्लेख किया गया।

दी गई दलीलें

इस मामले में जमानत की मांग करते हुए उसके वकील ने दलील दी कि मुकदमा 2 महीने से अधिक समय से रुका हुआ है और वह भी बिना उसकी किसी गलती के। यह तर्क दिया गया कि बिना मुकदमे के उसे अनिश्चित काल तक दोषसिद्धि-पूर्व हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

महत्वपूर्ण बात यह है कि उसके वकील ने तर्क दिया कि उसकी गिरफ्तारी के समय पुलिस अधिकारियों ने उसे गिरफ्तारी के आधार बताने की अनिवार्य आवश्यकता का पालन नहीं किया, जैसा कि कानून द्वारा अनिवार्य है। इस प्रकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन किया।

दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधारों की सूचना न दिए जाने के संबंध में दी गई दलील बहुत देर से दी गई, क्योंकि आरोप पहले ही तय किए जा चुके थे। यह तर्क दिया गया कि यह दलील सबसे पहले ही उठाई जानी चाहिए थी, न कि अब।

यह भी तर्क दिया गया कि अरेस्ट मेमो और गिरफ्तारी के आधारों की सूचना पर उसके और गवाहों द्वारा विधिवत हस्ताक्षर किए गए। यह मानने का पर्याप्त आधार था कि आरोपी को गिरफ्तारी के आधारों के बारे में सूचित किया गया।

आगे यह भी जोड़ा गया कि चेक बॉक्स पर निशान न लगाना केवल प्रक्रियात्मक अनियमितता है, विशेष रूप से तब जब उसके खिलाफ आरोप पहले ही तय किए जा चुके हों।

अदालत की टिप्पणियां

दोनों पक्षकारों की दलीलों पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता से संबंधित सभी दस्तावेजों में—जिसमें गिरफ्तारी के औचित्य के लिए चेकलिस्ट के साथ-साथ केस डायरी का सारांश भी शामिल है—पुलिस ने गलती से BNS की धारा 403(1) का उल्लेख किया।

अदालत ने पाया कि किसी भी दस्तावेज में याचिकाकर्ता को यह सूचित नहीं किया गया कि उसे वास्तव में BNS की धारा 103(1) के तहत एक कहीं अधिक गंभीर अपराध के लिए गिरफ्तार किया जा रहा है। अदालत ने आगे इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि यह केवल एक लिपिकीय त्रुटि थी।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...ऐसी गलती सभी दस्तावेज़ों में नहीं हो सकती। असल में, सोनम रघुवंशी से जुड़े सभी दस्तावेज़ों में—गिरफ्तारी के औचित्य की चेक लिस्ट से लेकर गिरफ्तारी मेमो, निरीक्षण मेमो, गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों की सूचना, केस डायरी का अंश तक—सभी दस्तावेज़ों में जिन धाराओं का ज़िक्र है, वे हैं सोहरा PS केस नंबर 7/2025 u/s 403(1)/238(a)/309(6)/3(6) BNS। किसी भी दस्तावेज़ में याचिकाकर्ता को यह सूचित नहीं किया गया कि उसे u/s 103(1) BNS के तहत अपराध के लिए गिरफ्तार किया गया। यहां तक कि गिरफ्तारी के आधारों की सूचना के प्रारूपों में भी यह देखा गया है कि अपराध से जुड़े विशिष्ट तथ्य आरोपी व्यक्ति को नहीं बताए गए।"

इस पृष्ठभूमि में, यह पाते हुए कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप उसे प्रभावी ढंग से नहीं बताए गए और उसे नुकसान पहुंचा था, कोर्ट ने उसे ज़मानत देना उचित समझा।

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