महिला और नाबालिग से मारपीट, घर में जबरन घुसने के आरोप; अदालत ने चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का दिया आदेश
मध्य प्रदेश के दतिया में एक न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश देते हुए कहा कि बिना वारंट किसी के घर में घुसना, महिलाओं और एक नाबालिग बच्चे के साथ मारपीट करना तथा निजी स्वतंत्रता का हनन करना किसी भी स्थिति में सरकारी कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन बताया।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी विजिताश्व पुष्कर ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 156(3) के तहत दायर आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
अदालत ने संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 452, 323 और 34 के तहत FIR दर्ज कर निष्पक्ष और गहन जांच करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा,
"बिना वारंट किसी निजी आवास में जबरन प्रवेश करना तथा महिलाओं और नाबालिग बच्चे को चोट पहुंचाना ऐसे कृत्य हैं, जिनका पुलिस शक्तियों के वैध प्रयोग से कोई तार्किक या उचित संबंध नहीं है। ये सरकारी अधिकार के तहत किए गए कार्य नहीं, बल्कि कानून और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन हैं।"
क्या हैं आरोप
शिकायतकर्ता के अनुसार 27 मार्च 2026 को कुछ पुलिसकर्मी बिना किसी वारंट या लिखित अनुमति के उसके किराए के मकान में घुस गए। आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता, उसकी मां, चाची, बहनों और एक नाबालिग बच्चे के साथ लात-घूंसों और लाठियों से मारपीट की।
शिकायत में कहा गया कि शिकायतकर्ता की मां के सिर पर लाठी से वार किया गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल होकर गिर पड़ीं। इसके बाद परिवार के सदस्यों को थाने ले जाया गया, जहां कथित रूप से मारपीट जारी रही।
यह भी आरोप लगाया गया कि बाद में शिकायतकर्ता और उसके परिवार के खिलाफ झूठा मामला दर्ज किया गया तथा घटना के वीडियो, जो मोबाइल फोन में रिकॉर्ड किए गए, पुलिस ने मिटा दिए।
अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने माना कि मामले में पुलिस जांच केवल आवश्यक ही नहीं बल्कि "पूर्णतः अपरिहार्य" है।
अदालत ने कहा कि संबंधित थाने के सीसीटीवी फुटेज तत्काल सुरक्षित और जब्त किए जाने चाहिए, क्योंकि उनमें घटना से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं।
साथ ही मोबाइल फोन से कथित रूप से मिटाए गए वीडियो साइबर विशेषज्ञों की सहायता से पुनः प्राप्त किए जा सकते हैं।
अदालत ने यह भी कहा कि कथित रूप से इस्तेमाल की गई लाठियों और अन्य वस्तुओं की बरामदगी, घायलों के बयान और घटनास्थल का निरीक्षण भी जरूरी है।
सरकारी कर्तव्य का संरक्षण नहीं मिलेगा
पुलिसकर्मियों की ओर से यह तर्क दिए जाने की संभावना पर कि उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक है, अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसे कृत्यों को किसी भी तरह से सरकारी कर्तव्य के निर्वहन का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा,
"बिना वारंट निजी घर में घुसना, महिलाओं और नाबालिग पर हमला करना तथा मोबाइल फोन जब्त करना किसी भी संवैधानिक या कानूनी दृष्टि से सरकारी कर्तव्य का निर्वहन नहीं कहा जा सकता। ऐसे कृत्य सरकारी अधिकार की सीमा से बाहर और उसके विपरीत हैं।"
हालांकि, अदालत ने सार्वजनिक स्थान पर अश्लीलता से संबंधित धारा 294 तथा दंगा और अवैध जमावड़े से जुड़ी धाराओं के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार किया।
अदालत ने कहा कि कथित अभद्र भाषा निजी आवास के भीतर प्रयोग की गई, जबकि संबंधित अपराध के लिए सार्वजनिक स्थान पर घटना होना आवश्यक है।
मामले में अगली सुनवाई 16 जून को होगी, जब अदालत के समक्ष FIR की प्रति प्रस्तुत की जाएगी।