'तीर्थयात्रियों का दबाव कम करने के लिए': हाईकोर्ट ने 'बांके बिहारी' दर्शन के बढ़े हुए समय को सही ठहराया, एससी-नियुक्त पैनल के खिलाफ अवमानना याचिका खारिज

Update: 2026-02-03 15:08 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त हाई-पावर्ड मंदिर प्रबंधन समिति, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अशोक कुमार (रिटायर्ड) कर रहे हैं, उसके खिलाफ दायर अवमानना ​​याचिका खारिज की। यह याचिका ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर (वृंदावन-मथुरा में) में दर्शन का समय बढ़ाने के लिए दायर की गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि यह हाईकोर्ट के नवंबर, 2022 के आदेश का उल्लंघन है।

जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की बेंच ने कहा कि समिति, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के रोज़मर्रा के मामलों की देखरेख करने का अधिकार दिया, उन्होंने मंदिर में तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ और उन्हें हो रही परेशानी को देखते हुए दर्शन का समय बढ़ाने का फैसला किया।

कोर्ट ने कहा कि समिति मंदिर के अंदर और बाहर दबाव कम करने के लिए काम कर रही थी ताकि तीर्थयात्रियों को परेशानी न हो।

संक्षेप में मामला

यह अवमानना ​​याचिका गौरव गोस्वामी ने दायर की थी, जिसमें तर्क दिया गया कि जब हाईकोर्ट ने मथुरा की एक सिविल कोर्ट द्वारा पारित आदेश (नवंबर 2022 में) पर रोक लगाने का आदेश दिया था, तो नियुक्त समिति दर्शन का समय नहीं बढ़ा सकती थी।

उल्लेखनीय है कि सिविल कोर्ट के आदेश में जिला मजिस्ट्रेट और जिला जज के बीच बातचीत के आधार पर दर्शन का समय बढ़ाने की कोशिश की गई। इस आदेश पर हाईकोर्ट ने तुरंत रोक लगा दी थी।

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां प्रशासनिक गतिरोध और आपसी कलह के कारण तीर्थयात्रियों को हो रही परेशानी का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त, 2025 को हाई-पावर्ड मंदिर प्रबंधन समिति का गठन किया।

इस समिति को विशेष रूप से मंदिर के अंदर और बाहर रोज़मर्रा के कामकाज की देखरेख और निगरानी का काम सौंपा गया।

11 सितंबर, 2025 को समिति ने एक बैठक की और दर्शन की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया। नतीजतन, जिला मजिस्ट्रेट/कलेक्टर, मथुरा, जो सदस्य सचिव के रूप में कार्य करते हैं, उन्होंने 19 सितंबर, 2025 को एक कार्यालय ज्ञापन जारी कर इस बदलाव को लागू किया।

अब हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि समिति का फैसला हाईकोर्ट द्वारा पारित रोक लगाने वाले आदेश का उल्लंघन करता है। यह भी कहा गया कि दर्शन का समय बढ़ाने से देवता की रोज़ाना की दिनचर्या बदल जाएगी और कोई प्रशासनिक निकाय न्यायिक रोक को खत्म नहीं कर सकता।

दूसरी ओर, कमेटी ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने दखल इसलिए दिया, क्योंकि पहले की अंदरूनी लड़ाई ने समस्याओं को और बढ़ा दिया, जिससे तीर्थयात्रियों को कोई सुविधा या राहत नहीं मिल रही थी।

उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को सही कामकाज से जुड़े मामलों से निपटने का अधिकार दिया, जिसमें भीड़ को प्रभावी ढंग से कंट्रोल करना और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना शामिल है।

इन दलीलों के आधार पर बेंच को अवमानना ​​याचिका में कोई दम नहीं लगा, क्योंकि उसने पाया कि नवंबर, 2022 में हाईकोर्ट ने जिस संदर्भ में स्टे ऑर्डर दिया, वह उस संदर्भ से अलग था, जिसमें कमेटी ने प्रस्ताव लिया था।

सिंगल जज ने कहा कि कमेटी ने उचित विचार-विमर्श के बाद फैसला लिया और उसे मंदिर के अंदर और बाहर रोज़ाना के कामकाज की देखरेख और निगरानी करने का काम सौंपा गया।

हाईकोर्ट ने आगे बताया कि कमेटी ने मंदिर में आने वाले बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों को ध्यान में रखते हुए दर्शन का समय बढ़ाया, जिन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

इस प्रकार, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट के आदेश का विरोधी पक्षों द्वारा उल्लंघन या अवहेलना नहीं की गई।

इसलिए कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अवमानना ​​का कोई मामला नहीं बनता है, क्योंकि विरोधी पक्ष सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी है और वे मंदिर के अंदर और बाहर रोज़ाना के कामकाज की देखरेख और निगरानी कर रहे हैं।

इसके साथ ही अवमानना ​​याचिका खारिज कर दी गई।

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