गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि पक्षकार अदालत द्वारा इस तरह के संदर्भ पर कार्यवाही करने से पहले किसी भी समय सीपीसी की धारा 89 के तहत मध्यस्थता के संदर्भ के लिए अपनी सहमति वापस ले सकता है।

जस्टिस उमेश ए. त्रिवेदी की खंडपीठ सिविल जज के उस आदेश के खिलाफ अनुच्छेद 227 के तहत एक विशेष दीवानी आवेदन पर विचार कर रही थी, जिसके तहत पक्षकारों द्वारा संयुक्त रूप से याचिका को नागरिक प्रक्रिया संहिता, 1908 (बाद में 'कोड' के रूप में संदर्भित) धारा 89(2)(ए) के तहत मध्यस्थ को विवाद को संदर्भित करने के लिए दिया गया था। इसे मूल वादी पर खारिज कर दिया गया, जिसने शुरू में उसी के लिए सहमति दी थी। हालांकि, इसे मध्यस्थ को भेजने के लिए सहमति वापस ले ली।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दोनों पक्षों ने सीपीसी की धारा 89 के तहत विवाद को मध्यस्थ को भेजने के लिए सहमति व्यक्त की, इसलिए न्यायालय केवल इस आधार पर आवेदन को अस्वीकार नहीं कर सकता कि प्रतिवादी ने अपनी सहमति वापस ले ली।

कोर्ट ने आगे तर्क दिया कि एक बार प्रतिवादी मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए सहमत हो गया और धारा 89 के तहत आवेदन दाखिल करने के बाद वह ए एंड सी एक्ट की धारा 4 के मद्देनजर मध्यस्थता से वापस नहीं ले सकता।

न्यायालय ने याचिकाकर्ता के तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि केवल इसलिए कि एक पक्ष शुरू में मध्यस्थ के पास मामले को भेजने के लिए सहमत हो गया था, यह नहीं माना जा सकता कि उसने इसे मध्यस्थ के अधिकार क्षेत्र में प्रस्तुत किया है और यह किसी भी समय अपनी सहमति वापस लेने के अधिकार के भीतर है।

न्यायालय ने माना कि संहिता की धारा 89 सपठित ए एंड सी एक्ट की धारा 4 का संदर्भ गलत है। न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 4 जो मानित छूट का प्रावधान करती है, यह केवल तभी लागू होगी जब पक्षकारों के बीच मध्यस्थता समझौता हो। इसे तब लागू नहीं किया जा सकता जब संहिता की धारा 89 के तहत संदर्भ दिया जा रहा हो।

इसी के तहत कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

केस टाइटल: कृष्णा कैलिब्रेशन सर्विसेज बनाम जैस्मीन भारत पटेल, आर/स्पेशल सिविल एप्लीकेशन नंबर 5682 ऑफ 2021।

दिनांक: 19.07.2022

याचिकाकर्ता के वकील: पारस के सुखवानी

प्रतिवादी के लिए वकील: लागू नहीं

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