सरकार ने एससी/ एसटी/ ओबीसी, अल्पसंख्यक एवं महिला सदस्यों को हाईकोर्ट का जज बनाये पर विचार करने का अनुरोध किया : कानून मंत्रालय

Update: 2020-10-21 04:20 GMT

केंद्रीय विधि मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट की बेंचों में अल्पसंख्यक/ कमजोर समुदायों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व की चिंताओं के जवाब में एक बार फिर कहा है कि न्यायपालिका में आरक्षण का प्रावधान नहीं है।

हालांकि, मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि सरकार हाईकोर्ट स्तर पर न्यायाधीशों की नियुक्तियों में ऐसे समुदायों का प्रतिनिधित्व बढ़ाये जाने पर जोर देती रही है, क्योंकि हाईकोर्ट से ही सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्तियां आम तौर पर होती हैं।

कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा,

"सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत की जाती है, जिनमें महिलाओं के लिए या जातिगत या वर्ग आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।"

कानून मंत्री राज्यसभा में एक सदस्य पी. विल्सन की ओर से दर्ज करायी गयी चिंता का जवाब दे रहे थे।

विल्सन ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में पिछले कुछ वर्षों में समाज के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व घट रहा है।

उन्होंने पार्लियामेंट को इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए लिखा था,

"विविधतापूर्ण न्यायपालिका की जरूरत है, क्योंकि इसके बिना गैर-प्रतिनिधित्व वाले समुदायों के अधिकारों के हनन के अवसर बढ़ते हैं और इससे परोक्ष रूप से भेदभाव होता है। महत्वपूर्ण रूप से कुछ समुदायों का जरूरत से अधिक प्रतिनिधित्व मौजूदा प्रणाली के उद्देश्य और समाज के विभिन्न वर्गों से जजों की भर्तियां करने तथा सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में न्यायपालिका के अक्षम रहने पर सवाल खड़े करता है।"

कानून मंत्री ने अब स्पष्ट किया है कि मौजूदा समय में, सुप्रीम कोर्ट में दो महिलाएं, तीन अल्पसंख्यक और एक अनुसूचित जाति सहित कुल 30 न्यायाधीश हैं।

उन्होंने आगे कहा कि मुख्य रूप से हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों / न्यायाधीशों के बीच से ही सुप्रीम कोर्ट के लिए न्यायाधीशों की नियुक्तियां की जाती हैं और सरकार यह आग्रह करती रही है कि हाईकोर्ट में जजों के पदों पर नियुक्तियां करते वक्त अनुसूचित जातियां (एससी), अनुसूचित जनजातियां (एसटी), अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी), अल्पसंख्यक समुदायों एवं महिला उम्मीदवारों को उपयुक्त तरजीह दी जायें।

दूसरी ओर विल्सन का पत्र कहता है,

"हमारे सुप्रीम कोर्ट में विविधता की कमी है और यह भारत के अद्भुत विविधतापूर्ण एवं बहुलवादी समाज का आईना नहीं है। न्यायिक विविधिता न्याय की गुणवत्ता का मूल है। कई सामाजिक वर्गों का सुप्रीम कोर्ट में बहुत ही खराब प्रतिनिधित्व है। महिला न्यायाधीशों और ऐतिहासिक रूप से समाज के दबे-कुचले एवं हाशिये पर पहुंचे वर्गों से सम्बद्ध न्यायाधीशों की कमी है। ऐसा नहीं है कि वे पर्याप्त योग्य नहीं हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि उनके अधिकारों को उचित तरीके से संरक्षित नहीं किया जा रहा है, और अंतत: इस तरह के अधिकारों का हनन हो सकता है। इस देश के लोग भयभीत हैं कि कुछ वर्गों से संबंधित न्यायाधीशों का एक बहुत ही संकीर्ण, सजातीय समूह निश्चित रूप से समग्र रूप से समाज के विचारों और मूल्यों, विशेष रूप से विविध, सांस्कृतिक और पीढ़ीगत मामलों से जुड़े मुद्दों को प्रतिबिम्बित नहीं कर पा रहा है, क्योंकि उन्हें और अधिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी, ताकि न्यायाधीश अपनी पृष्ठभूमि के आधार पर कानूनों की व्याख्या कर सकें और कानून लागू कर सकें।"

Tags:    

Similar News