माता-पिता बच्चों को 'भयानक चूहा-दौड़' में दौड़ा रहे हैं, शिक्षा को केवल मेडिकल या इंजीनियरिंग सीटों तक पहुंचने का ज़रिया माना जा रहा है: मद्रास हाईकोर्ट

Update: 2026-03-10 04:15 GMT

मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में इस बात पर अफ़सोस जताया कि शिक्षा को प्राथमिकता केवल मेडिकल या इंजीनियरिंग सीटों में दाखिले के लिए दी जा रही है और माता-पिता अपने बच्चों को एक चूहा-दौड़ (Rat Race) में दौड़ा रहे हैं।

जस्टिस भरत चक्रवर्ती ने टिप्पणी की कि माता-पिता बच्चों से आसान विषय चुनने को कह रहे हैं ताकि बच्चा केवल तीन विषयों पर ध्यान केंद्रित कर सके, जिससे NEET परीक्षा पास करना आसान हो जाए। कोर्ट ने आगे कहा कि हाई स्कूलों में, यहाँ तक कि मातृभाषा की भी बलि दी जा रही है ताकि बच्चा NEET की तैयारी पर ध्यान दे सके।

कोर्ट ने कहा,

"पूरी दुनिया में शिक्षा का मतलब है सीखना। हालांकि, दुनिया के इस हिस्से में, शिक्षा का मतलब है मेडिकल सीट या इंजीनियरिंग सीट में दाखिला। माता-पिता बच्चों को एक भयानक चूहा-दौड़ में दौड़ाते हैं। इस दीवानगी में हर तरह के विषय बदले जाते हैं—जैसा कि यहाँ किया गया, जहां ऐसे विषय चुने गए, जिन्हें वे आसान समझते हैं। हाईस्कूल में दूसरे आसान विषय लेने के लिए मातृभाषा की भी बलि दे दी जाती है। माता-पिता यह सब इसलिए करते हैं, यह सोचकर कि अगर बच्चा केवल तीन विषयों की पढ़ाई करेगा तो वह NEET परीक्षा में बहुत अच्छे अंकों से पास होगा।"

कोर्ट एक पिता की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने CBSE के क्षेत्रीय निदेशक के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उनकी बेटी को सीनियर स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा 2025-26 में एक निजी उम्मीदवार के तौर पर गणित का पेपर एक अतिरिक्त विषय के रूप में देने की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनकी बेटी ने एक CBSE स्कूल में कक्षा XI में दाखिला लिया और वह अंग्रेज़ी, जीव विज्ञान, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान और गणित की पढ़ाई कर रही थी। स्टूडेंट्स ने कक्षा XI में और कक्षा XII में भी कुछ समय तक गणित की पढ़ाई जारी रखी। हालांकि, यह देखते हुए कि स्टूडेंट्स NEET परीक्षा देने वाली थी और मेडिकल क्षेत्र में जाना चाहती थी, CBSE को विवरण जमा करते समय उससे शारीरिक शिक्षा (Physical Education) विषय चुनने को कहा गया।

चूंकि, स्टूडेंट्स NEET परीक्षा में सफल नहीं हो पाई और यह सोचते हुए कि अगर वह गणित विषय लेती है तो उसे इंजीनियरिंग में दाखिला मिल सकता है, एक आवेदन जमा किया गया ताकि उसे गणित को एक अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ने की अनुमति मिल सके। चूंकि इस आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया, इसलिए यह वर्तमान याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि योजना के नियम 43 के तहत छात्रा को एक अतिरिक्त विषय पढ़ने की अनुमति है। इसलिए उन्होंने प्रार्थना की कि स्टूडेंट्स को गणित को अतिरिक्त विषय के रूप में पढ़ने की अनुमति दी जाए। दूसरी ओर, CBSE ने यह तर्क दिया कि यह उप-नियम (bye-law) मौजूदा मामले में लागू नहीं होगा। यह तर्क दिया गया कि स्टूडेंट्स ने 11वीं और 12वीं कक्षा में शारीरिक शिक्षा (Physical Education) पढ़ी थी, और जब तक कोई स्टूडेंट्स 11वीं कक्षा में गणित को एक विषय के रूप में नहीं पढ़ती, तब तक उस पर इस उप-नियम के लाभ लागू नहीं होंगे।

अदालत ने यह पाया कि आम तौर पर CBSE के छात्रों को अनिवार्य रूप से 5 विषय पढ़ने होते हैं, जिनमें से एक विषय के रूप में अंग्रेजी शामिल होती है। उप-नियम 43 के अनुसार, स्टूडेंट्स छठे विषय के तौर पर एक अतिरिक्त विषय पढ़ सकते हैं और उन्हें 'निजी उम्मीदवार' (Private Candidates) के रूप में परीक्षा में बैठने की सुविधा भी दी गई।

मौजूदा मामले में अदालत ने यह पाया कि स्टूडेंट्स ने 11वीं कक्षा में गणित पढ़ा था और केवल बाहरी दबाव के कारण ही उसने आखिरी समय में अपना विषय बदल लिया था। अदालत ने यह भी पाया कि CBSE को गलत जानकारी दी गई।

अतः, यह देखते हुए कि यह एक असाधारण स्थिति थी, अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे स्टूडेंट्स को गणित की पूरक परीक्षा (Supplementary Examination) में बैठने की अनुमति दें। अदालत ने स्टूडेंट्स के पिता को निर्देश दिया कि वे अपनी बेटी के साथ क्षेत्रीय निदेशक (Regional Director) के समक्ष उपस्थित हों। इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करें कि छात्रा 11वीं कक्षा में गणित पढ़ रही थी।

अदालत ने आगे कहा कि एक बार जब क्षेत्रीय निदेशक इस बात से संतुष्ट हो जाएं कि स्टूडेंट ने 11वीं कक्षा में गणित पढ़ा था तो उसे पूरक परीक्षा में बैठने की अनुमति अवश्य दी जानी चाहिए।

Case Title: B Shajimon v. Union of India and Others

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