गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 'सीक्रेट किलिंग' पर जस्टिस सैकिया जांच आयोग की रिपोर्ट खारिज करने के खिलाफ अपील में देरी को माफ करने से इनकार किया

Update: 2023-06-15 05:31 GMT

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सोमवार को एकल पीठ के उस फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में 531 दिनों की देरी की माफी के लिए आवेदन पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसने जस्टिस (सेवानिवृत्त) के.एन. सैकिया आयोग, जिसने 1998-2001 के बीच कथित उल्फा उग्रवादियों के अज्ञात रिश्तेदारों की कथित 'सीक्रेट किलिंग' की जांच की, उसको अमान्य करार दिया था।

नतीजतन, अदालत ने वर्ततमान अपील भी खारिज कर दी। सैकिया आयोग ने 2007 में अपनी रिपोर्ट में असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत की और इशारा किया था।

चीफ जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मिताली ठाकुरिया की खंडपीठ ने पाया कि आवेदक न केवल अपील दायर करने में हुई 531 दिनों की सकल देरी को समझाने में विफल रहे हैं, बल्कि उन्होंने तीन हलफनामों में असंगत और विरोधाभासी दलीलें भी दी हैं।

अदालत ने कहा,

"इस प्रकार, हमारा विचार है कि देरी की माफ़ी के लिए आवेदन वास्तविक दावों और आधारों पर आधारित नहीं है। इसलिए यह स्वीकृति के योग्य नहीं है। परिणामस्वरूप, आईए (सिविल) नंबर 1778/2021 को सुनवाई योग्य न होने के कारण खारिज किया जाता है।”

531 दिनों की देरी की माफ़ी के लिए अपील और वादकालीन आवेदन कथित पीड़ित अनंत कलिता और राज्यसभा सांसद अजीत कुमार भुइयां द्वारा दायर किया गया। उनका प्रतिनिधित्व सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने किया।

यह तर्क दिया गया कि आवेदक एकल न्यायाधीश के समक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत द्वारा दायर मामले में पक्षकार नहीं थे। इस प्रकार रिट याचिका की कार्यवाही या इसके परिणाम से अनजान थे। अदालत को यह भी सूचित किया गया कि हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले आवेदकों ने विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर करके सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की स्वतंत्रता के साथ याचिका वापस ले ली गई।

महंत की ओर से पेश वकील ने कहा कि भुइयां प्रासंगिक समय में प्रसिद्ध पत्रकार थे और 2020 से वह असम से राज्यसभा के वर्तमान सदस्य हैं। इसलिए क्षमा के लिए प्रार्थना के समर्थन में आवेदकों द्वारा ली गई अज्ञानता की दलील देरी पूरी तरह से असंबद्ध और अस्थिर है।

फैसले में अदालत ने कहा कि आवेदन की दलीलों से यह स्पष्ट है कि मुकदमेबाजी भुइयां द्वारा "प्रायोजित प्रतीत होती है", "जो पूर्व प्रसिद्ध पत्रकार हैं और वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं।"

अदालत ने कहा,

"प्रतिवादी नंबर 1 के हलफनामों के साथ संलग्न की गई समाचार पत्रों की रिपोर्ट की प्रतियां यह स्पष्ट करती हैं कि एकल पीठ द्वारा दिए गए 03.09.2018 के निर्णय के बारे में जानकारी बड़े पैमाने पर प्रकाशित की गई और प्रकाशन लंबे समय तक जारी रहे। इस प्रकार, आवेदकों द्वारा लगाए गए आदेश के बारे में जानकारी नहीं होने के बारे में दी गई दलील बिल्कुल गलत है। इस प्रकार हलफनामा अस्वीकार्य है।”

अदालत ने आगे कहा कि आवेदकों ने एकल पीठ द्वारा दिए गए आदेश का विरोध करने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसमें कहा गया कि जब एसएलपी को वापस लिया गया था, "तो आवेदकों की ओर से इस अदालत में रिट अपील दायर करने में देरी की माफ़ी के लिए कोई अनुरोध नहीं किया गया।"

केस टाइटल: अनंत कलिता और अजीत कुमार भुइयां बनाम प्रफुल्ल कुमार महंत और 8 अन्य।

अपीयरेंस: आवेदकों के लिए सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस; प्रफुल्ल कुमार महंत के लिए एडवोकेट आर बरुआ; अन्य उत्तरदाताओं के लिए क्रमश: एम. भट्टाचार्जी (एडिशनल सीनियर सरकारी वकील) और एडवोकेट बी. बोरा।

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