गंगा इफ्तार पार्टी विवाद | वाराणसी कोर्ट ने सभी 14 आरोपियों की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की, कहा- 'गंभीर अपराध'
उत्तर प्रदेश के वाराणसी कोर्ट ने सोमवार को 14 लोगों की ज़मानत अर्ज़ी खारिज की। बता दें, इन लोगों पर गंगा नदी के बीच में एक नाव पर 'इफ्तार' पार्टी आयोजित करके और नदी में हड्डियां व खाने का जूठा फेंककर हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को कथित तौर पर ठेस पहुंचाने का आरोप है।
यह आदेश वाराणसी के एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (ACJM) अमित कुमार यादव-III ने पारित किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह अपराध गंभीर प्रकृति का है और इसमें ज़मानत नहीं मिल सकती।
ये 14 आरोपी - आज़ाद अली, आमिर कैफ़ी, दानिश सैफ़ी, मोहम्मद अहमद, निहाल अफ़रीदी, महफ़ूज़ आलम, मोहम्मद अनस, मोहम्मद अव्वल, मोहम्मद तहसीन, मोहम्मद अहमद उर्फ़ राजा, मोहम्मद नूर इस्माइल, मोहम्मद तौसीफ़ अहमद, मोहम्मद फ़ैज़ान और मोहम्मद समीर - 19 मार्च, 2026 से न्यायिक हिरासत में हैं।
कथित तौर पर यह इफ्तार पार्टी 15 मार्च को आयोजित की गई थी, जिसके दौरान इन 14 आरोपियों ने नाव की सवारी करते हुए चिकन बिरयानी खाई और खाने का जूठा नदी में फेंक दिया।
भारतीय जनता युवा मोर्चा के ज़िला अध्यक्ष रजत जायसवाल की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए वाराणसी पुलिस ने इन आरोपियों को 17 मार्च को गिरफ्तार किया था।
इन आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1)(b) [दुश्मनी को बढ़ावा देना], 270 [सार्वजनिक उपद्रव], 279 [सार्वजनिक जल स्रोत या जलाशय को दूषित करना], 298 [पूजा स्थल को नुकसान पहुँचाना या अपवित्र करना], 299 [जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य, जिसका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना हो] और 223(b) के तहत, साथ ही 'जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974' की धारा 24 [प्रदूषित पदार्थ के निपटान के लिए नदी या कुएँ के उपयोग पर रोक] के तहत मामले दर्ज किए गए।
बाद में पुलिस ने इन आरोपियों पर BNS की धारा 308(5) के तहत एक और आरोप जोड़ा। यह आरोप नाव के मालिकों की शिकायत के बाद जोड़ा गया, जिन्होंने आरोप लगाया कि इन आरोपियों ने उनसे ज़बरदस्ती नाव छीन ली थी। सुनवाई के दौरान, आरोपी के वकील ने दलील दी कि आवेदकों का कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं है। उन्हें एक साज़िश में झूठा फंसाया गया। यह तर्क दिया गया कि आरोपियों के पास से कोई मटन या चिकन बरामद नहीं हुआ।
इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि वायरल वीडियो में मांस खाने का कोई भी दृश्य प्रमाण नहीं दिखता, और न ही उस फुटेज में नाविक (मल्लाह) दिखाई दे रहे हैं।
दूसरी ओर, सहायक अभियोजन अधिकारी ने ज़मानत याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि किए गए अपराध गंभीर प्रकृति के हैं, जिनके लिए 10 साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है।