महिला दिवस: यौन उत्पीड़न, मातृत्व अवकाश, और अन्य मुद्दों पर बोलीं तेलंगाना हाईकोर्ट की चीफ ज‌स्ट‌िस ह‌िमा कोहली और जस्टिस अनु शिवरामन

Update: 2021-03-11 07:17 GMT

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आयोजित एक वर्चुअल प्रोग्राम में बोलते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस हिमा कोहली ने बार के अपने एक अनुभव को साझा किया, जब किरायेदारी के विवाद में उलझी एक मुवक्‍क‌‌िल अपनी फीस नहीं दे सकती थी, फिर भी वह उसका मुकदमा लड़ती रहीं।

मुवक्क‌िल एक दर्जी थी, वह चीफ जस्टिस कोहली के पास आई, और उनके अहसानों को लौटाने के लिए, उनकी सफेद साड़ी को स्टार्च करने की पेशकश की। जज ने जब यह किस्‍स सुनाया, उनकी आवाज भरभरा गई।

उन्होंने कहा, "जो संतुष्टि किसी अहम काम को करने में सक्षम होने पर होती है, और कुछ ऐसा करने पर मिलती है, जिससे किसी के जीवन में फर्क पड़ता है, उस के भरोसे एक इंसान ओ बढ़ता है...।"

बेंच को इस बात का श्रेय देते हुए कि इसने समाज को देखने का नया नज़रिया दिया क‌ि समाज के लिए क्या किया जा सकता है, जज ने उस संतोष के बारे में बात की, जो कुछ सार्थक करने पर मिलता है।

चीफ जस्टिस कोहली, केरल हाईकोर्ट की जज अनु शिवरामन, और मद्रास उच्च न्यायालय की वकील गीता रामेसेशन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सोमवार को भारतीय विधि संस्थान की केरल राज्य इकाई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में पैनलिस्ट थीं। कार्यक्रम का आयोजन केरल फेडरेशन ऑफ वूमेन लॉयर्स ने किया था।

अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में, चीफ जस्टिस कोहली ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र ने इस साल महिला दिवस की थीम 'चुनौती के लिए चयन' तय किया है। ‌थीम की चर्च करते हुए उन्होंने बताया कि महिलाओं ने माताओं, बेटियों, पत्नियों, बहनों, परिवार के सदस्यों और अन्य रूपों में कई भूमिकाएं निभाईं। ऐसी ही महिलाएं ने मौक आने पर कानून के पेशे की चुनौतियों का सामना किया है।

यौन उत्पीड़न और कानूनी पेशे पर

पैनल के सदस्य इस बात से सहमत थे कि पेशे में यौन उत्पीड़न के मुद्दे को संबोधित करने की जरूरत हो तो इस पर और अधिक किया जाना चाहिए।

एडवोकेट रामेसेशन ने कहा, "यौन उत्पीड़न एक समस्या है। यह पेशे में है, हम इसे अस्वीकार नहीं कर सकते। यह वकीलों के बीच है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह एक समस्या है और मुझे नहीं लगता कि कोई भी इससे इनकार करना चाहता है।"

जस्टिस शिवरामन ने बताया कि विशाखा फैसले और कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 की व्यवस्था के बावजूद यौन उत्पीड़न की शिकायतें करने में अनिच्छा दिखती है।

दिल्ली उच्च न्यायालय में यौन उत्पीड़न समिति के प्रमुख के रूप में अपने अनुभवों को साझा करते हुए चीफ जस्टिस कोहली ने कहा कि बहुत कम लोग वास्तव में यह पता है कि यौन उत्पीड़न का सामना करने पर किस मंच पर संपर्क करने की आवश्यकता है।

मातृत्व, परिवार और बच्चे की देखभाल पर

चीफ जस्टिस कोहली ने बताया कि 80 और 90 के दशक की तुलना में ड्राप आउट की दर वर्तमान में कम है।

उस समय, महिलाओं को अक्सर प्रैक्टिस और शादी के बीच, एक विकल्प को चुनने के लिए मजबूर किया जाता था, क्योंकि माता-पिता का मानना ​​था कि अगर एक महिला की प्रैक्टिस जारी रही, तो उसे एक आदर्श जोड़ा नहीं मिलेगा।

उन्होंने कहा कि कानून फर्मों के आने के बाद, अब स्थिति काफी बदल गई है। अब महिलाएं विवाह और प्रै‌क्टिस दोनों पर ध्यान दे रही हैं।

जस्टिस शिवरामन ने बताया कि कामकाजी महिला के लिए बच्‍चों की देखभाल और मातृत्व चुनौतीपूर्ण रहा है और एक प्रैक्टिसिंग महिला वकील के लिए सबसे बड़ा व्यवधान रहा है। मातृत्व अवकाश और इसे इर्दगिर्द बनी धारणाओं के मुद्दे को संबोधित करने की आवश्यकता है। जस्टिस शिवरामन ने जोर दिया।

उन्होंने कहा, "मैंने यह भी देखा है कि जब एक बार आप ब्रेक लेते हैं और ब्रेक लंबा चलता है, तब जब आप वापस आते हैं, तो आपको वास्तव में एक वकील के रूप में गंभीरता से नहीं लिया जाता है, जो पेशे में रहे ... मुझे लगता है कि यह हमें तय करना है कि बच्चे की देखभाल के इस मुद्दे को कैसे संबोधित किया जा सकता है।"

मेंटरशिप पर

पैनलिस्टों ने महिलाओं को बातचीत करने, नेटवर्क बनाने और बार के अन्य सदस्यों से समर्थन प्राप्त करने के लिए सुरक्षित स्थानों के रूप में काम करने के लिए कानूनी पेशे के भीतर समर्थन संरचना बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

जस्टिस अनु शिवरामन ने जोर देकर कहा कि केरल उच्च न्यायालय में ऐसी प्रणाली हमेशा अनौपचारिक रूप से मौजूद रही है, मद्रास उच्च न्यायालय की अधिवक्ता गीता रामसेशन ने इसे मजबूत करने के लिए किसी भी अनौपचारिक संरचना को औपचारिक रूप देने के महत्व को रेखांकित किया।

कानून के कुछ क्षेत्र महिलाओं के लिए अधिक अनुकूल हैं, की धारणा पर, न्यायाधीशों की संवेदनशीलता और उनकी शुरुआती चुनौतियों पर

महिलाओं के लिए कुछ कानूनों अनुकूल नहीं हैं, इस धारणा पर जस्टिस अनु शिवरामन ने कहा कि वे जीवन के हर स्तर पर सामना करने वाली धारणाओं के रूप में बने रहे हैं।

यह मानते हुए कि इन धारणाओं को समाप्त करने के लिए प्रणालीगत परिवर्तन आवश्यक थे, उन्होंने जोर दिया कि प्रैक्टिस के क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित करना इन धारणाओं को दूर करने का तरीका रहा है।

चीफ जस्टिस कोहली ने कानूनी पेशे में एक महिला के रूप में अपने अनुभवों के बारे में बात की, और कहा कि उन्हें ज्यादातर अपने परिवार के बाहर की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

यह बताते हुए कि वह एक ऐसे परिवार से हैं, जिसकी कानून की पृष्ठभूमि नहीं है, चीफ जस्टिस कोहली ने कहा कि उन्होंने कानूनी पेशे में प्रवेश नहीं किया होता, अगर उन्हें मां का सहयोग नहीं मिला होता है।

महामारी के प्रभाव पर

पैनलिस्ट इस प्रस्ताव से सहमत थे कि वर्चुअल अदालत प्रणाली ने महिलाओं की मदद की, विशेषकर उनकी जो परिवार में रहती हैं। महिलाओं, विशेष रूप से जिनके पास चैंबर्स नहीं है, कार्यालयों या आवागमन के साधनों का अभाव है, उनके पास तकनीकी के कारण अपनी प्रै‌क्टिस को जारी करने का अवसर बना रहा।

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