मंदिर के देवता 'नाबालिग', अवैध अतिक्रमण के खिलाफ उनकी रक्षा की जानी चाहिए: मद्रास हाईकोर्ट

Update: 2021-09-21 06:49 GMT

Madras High Court

मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि मंदिर संपत्तियों पर छलपूर्ण या अवैध अतिक्रमण समाज के खिलाफ अपराध है। अदालत एक व्यक्ति के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही पर फैसला सुना रही थी, जिसने चेन्नई ‌स्‍थ‌ित अरुल्मिगु अगाथीश्वर स्वामी थिरुक्कोइल से जुड़ी मंदिर संपत्ति का पट्टाधारक होने का दावा किया था।

ज‌स्टिस एसएम सुब्रमण्यम ने कहा, " मंदिर की संपत्तियों के छलपूर्ण और अवैध अतिक्रमण समाज के खिलाफ बड़े पैमाने पर अपराध है। मंदिर के धन का दुरुपयोग निस्संदेह एक अपराध है और ऐसे सभी अपराधों को दर्ज किया जाए और अपराधियों के खिलाफ राज्य मुकदमा चला सकता है क्योंकि राज्य इन मंदिरों का नियंत्रक है और अपराध राज्य के खिलाफ किए जाते हैं। मंदिर की संपत्तियों को कुछ लालची पुरुषों, कुछ पेशेवर अपराधियों और भूमि हथियाने वालों द्वारा लूटने की अनुमति है। HR & CE ‌डिपार्टमेंट के अधिकारियों के सक्रिय या निष्क्रिय योगदान और मिलीभगत को खारिज नहीं किया जा सकता है। ऐसे सरकारी अधिकारियों की ओर से इन चूकों, लापरवाही, कर्तव्य की उपेक्षा को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए और इस संबंध में सभी उचित कार्रवाई अत्यधिक जरूरी है।"

इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि ट्रस्टियों, अर्चकों, सेबैट्स और अन्य कर्मचारियों को देवताओं, मंदिरों और देवास्वम बोर्डों की संपत्तियों की रक्षा करनी चाहिए। यह भी नोट किया गया कि कई मामलों में, जिन्हें मंदिर की संपत्तियों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है, उन्होंने स्वामित्व या किरायेदारी, या प्रतिकूल कब्जे का झूठे दावा स्थापित करके ऐसी संपत्तियों का दुरुपयोग किया है।

कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक अधिकार शामिल होते हैं और इसलिए न्यायालयों को हस्तक्षेप करना चाहिए और अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।

"निजी अधिकार से परे, ऐसे मामलों में एक सार्वजनिक अधिकार शामिल होता है। जब एक सार्वजनिक अधिकार शामिल होता है और जब आरोप कहीं अधिक गंभीर होते हैं तो अदालतों से इस तरह के मामलों में सख्ती से और उचित तरीके से कदम उठाने और निपटने की उम्मीद की जाती है।"

मौजूदा मामले में, न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा कथित पट्टे के अधिकारों को प्रमाणित करने के लिए कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया था। इस प्रकार, यह निष्कर्ष निकाला गया कि याचिकाकर्ता के साथ-साथ उसके परिजनों ने भी अतिक्रमण और अवैध कब्जा किया था। उन्होंने व्यक्तिगत लाभ के लिए मंदिर की संपत्ति का दुरुपयोग किया।

अदालत ने मंदिर की संपत्ति पर बने एक सुपर-स्ट्रक्चर को व्यावसायिक उद्देश्यों जैसे दुकानें, टॉयलेट, गोदाम आदि के लिए उपयोग करने के लिए उप-पट्टे पर देने के याचिकाकर्ता के फैसले पर कड़ी आपत्ति व्यक्त की।

कोर्ट ने कहा, "यह चौंकाने वाला है कि इन अवैध कब्जाधारियों द्वारा मंदिर की संपत्तियों को अवैध तरीके से निपटाया जाता है और अधिकारियों ने हालांकि कार्रवाई शुरू की है, इस न्यायालय को यह रिकॉर्ड करना होगा कि शुरू की गई ऐसी कार्रवाई न केवल अपर्याप्त है, बल्कि मंदिर के ऐसे सक्षम अधिकारियों की ओर से सक्रिय या निष्क्रिय मिलीभगत के बारे में संदेह पैदा करती है।"

अदालत बेदखली की कार्यवाही के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करने के लिए आगे बढ़ी और हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग को मंदिर की संपत्ति के अवैध कब्जे और याचिकाकर्ता द्वारा धन के दुरुपयोग को ध्यान में रखते हुए मामले की विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि मामले में HR&CE विभाग के अधिकारियों की भी मिलीभगत थी, इसलिए अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि मंदिर के 'देवता नाबालिग' हैं, इसलिए कोर्ट को मूर्ति के हितों की रक्षा करनी चाहिए। इस घटना में मंदिर का ट्रस्टी या कार्यकारी अधिकारी मूर्ति के हितों की रक्षा करने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मंदिर में रुचि रखने वाले या देवता की पूजा करने वाले किसी भी व्यक्ति को मंदिर के हितों की रक्षा के लिए प्रतिनिधित्व की तदर्थ शक्ति दी जा सकती है।

केस शीर्षक: के सेंथिलकुमार बनाम प्रधान सचिव, पर्यटन, संस्कृति और धार्मिक विभाग, तमिलनाडु सरकार और अन्य।

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