कलकत्ता हाईकोर्ट ने नारदा मामले में 4 टीएमसी नेताओं को 'हाउस अरेस्ट' करने का आदेश दिया, सीबीआई की मांग ठुकराई

Update: 2021-05-21 08:15 GMT

नारदा घोटाला मामले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी के बाद से 17 मई से हिरासत में रहे तृणमूल कांग्रेस के चार नेताओं की जमानत से संबंधित मामले की सुनवाई कर रही कलकत्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ में जजों के भिन्न विचार होने के बाद मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया गया।

इस बीच, खंडपीठ ने चार नेताओं मंत्री फिरहाद हकीम और सुब्रत मुखर्जी, विधायक मदन मित्रा और सोवन चटर्जी को हाउस अरेस्ट करने का आदेश दिया। इस दौरान उन्हें सभी चिकित्सा सुविधाएं दी जाएंगी।

हाईकोर्ट ने गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों में से दो के नव-निर्वाचित राज्य सरकार में मंत्री और एक के विधायक होने के कारण उन्हें अपने कार्यों के निर्वहन के लिए हाउस अरेस्ट के दौरान फाइलों तक पहुंचने और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अधिकारियों से मिलने की अनुमति दी है।

पीठ ने मौजूदा आदेश पर रोक लगाने के सीबीआई के अनुरोध को भी खारिज कर दिया।

बेंच ने टीएमसी नेताओं के वकीलों द्वारा अंतरिम जमानत पर रिहा करने के अनुरोध को मामले की सुनवाई एक बड़ी बेंच द्वारा नहीं किए जाने तक ठुकरा दिया। हालांकि, उसने नेताओं को फाइलों तक पहुंचने, अधिकारियों से मिलने की अनुमति दी है लेकिन केवल वीसी के माध्यम से।

बेंच ने कहा,

"वे जनता के लिए जो भी काम कर रहे हैं, उसे जारी रखने दें।"

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी की खंडपीठ ने बुधवार को मामले की लंबी सुनवाई की और परस्पर विरोधी राय दी।

जस्टिस अरिजीत बनर्जी ने जहां अंतरिम जमानत देने का आदेश पारित किया है, वहीं एसीजे बिंदल ने असहमति जताई और कहा कि गिरफ्तार किए गए चार टीएमसी नेताओं को नजरबंद रखा जाना चाहिए। खंडपीठ में मतभेद को देखते हुए मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया।

टीएमसी नेताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने आदेश को सुनवाई के बीच में ही पारित कर दिए जाने पर हैरानी व्यक्त की। उन्होंने आग्रह किया कि जब क मामले की सुनवाई बड़ी पीठ द्वारा नहीं की जाती, तब तक नेताओं को अंतरिम जमानत पर रिहा किया जाए।

इस पीठ का गठन आज (शुक्रवार) ही किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा,

"अंतरिम स्थिति स्वतंत्र होनी चाहिए। ये मंत्री, विधायक हैं। भागने के जोखिम की कोई संभावना नहीं है। उन पर जांच में सहयोग नहीं करने का कोई मामूली आरोप नहीं है।"

इस पर जस्टिस बनर्जी ने जवाब दिया:

"पीठ के सदस्यों में से एक ने अंतरिम-जमानत देना उचित समझा। बेंच के अन्य सदस्य सहमत नहीं है। इसलिए, अंतरिम जमानत के इस बिंदु पर बड़ी बेंच को विचार करना होगा। इस बीच, महामारी को देखते हुए हाउस अरेस्ट करने का आदेश दिया गया है।"

हालांकि, सिंघवी ने बताया कि उन्होंने बुधवार शाम 4.30 बजे अंतरिम जमानत याचिका दायर की थी, जब अदालत उठने वाली थी और बहस पूरी नहीं हुई थी।

उन्होंने कहा,

अगर फुल अरेस्ट और हाउस अरेस्ट के बीच चुनाव होता है तो वह हाउस अरेस्ट होगा। लेकिन अगर चुनाव स्वतंत्रता और नजरबंदी के बीच है, तो वह स्वतंत्रता होगी।

उन्होंने कहा कि नजरबंद होने की स्थिति में मंत्रियों को भी COVID-19 से संबंधित कार्यो, वैक्सीनेशन आदि से संबंधित फाइलों तक पहुंच प्रदान की जानी चाहिए।

ट्रायल कोर्ट के समक्ष नेताओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने भी प्रस्तुत किया कि नेताओं की अनुपस्थिति COVID-19 से संबंधित काम को प्रभावित कर रही है। उन्होंने कहा कि फ़रहाद हाकिम COVID-19 वैक्सीनेशन से संबंधित मामलों के लिए चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं और कोलकाता में COVID-19 कार्य के लिए उनकी उपस्थिति आवश्यक है।

उन्होंने आग्रह किया,

"उन्हें फाइलों तक पहुंच और उन्हें अधिकारियों से मिलने की अनुमति देना बहुत जरूरी है।"

उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि बड़ी पीठ का गठन तत्काल किया जाए और आज (शुक्रवार) दोपहर 2 बजे ही मामले की सुनवाई करनी चाहिए। उसी तरह, जिस तरह से हाईकोर्ट ने17 मई को शाम 5.30 बजे ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ सीबीआई की तत्काल याचिका पर विचार किया।

सोवन चटर्जी का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने प्रस्तुत किया कि जांच समाप्त हो गई है और हिरासत की कोई आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने पूछा,

"किस प्रावधान के तहत हिरासत दी जाएगी? धारा 167?"

एसीजे बिंदल ने कहा,

"यह आदेश अंतरिम जमानत याचिका दायर होने के बाद से पारित किया गया है। अब यह आश्चर्यजनक है कि आप आदेश के बाद गुण-दोष के आधार पर मुद्दे उठा रहे हैं।"

गौरतलब है कि सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी हाउस अरेस्ट के आदेश पर रोक लगाने की प्रार्थना की है।

उन्होंने प्रस्तुत किया कि केंद्र सरकार को गौतम नवलखा मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में आपत्ति है, जिस पर हाईकोर्ट ने टीएमसी नेताओं को हाउस अरेस्ट किए जाने की अनुमति देने के लिए भरोसा किया है।

हालांकि इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया।

पृष्ठभूमि

17 मई को पीठ ने कोकाटा में विशेष सीबीआई अदालत द्वारा तृणमूल कांग्रेस के चार नेताओं फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, सुब्रत मुखर्जी और सोवन चटर्जी को दी गई जमानत पर रोक लगा दी थी। इन्हें 17 मई को सीबीआई ने नाटकीय रूप से गिरफ्तार किया था।

पीठ ने सीबीआई द्वारा भेजे गए एक पत्र के आधार पर नाटकीय देर रात सुनवाई के बाद स्थगन आदेश पारित किया था। इसमें मुख्यमंत्री और कानून मंत्री के नेतृत्व में टीएमसी नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों द्वारा निचली अदालत पर "अभूतपूर्व भीड़ दबाव" का हवाला देते हुए मामले को हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की गई थी।

अगले दिन, टीएमसी नेताओं ने इस आधार पर स्थगन आदेश को वापस लेने की मांग करते हुए आवेदन दायर किया कि यह उन्हें नोटिस जारी किए बिना पारित किया गया था।

पीठ ने 19 मई को सीबीआई के लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और गिरफ्तार टीएमसी नेताओं के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ अभिषेक मनु सिंघवी और सिद्धार्थ लूथरा को सुना था। सिंघवी और लूथरा ने इस आधार पर अंतरिम जमानत के लिए प्रार्थना की थी कि आरोपी वृद्ध व्यक्ति हैं और बीमार हैं।

पीठ को बताया गया कि गिरफ्तार किए गए तीन लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उनमें से एक सोवन चटर्जी अभी भी जेल में है।

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