14वीं महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उद्धव सेना की अयोग्यता याचिका निरर्थक: शिंदे ने सुप्रीम कोर्ट से कहा
शिवसेना विवाद में सीनियर वकील ध्रुव मेहता ने आज सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील दी कि महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता है, उन्होंने दलबदल विरोधी कानून के तहत विधायकों को अयोग्य घोषित करने की उद्धव ठाकरे गुट की याचिका का विरोध किया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ शिव सेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सदस्य सुनील प्रभु की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 10वीं अनुसूची के तहत एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के इनकार को चुनौती दी गई।
उद्धव ठाकरे द्वारा दायर अन्य याचिका भी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की गई, जो ECI के फैसले को चुनौती देती है, जिसने एकनाथ शिंदे गुट को आधिकारिक शिव सेना के रूप में मान्यता दी थी और उसे 'धनुष और तीर' प्रतीक के उपयोग की अनुमति दी थी।
शिंदे सेना के सीनियर एडवोकेट ध्रुव मेहता ने तर्क दिया कि विधानसभा स्पीकर के अयोग्य ठहराने से इनकार के खिलाफ अपील विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निरर्थक हो गई।
मेहता ने प्रस्तुत किया कि संविधान के अनुच्छेद 172 के तहत कार्यकाल समाप्त होने पर प्रतिवादी महाराष्ट्र विधान सभा के सदस्य नहीं रह गए। नतीजतन, न्यायालय अब उन्हें उस विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य ठहराते हुए कोई ठोस राहत नहीं दे सकता।
उन्होंने कहा कि फिर भी ठाकरे गुट यह घोषणा करने की मांग कर रहा है कि शिंदे गुट के विधायक दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए गए हैं। उनका तर्क, उन्होंने समझाया, यह था कि इस तरह की घोषणा दलबदल के कथित कृत्यों से संबंधित होगी, विधायी बहुमत को कमजोर कर देगी जिस पर ECI ने भरोसा किया। परिणामस्वरूप शिंदे गुट को मान्यता देने वाले आयोग के फैसले की वैधता प्रभावित होगी।
मेहता ने तर्क दिया कि यह राहत अस्वीकार्य थी क्योंकि दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर की शक्तियां सदन के सदस्यों से संबंधित अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने तक ही सीमित थीं।
किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू पर भरोसा करते हुए मेहता ने तर्क दिया कि अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के तहत न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करता है और स्पीकर का अधिकार क्षेत्र सदन के सदस्यों से संबंधित अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने तक ही सीमित है। उन्होंने कहा कि स्पीकर किसी व्यक्ति के सदस्य नहीं रहने के बाद अयोग्यता की घोषणा जारी नहीं कर सकता।
उन्होंने तर्क दिया,
"स्पीकर की शक्ति क्या है? स्पीकर की शक्ति या तो याचिका को स्वीकार करना और अयोग्य घोषित करना या याचिका को अस्वीकार करना है। दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर को कोई तीसरी शक्ति नहीं दी गई।"
मेहता ने आगे तर्क दिया कि अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र स्पीकर के अधिकार क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने कहा कि किहोतो होलोहन फैसले के अनुसार, स्पीकर के फैसले की न्यायिक समीक्षा के लिए सीमित आधार हैं, अर्थात् संवैधानिक जनादेश का उल्लंघन, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, विकृति और दुर्भावना।
उन्होंने स्पीकर के अधिकार का हवाला देते हुए कोर्ट से पूछा,
"यदि समीक्षा क्षेत्राधिकार के प्रयोग में स्रोत के पास शक्ति नहीं थी, तो क्या आपके पास ऐसी शक्ति है?"
उन्होंने प्रस्तुत किया कि सामान्य प्रक्रिया जहां स्पीकर का निर्णय कानूनी कमजोरी से ग्रस्त होता है, वह है सुभाष देसाई बनाम प्रधान सचिव, महाराष्ट्र के राज्यपाल पर भरोसा करते हुए मामले को स्पीकर के पास भेज देना। उन्होंने राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य को प्रतिष्ठित किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं अयोग्यता के मुद्दे का फैसला किया, क्योंकि रिमांड से विधानसभा की समाप्ति की निकटता को देखते हुए कार्यवाही निरर्थक हो जाती।
मेहता ने दसवीं अनुसूची और 'महाराष्ट्र विधानसभा सदस्य (दल-बदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1986' का भी हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अयोग्यता की कार्यवाही मौजूदा सदस्यों से संबंधित होती है। उन्होंने उन मामलों को अलग रखा, जिनमें विधायक अयोग्यता से बचने के लिए इस्तीफा दे देते हैं; उन्होंने कहा कि मौजूदा मामले में स्वेच्छा से इस्तीफा देने के बजाय, कानून के तहत विधानसभा का कार्यकाल ही समाप्त हो गया।
शिंदे गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह ने तर्क दिया कि असली शिवसेना कौन सी है, यह तय करने के लिए चुनाव आयोग का 'विधायी बहुमत परीक्षण' (Legislative-majority Test) पर भरोसा करना सही था। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पार्टी ने आंतरिक चुनाव नहीं कराए थे, जिससे 'संगठनात्मक बहुमत परीक्षण' (Organisational-majority Test) लागू करना उपयुक्त नहीं रह गया।
सिंह ने कहा कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' की धारा 29A के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों के लिए आंतरिक लोकतंत्र बनाए रखना और संगठनात्मक चुनाव कराना अनिवार्य है। उन्होंने तर्क दिया कि जहां पदाधिकारियों को चुनाव के बजाय नामित (Nominate) किया जाता है, जहां संगठनात्मक बहुमत परीक्षण का कोई महत्व नहीं रह जाता और इसे बिना सोचे-समझे लागू नहीं किया जा सकता।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और तेलुगु देशम पार्टी से जुड़े चुनाव आयोग के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए सिंह ने तर्क दिया कि जब संगठनात्मक ढांचे में ही लोकतांत्रिक वैधता न हो, तो संगठनात्मक बहुमत को निर्णायक नहीं माना जा सकता। उन्होंने 'ओ.पी. सिंगला' मामले में चर्चा किए गए "नियम के टूटने" (breaking down of the rule) के सिद्धांत का भी उल्लेख किया।
सिंह ने तर्क दिया कि जहां पदाधिकारी बार-बार चुनाव टालकर या तदर्थ (ad hoc) समितियां बनाकर संगठनात्मक चुनावों से बचते हैं, वहाँ ऐसी समितियों के भीतर बहुमत परीक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
उन्होंने 'चुनाव प्रतीक (आरक्षण और आवंटन) आदेश' के पैराग्राफ 6A, 6B और 6C का हवाला दिया, जो चुनावी प्रदर्शन के आधार पर राजनीतिक दलों को मान्यता देने से संबंधित हैं। उन्होंने तर्क दिया कि धारा 29A(5) के तहत आंतरिक लोकतंत्र की आवश्यकता, चुनाव आयोग द्वारा 'प्रतीक आदेश' के पैराग्राफ 15 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करने के संदर्भ में प्रासंगिक है। यह पैराग्राफ किसी राजनीतिक दल के विरोधी गुटों के बीच विवादों को सुलझाने से संबंधित है।
सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि आयोग से शिवसेना का पंजीकरण रद्द करने या उसके आंतरिक चुनावों से जुड़े किसी सामान्य विवाद पर फैसला करने के लिए नहीं कहा गया। इसके बजाय, संगठनात्मक ढांचा इस बात को तय करने के लिए प्रासंगिक था कि विरोधी गुटों के दावों को सुलझाने के लिए कौन सा परीक्षण (Test) सही ढंग से लागू किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब आयोग ने चुनाव चिह्न से जुड़े विवाद पर अंतिम फैसला ले लिया है तो इसे अनिश्चित काल तक खुला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने ECI के फैसले की समीक्षा का विरोध करते हुए कहा कि अलग-अलग गुट ECI द्वारा तय किए गए चुनाव चिह्नों के तहत कई चुनाव लड़ चुके हैं, और मतदाता भी उन चिह्नों पर वोट डाल चुके हैं।
Case Title : Sunil Prabhu v. Eknath Shinde