सुशील श्रीवास्तव हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को पुलिस सुरक्षा मांगने की इजाज़त दी, आरोपियों की रिहाई के खिलाफ अपील स्वीकार की
अपने पिता की हत्या के मामले में 5 आरोपियों के बरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मारे गए गैंगस्टर सुशील श्रीवास्तव के बेटे को पुलिस सुरक्षा मांगने की इजाज़त दी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने यह आदेश तब दिया, जब उन्होंने श्रीवास्तव के बेटे (याचिकाकर्ता) द्वारा झारखंड हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील स्वीकार की, जिसमें इस मामले के 5 मुख्य आरोपियों को बरी कर दिया गया और उनकी रिहाई का आदेश दिया गया।
कोर्ट ने कहा,
"याचिकाकर्ता राज्य के DGP को संबोधित करते हुए एक उचित आवेदन दे सकता है, जिसमें वह उचित पुलिस सुरक्षा की मांग कर सकता है। यदि ऐसा कोई आवेदन दिया जाता है तो DGP जल्द-से-जल्द उस पर विचार करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि इस मामले में कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए।"
संक्षेप में मामला
यह मामला 2015 की एक घटना से जुड़ा है, जब कुख्यात अपराधी सुशील श्रीवास्तव और उसके 2 साथियों की हज़ारीबाग सिविल कोर्ट परिसर के अंदर गोली मारकर हत्या कर दी गई। हमलावरों ने AK-47 राइफलों का इस्तेमाल करते हुए तब गोलीबारी शुरू कर दी थी, जब श्रीवास्तव कोर्ट में पेशी के बाद लौट रहा था; हमलावरों ने एक हैंड ग्रेनेड भी फेंका था। इस हमले के परिणामस्वरूप, श्रीवास्तव और उसके साथियों को गोलियों के घाव लगे और अंततः उनकी मृत्यु हो गई।
जांच और चार्जशीट दाखिल होने के बाद इस मामले में IPC की धारा 120B, 341/120B, 353/120B, 307/120B, 302/120B; शस्त्र अधिनियम (Arms Act) की धारा 25(1A)/35, 26/35, 27(3) और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम (Explosives Substance Act) की धारा 3/4/5 के तहत आरोप तय किए गए।
2020 में हज़ारीबाग सेशन कोर्ट ने 5 आरोपियों - विशाल तिवारी, संतोष पांडे, विशाल कुमार सिंह, दिलीप साहू और राहुल देव पांडे - को दोषी ठहराया। उन सभी को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।
अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ आरोपियों ने हाई कोर्ट का रुख किया। 18 फरवरी के विवादित फैसले में हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। यह राय व्यक्त की गई कि जांच अख़बारों की रिपोर्टों से प्रभावित थी और अभियुक्तों के बीच किसी भी तरह की साज़िश का कोई सबूत सामने नहीं आया।
आगे कहा गया,
"साज़िश का यह सिद्धांत सुशील श्रीवास्तव और विकास तिवारी के बीच कथित तौर पर मौजूद दुश्मनी पर आधारित है। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए किसी भी तथ्य से यह साबित नहीं होता कि अपीलकर्ताओं ने वास्तव में कोई साज़िश रची थी और सुशील श्रीवास्तव की हत्या उसी साज़िश का अंतिम परिणाम थी।"
हाईकोर्ट द्वारा बरी किए जाने के फ़ैसले से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
Case Title: AVIK KUMAR SRIVASTAVA v. THE STATE OF JHARKHAND, Crl.A. No. 1451-1453/2026