सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस तरीके की आलोचना की, जिससे सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज (CAPFs) में IPS अधिकारियों की डेप्युटेशन से जुड़ी अवमानना ​​याचिकाओं को रेगुलर बेंच की कॉज़ लिस्ट से हटाकर बाद में स्पेशल बेंच के सामने लिस्ट किया गया।

मंगलवार को जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस एएस चंदुरकर की बेंच की कॉज़ लिस्ट से अवमानना ​​याचिकाओं को अचानक हटाने के बाद जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की स्पेशल बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। ये याचिकाएं CAPF कैडर में IPS डेप्युटेशन पदों को धीरे-धीरे कम करने और अंततः खत्म करने के सुप्रीम कोर्ट के 25 मई के फैसले का कथित तौर पर पालन न करने से जुड़ी हैं।

शुरुआत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने स्पेशल बेंच के सामने मामले को लिस्ट करने के तरीके पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मामले को दूसरी बेंच के सामने लिस्ट करने के अनुरोध के बारे में उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई।

बेंच ने रजिस्ट्री की एक रिपोर्ट देखी, जिसमें बताया गया कि मंगलवार को अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई करने वाली बेंच के सामने मामला क्यों लिस्ट नहीं किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि अवमानना ​​और रिट याचिकाओं (CAPF Act को चुनौती देने वाली) दोनों में प्रतिवादियों (केंद्र) का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने CJI के सामने इन मामलों को एक ही बेंच के सामने लिस्ट करने का अनुरोध किया। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि अवमानना ​​की कार्यवाही में बचाव का एक आधार वह एक्ट है, जिसकी वैधता को संबंधित रिट याचिकाओं में चुनौती दी गई। बता दें, अवमानना ​​याचिकाएं जस्टिस भुइयां (जिन्होंने मई 2025 का फैसला लिखा था) की बेंच के सामने थीं और रिट याचिकाएं जस्टिस मिश्रा की बेंच के सामने थीं।

दीवान ने प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा,

"आप लिस्टेड मामले को बोर्ड से ऐसे नहीं हटा सकते। यह पूरे देश की अदालत है। लोग यात्रा की व्यवस्था करते हैं और देश भर से यहां आते हैं। एक बार लिस्ट होने के बाद इसे क्यों हटाया जाना चाहिए?"

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि जजों को भी मंगलवार देर रात करीब 9 बजे ही सूचित किया गया कि स्पेशल बेंच का गठन किया गया। दीवान ने कहा कि इस घटनाक्रम को समझाने के लिए रजिस्ट्री के अधिकारी मौजूद रह सकते थे और उन्होंने तर्क दिया कि सार्वजनिक रूप से अधिसूचित मामले को उसी तरह लिया जाना चाहिए जैसा कि उसे लिस्ट किया गया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्ण कुमार ने कहा कि 22 सितंबर को जब अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई हुई, तब रिट याचिकाओं के साथ इसे लिस्ट करने का कोई अनुरोध नहीं किया गया और मंगलवार को भी ऐसा कोई संकेत नहीं मिला।

बेंच ने पूछा कि क्या यह सच नहीं है कि अवमानना ​​की कार्यवाही में यह एक्ट ही बचाव का आधार है।

दीवान ने इस बात का खंडन करते हुए कहा कि अवमानना ​​का मामला एक्ट से अलग, आदेशों के पालन से जुड़ा है।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि उन्होंने इन मामलों की एक साथ सुनवाई का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि 22 सितंबर को जब अवमानना ​​याचिका पर सुनवाई हो रही थी, तब केंद्र का मुख्य बचाव यही एक्ट है, इसलिए उन्होंने अनुरोध किया कि दोनों मामलों के समूहों की एक साथ सुनवाई हो।

उन्होंने कहा कि जब बेंच ने संकेत दिया कि मामलों की एक साथ सुनवाई नहीं हो सकती तो उन्होंने बाद में CJI के सामने यह मामला उठाया और अनुरोध किया कि दोनों समूहों को साथ लिया जाए।

बेंच ने भाटी से कहा कि याचिकाकर्ताओं को इस अनुरोध के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।

जस्टिस मिश्रा ने कहा,

"उन्हें हैरानी हुई। यह जानकारी बेंच को दी जानी चाहिए।"

भाटी ने माफ़ी मांगते हुए कहा,

"मैं माफ़ी मांगता हूँ। यह मेरी गलती है।"

इसके बाद सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी माफ़ी मांगी।

बेंच ने देखा कि मामलों को अब एक साथ मिला दिया गया और संकेत दिया कि इस बात पर अलग से विचार किया जाएगा कि क्या इस एक्ट ने पिछले फ़ैसले का आधार खत्म किया या उसके निर्देशों को ओवरराइड किया।

कोर्ट ने नोट किया कि संबंधित रिट याचिकाओं में जवाब दाखिल करने की तारीख 18 नवंबर, 2026 थी, और प्रस्ताव दिया कि पक्षकार तब तक अपनी दलीलें (प्लीडिंग्स) एक-दूसरे को सौंप दें।

हालांकि, दीवान ने कोर्ट से आग्रह किया कि रिट याचिकाओं का इंतज़ार किए बिना अवमानना ​​याचिका पर अलग से सुनवाई की जाए।

उन्होंने कहा,

"मैं अवमानना ​​मामले पर आगे बढ़ना चाहता हूं। अगर यह उनका बचाव है, तो माननीय कोर्ट अवमानना ​​मामले में उचित आदेश पारित कर सकता है। विशेष रूप से समय-सीमा वाले निर्देश जारी किए गए थे जिनका एक्ट से कोई लेना-देना नहीं था। हम नहीं चाहते कि हमारी अवमानना ​​याचिका को रिट याचिका से जोड़ा जाए।"

मेहता ने इस अनुरोध का विरोध करते हुए कहा कि अवमानना ​​की कार्यवाही को रिट याचिकाओं से अलग नहीं किया जा सकता और दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार दोनों मामलों में अपने हलफ़नामे दाखिल करेगी।

दीवान ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करेंगे कि अवमानना ​​की कार्यवाही में उठाए गए मुद्दे रिट याचिकाओं से अलग हैं।

इसके बाद दीवान ने उन खास निर्देशों की ओर इशारा किया, जो उनके अनुसार एक्ट से अलग थे। उन्होंने कहा कि फ़ैसले की तारीख (जो 23 मई, 2025 को आया था) से छह महीने के भीतर कैडर रिव्यू किया जाना था।

दीवान ने कहा,

"इसका एक्ट से कोई लेना-देना नहीं है।"

मेहता ने अनुरोध किया कि मामले को अगले हफ़्ते सुना जाए, क्योंकि केंद्र को समय चाहिए।

मेहता ने कहा कि केंद्र को तैयारी करने और कोर्ट की मदद करने के लिए कुछ समय मिलना चाहिए।

प्रतिवादियों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने कहा कि यह जांचना ज़रूरी होगा कि एक्ट ने पिछले निर्देशों को कैसे ओवरराइड किया और उनकी अनुपस्थिति में इस मुद्दे पर फ़ैसला नहीं किया जा सकता।

बेंच ने कहा कि वह इस बात पर विचार करेगी कि क्या फ़ैसले में एक्ट से अलग कोई निर्देश थे और क्या उन निर्देशों का पालन किया गया। बेंच ने ध्यान दिलाया कि पहले दिए गए निर्देशों में तय समय-सीमा पहले ही खत्म हो चुकी है।

कुमार ने कहा कि डेप्युटेशन (प्रतिनियुक्ति) ही अवमानना ​​की कार्यवाही का मुख्य मुद्दा है और आरोप लगाया कि 22 सितंबर के बाद तीन और डेप्युटेशन किए गए। उन्होंने प्रतिवादियों से इस दौरान कोई और कदम न उठाने का आग्रह किया।

द्विवेदी ने जवाब दिया कि कानून डेप्युटेशन की इजाज़ता देता है।

बेंच ने साफ़ किया कि मामले को खास तौर पर 15 अक्टूबर के लिए तय किया जा रहा है ताकि यह तय किया जा सके कि क्या संबंधित निर्देश कानून से अलग थे और अगर ऐसा था, तो क्या उन निर्देशों का पालन किया गया।

मेहता ने फिर कहा कि कानून में डेप्युटेशन का प्रावधान है, इसलिए कार्यवाही में डेप्युटेशन का सवाल उठेगा।

दीवान ने प्रतिवादियों से अगली तारीख से पहले पहले के निर्देशों का पालन करने का आग्रह किया।

अपने आदेश में बेंच ने रजिस्ट्री की यह बात दर्ज की कि 29 सितंबर को अवमानना ​​याचिका की सुनवाई करने वाली बेंच के सामने मामला नहीं रखा गया। साथ ही रजिस्ट्री की रिपोर्ट के अनुसार, अवमानना ​​और रिट याचिकाओं दोनों में प्रतिवादियों के वकीलों ने CJI के सामने इन मामलों का ज़िक्र किया ताकि उन्हें एक ही बेंच के सामने सूचीबद्ध किया जा सके।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की यह बात भी दर्ज की कि अवमानना ​​कार्यवाही का आधार बने कई निर्देश उस कानून के दायरे में नहीं आते, जिसकी वैधता को चुनौती दी गई, इसलिए रिट याचिका की सुनवाई की तारीख तक अवमानना ​​की सुनवाई को टाला नहीं जाना चाहिए।

बेंच ने निर्देश दिया कि मामले को 15 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे रिट याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया जाए। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि लिस्टिंग के मुद्दे पर रजिस्ट्री द्वारा दी गई जानकारी को सीलबंद लिफ़ाफ़े में रखा जाए।

Case : Mahendra Singh Deo v Govind Mohan and others | CONMT.PET.(C) No. 37/2026 in C.A. No. 13106/2024.

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