सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने बुधवार (4 नवंबर) को कहा कि मौजूदा बिक्री कर (Sales Tax) के आधार पर अतिरिक्त बिक्री कर या सरचार्ज लगाने की राज्यों की विधायी शक्ति से जुड़ा करीब 27 साल पुराना संदर्भ (Reference) अब अकादमिक हो गया है, क्योंकि देश में वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था लागू हो चुकी है।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जिस संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था के तहत राज्यों द्वारा ये अतिरिक्त कर लगाए जाते थे, उसे GST व्यवस्था ने प्रतिस्थापित कर दिया है। इसलिए इस संदर्भ पर अब सात जजों की पीठ द्वारा फैसला सुनाए जाने की आवश्यकता नहीं रह गई है।

पीठ में CJI सूर्यकांत के अलावा जस्टिस केवी विश्वनाथन, जस्टिस एसवी भट्टी, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस एनवी अंजारिया और जस्टिस वी मोहना शामिल थे।

यह मामला Arjun Flour Mills v. State of Odisha से संबंधित था। इसमें ओडिशा सरकार द्वारा डीलरों के वार्षिक टर्नओवर के आधार पर 10% और 15% अतिरिक्त बिक्री कर लगाने की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था।

क्या था संवैधानिक सवाल?

इस मामले में मुख्य सवाल यह था कि क्या राज्य विधानसभाओं को संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (List II) की प्रविष्टि 54 के तहत पहले से देय बिक्री कर के आधार पर अतिरिक्त कर लगाने का अधिकार प्राप्त है, या ऐसा कर लगाना केंद्र की कर लगाने की शक्ति यानी संघ सूची (List I) की प्रविष्टि 82 के तहत आने वाले आयकर के क्षेत्र में हस्तक्षेप होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि किसी मौजूदा कर के आधार पर प्रतिशत के रूप में अतिरिक्त कर या सरचार्ज लगाया जाना अपने आप में राज्य की विधायी क्षमता से बाहर नहीं हो जाता। ऐसा अतिरिक्त कर मूल कर की दर में वृद्धि के रूप में देखा जाएगा और इसकी संवैधानिक वैधता का परीक्षण भी उसी आधार पर किया जाएगा जिस आधार पर मूल कर का परीक्षण होता है।

पीठ ने कहा कि India Cement मामले में यह नहीं कहा गया था कि किसी अन्य कर के प्रतिशत के आधार पर निर्धारित किया गया कर केवल इसी कारण से विधायी क्षमता से बाहर हो जाएगा। इसके अलावा, India Cement में रॉयल्टी को कर मानने की अवधारणा को बाद में नौ जजों की पीठ ने Mineral Area Development Authority मामले में खारिज कर दिया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के रूप में निर्धारित अतिरिक्त कर या सरचार्ज को बिक्री कर की दर में वृद्धि माना जाएगा। यह तत्कालीन प्रविष्टि 54 के तहत वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर लगाया जाने वाला कर ही रहेगा।

हालांकि, कोर्ट ने कहा कि संबंधित संवैधानिक प्रविष्टि और जिन राज्य कानूनों के तहत ये अतिरिक्त कर लगाए गए थे, उन्हें GST व्यवस्था के बाद बदल दिया गया है। इसलिए इस सवाल का अब भविष्य में कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है।

पीठ ने किन सवालों को खुला रखा?

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब जनरल सेल्स टैक्स एक्ट, 1948 के तहत लगाए गए सरचार्ज की वैधता से जुड़े कुछ सवालों को खुला रखा। इनमें यह सवाल भी शामिल है कि क्या बिक्री कर से छूट प्राप्त औद्योगिक इकाइयों को भी सरचार्ज का भुगतान करने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

इसके अलावा, पंजाब सोशल सिक्योरिटी एक्ट, 2000 के तहत वसूले गए उपकर (Cess) की राशि को सीधे पंजाब सोशल सिक्योरिटी फंड में जमा किए जाने की वैधता का सवाल भी खुला रखा गया। इस संदर्भ में यह विचार किया जाना था कि क्या ऐसी राशि को संविधान के अनुच्छेद 266 के तहत पहले राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund) में जमा करना आवश्यक था।

व्यक्तिगत मामलों में पक्षकारों के अन्य सभी तर्क, जिनमें कर निर्धारण और उससे मिलने वाली परिणामी राहत से जुड़े सवाल शामिल हैं, भी खुले रखे गए।

कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि मुख्य मामले और इससे जुड़े अन्य मामलों को उचित नियमित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, ताकि उनका निपटारा किया जा सके।

जस्टिस केवी विश्वनाथन की अलग राय

जस्टिस केवी विश्वनाथन ने अपने अलग मत में Hoechst Pharmaceuticals, S Kodar और India Cement के फैसलों के बीच कथित विरोधाभास का विश्लेषण किया।

उन्होंने कहा कि S Kodar मामले में दिया गया फैसला सही था और आज भी वैध कानून है। उनके अनुसार, Kodar और Hoechst के फैसलों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। वहीं, India Cement में अलग तरह के कानूनी सवाल और संवैधानिक प्रविष्टियां शामिल थीं, इसलिए उस फैसले के आधार पर Kodar के निष्कर्ष को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने कहा कि यदि किसी डीलर का वार्षिक टर्नओवर निर्धारित न्यूनतम सीमा से अधिक है और उसके द्वारा देय बिक्री कर के आधार पर अतिरिक्त कर लगाया जाता है, तो ऐसा कर राज्य सूची की प्रविष्टि 54 के तहत वस्तुओं की बिक्री पर कर के रूप में वैध है। खासकर तब, जब इस अतिरिक्त कर का भार उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाता।

क्या था पूरा मामला?

यह संदर्भ Arjun Flour Mills v. State of Odisha मामले से उत्पन्न हुआ था। इसमें ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5A को चुनौती दी गई थी। वर्ष 1997 में जोड़ी गई इस धारा के तहत 10 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये तक वार्षिक टर्नओवर वाले डीलरों पर 10% अतिरिक्त कर और 1 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर वाले डीलरों पर 15% अतिरिक्त कर लगाया गया था।

इस विवाद की पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट के तीन महत्वपूर्ण फैसले थे।

Hoechst Pharmaceuticals मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार फाइनेंस एक्ट के तहत लगाए गए सरचार्ज को राज्य सूची की प्रविष्टि 54 के तहत वैध बिक्री कर माना था।

इसके बाद पांच जजों की पीठ ने S Kodar v. State of Kerala मामले में तमिलनाडु अतिरिक्त बिक्री कर अधिनियम, 1970 के तहत लगाए गए अतिरिक्त बिक्री कर को बरकरार रखा था। कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया था कि ऐसा कर वास्तव में डीलर की आय पर लगाया गया कर है।

हालांकि, सात जजों की पीठ ने India Cement Ltd. v. State of Tamil Nadu मामले में खनन रॉयल्टी से जुड़े उपकर और सरचार्ज को रद्द कर दिया था। इसके बाद इन फैसलों के बीच कथित विरोधाभास को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1999 में इस कानूनी सवाल को सात जजों की पीठ के पास भेज दिया था।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी थी कि वर्ष 2017 में GST लागू होने के बाद ये सवाल काफी हद तक अकादमिक हो चुके हैं, हालांकि कुछ लंबित मामलों में इन पर विचार करना आवश्यक हो सकता है।

उन्होंने यह भी कहा था कि केंद्र सरकार India Cement के फैसले की शुद्धता को लेकर अपनी आपत्तियां रखती है, लेकिन मौजूदा कार्यवाही में केंद्र इस मुद्दे को नहीं उठा रहा है।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि India Cement का फैसला अब अच्छा कानून नहीं रह गया है और S Kodar के फैसले को बाद के निर्णयों में स्वीकृति मिली है।

गौरतलब है कि सात जजों की संविधान पीठ ने 22 सितंबर 2026 को मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

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