सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ऐसी याचिका पर तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें 2026 के दिवाली त्योहार के दौरान घरेलू हवाई किराए में भारी बढ़ोतरी का मुद्दा उठाया गया। याचिका में सरकार से मांग की गई कि त्योहारों के दौरान घरेलू उड़ानों के किराए को सीमित (कैप) करने के लिए कोई व्यवस्था बनाई जाए।

याचिका में मौजूदा त्योहारों के सीजन और साल के अंत में आने वाले त्योहारों के दौरान किराए को सीमित करने के लिए अंतरिम निर्देश देने की भी मांग की गई।

इस अर्जी को जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश सिंह की बेंच के सामने रखा गया।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील अभिनव ने बताया कि हवाई किराया सामान्य किराए के मुकाबले 700% तक बढ़ गया। उन्होंने कहा कि हवाई यात्रा आवश्यक सेवा है और किराए में इतनी बढ़ोतरी संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

जस्टिस नाथ ने मामले को सूचीबद्ध करने से इनकार करते हुए कहा,

“हवाई यात्रा न करें। अगला मामला।”

यह अंतरिम अर्जी याचिकाकर्ता एस. लक्ष्मीनारायण ने अपनी लंबित जनहित याचिका (PIL) के तहत दायर की। उनकी यह PIL एल्गोरिदम-आधारित डायनेमिक प्राइसिंग, अचानक टिकट की कीमतों में भारी बढ़ोतरी और अन्य अतिरिक्त शुल्कों के खिलाफ है। कोर्ट के पिछले आदेश के अनुसार, इस PIL पर अब 16 नवंबर 2026 को सुनवाई होनी है।

30 अक्टूबर को दायर इस अर्जी में त्योहारों के दौरान हवाई किराए को सीमित करने और इकोनॉमी क्लास में मुफ्त चेक-इन बैगेज की सीमा को वापस 25 किलोग्राम करने के लिए अंतरिम निर्देश मांगे गए।

गौरतलब है कि इसी PIL में सुप्रीम कोर्ट के दबाव के बाद केंद्र सरकार ने 1 नवंबर को 'भारतीय वायुयान नियम, 2026' (Bharatiya Vayuyan Niyam, 2026) अधिसूचित किए। जनवरी 2026 में त्योहारों और भारी मांग वाले समय में हवाई टिकट की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी को देखते हुए कोर्ट ने इस मामले में दखल देने का फैसला किया।

ये नए नियम 1 जनवरी 2027 से लागू होंगे।

इन नियमों के तहत अगर किसी असाधारण परिस्थिति में जनहित के लिए दखल देना जरूरी हो, तो केंद्र सरकार एयरलाइंस को किराए के संबंध में निर्देश जारी कर सकती है। नियम 192 के तहत, शेड्यूल एयर सर्विस चलाने वाली एयरलाइनों के लिए यह अनिवार्य है कि वे परिचालन लागत (ऑपरेशनल कॉस्ट) जैसे कारकों के आधार पर अपना किराया तय करें और किराए का विवरण नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को सौंपें।

याचिकाकर्ता की अर्जी (IA) में कहा गया कि दिवाली से पहले कई प्रमुख घरेलू मार्गों पर किराया सामान्य स्तर से 2 से 7 गुना तक बढ़ गया। इसमें 29 अक्टूबर की 'हिंदुस्तान' की रिपोर्ट का हवाला दिया गया, जिसके अनुसार दिल्ली-कोलकाता का टिकट, जिसकी कीमत आमतौर पर 10,000 से 11,000 रुपये होती है, 6 नवंबर की यात्रा के लिए 78,694 रुपये तक पहुंच गया।

याचिकाकर्ता ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि एक ही दिन और एक ही रूट पर चलने वाली उड़ानों के किराए में भारी अंतर है। अर्जी के अनुसार, 6 नवंबर को सुबह 5 बजे बेंगलुरु से दिल्ली जाने वाली एक उड़ान का किराया लगभग 15,901 रुपये था, जबकि उसी दिन दोपहर 3:45 बजे की उड़ान का किराया 40,506 रुपये था। इसी तरह मुंबई-दिल्ली का किराया 11,531 रुपये से बढ़कर 60,577 रुपये हो गया, जबकि दिल्ली-मुंबई का किराया 5,223 रुपये से बढ़कर 26,793 रुपये हो गया।

अर्जी में तर्क दिया गया कि एयरलाइंस किराए में इतनी बढ़ोतरी को केवल 'एविएशन टर्बाइन फ्यूल' (ATF) की लागत का हवाला देकर सही नहीं ठहरा सकतीं, क्योंकि एक ही दिन और एक ही रूट पर चलने वाली उड़ानें लगभग बराबर मात्रा में ईंधन की खपत करती हैं।

अर्जी में कहा गया,

"एयरलाइंस किराए में इस बढ़ोतरी के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल की लागत को जिम्मेदार ठहराती हैं। प्रतिवादी नंबर 1 (भारत संघ) ने भी सार्वजनिक रूप से इसी तर्क का समर्थन किया। लेकिन यह तर्क जांच में टिक नहीं पाता। एक ही रूट और एक ही दिन सुबह 5:00 बजे और दोपहर 3:45 बजे की उड़ानों में ईंधन की खपत एक समान होती है, फिर भी एक उड़ान का किराया दूसरी उड़ान के मुकाबले ढाई गुना से भी ज्यादा है। 13.07.2026 को हुई सुनवाई के दौरान, माननीय न्यायालय ने गौर किया कि एयरलाइंस 100% से 300% तक की किराया बढ़ोतरी को सही ठहराने के लिए ईंधन की कीमतों और भू-राजनीतिक घटनाओं का हवाला देती हैं, जबकि कुल लागत पर ईंधन का असर बहुत कम होता है। ईंधन की लागत बढ़ने पर किराए में मामूली बदलाव तो जायज हो सकता है, लेकिन सामान्य किराए से 7 गुना ज्यादा किराया किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।"

इसमें कहा गया कि जब हवाई किराए तय करने का आधार 'ऑपरेटिंग कॉस्ट' (परिचालन लागत) के बजाय मुख्य रूप से 'मांग' (डिमांड) होता है तो इससे एयरलाइनों को त्योहारों और भारी मांग वाले अन्य समयों पर यात्रियों का शोषण करने का मौका मिल जाता है।

याचिकाकर्ता ने केंद्र सरकार और विमानन प्राधिकरणों से मांग की है कि वे त्योहारों के दौरान घरेलू हवाई किराए की एक अधिकतम सीमा (कैप) तय करने के लिए कोई व्यवस्था बनाएं। साथ ही जब तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बन जाती, तब तक मौजूदा त्योहारों के सीजन और साल के अंत में होने वाली यात्राओं के दौरान 'इकोनॉमी क्लास' के किराए पर अस्थायी सीमा लगाई जाए।

याचिका में कहा गया,

"मांगी गई राहत सीमित और अस्थायी है। इसके बाद भी एयरलाइनों की कमाई उनकी लागत से काफी अधिक बनी रहेगी। एक बार जब यात्री किराया चुका देते हैं या यात्रा छोड़ देते हैं तो उनके पास कोई उपाय नहीं बचता। इसलिए, यह मांग पूरी तरह से उचित है और यात्रियों के हित में है।"

इसमें त्योहारों के दौरान मुफ्त चेक-इन बैगेज की सीमा को 15 किलोग्राम से बढ़ाकर वापस 25 किलोग्राम करने की भी मांग की गई।

याचिका में कहा गया,

"यात्रियों पर बोझ सिर्फ किराए तक सीमित नहीं है। जैसा कि रिट याचिका में बताया गया, घरेलू उड़ानों के इकोनॉमी क्लास में मुफ्त चेक-इन बैगेज की सीमा, जो पहले 25 किलोग्राम हुआ करती थी, उसे घटाकर 15 किलोग्राम कर दिया गया। त्योहारों पर यात्रा करने वाले लोग, जो अपने साथ उपहार और घर का सामान ले जाते हैं, उन्हें पहले से ही बढ़े हुए किराए के ऊपर अतिरिक्त बैगेज शुल्क भी देना पड़ता है।"

याचिका में कहा गया कि त्योहारों के समय ट्रेनों के कन्फर्म टिकट कई हफ्ते पहले ही खत्म हो जाते हैं। ऐसे में, जिन लोगों को त्योहारों के लिए या फिर बीमारी, मृत्यु या रोजगार जैसी आपातकालीन स्थितियों में यात्रा करनी होती है, उनके पास हवाई यात्रा के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता। इसमें तर्क दिया गया है कि किसी अन्य आवश्यक सेवा की कीमत इस तरह से तय नहीं की जाती है।

इसमें कहा गया,

"किसी व्यक्ति को त्योहार पर घर पहुंचना हो, या बीमारी, मृत्यु या रोजगार के कारण अचानक यात्रा करनी पड़े तो उसके पास हवाई जहाज से जाने और जो भी किराया मांगा जाए, उसे चुकाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। त्योहारों के दौरान इन रूटों पर उड़ानें पूरी तरह भरी होती हैं, इसलिए एयरलाइनों को नुकसान का कोई खतरा नहीं होता। किसी अन्य आवश्यक सेवा की कीमत इस तरह से तय नहीं की जाती। रेलवे का 'फ्लेक्सी फेयर' बेस फेयर के अधिकतम डेढ़ गुना तक सीमित है; आवश्यक दवाओं की कीमतें 'ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013' के तहत नियंत्रित हैं; और बिजली की दरें नियामक आयोगों द्वारा तय की जाती हैं। ऐसे में, हवाई यात्रा इसका एकमात्र अपवाद नहीं हो सकती।"

याचिका में कहा गया कि केंद्र सरकार और DGCA के पास मनमाने और अत्यधिक किराए के खिलाफ निर्देश जारी करने की शक्ति है, लेकिन वे कोई कदम नहीं उठाते, जिससे एयरलाइनों को यात्रियों का शोषण करने की छूट मिल जाती है।

इसमें कहा गया,

“कार्रवाई करने की शक्ति मौजूद है। 'एयरक्राफ्ट रूल्स, 1937' का नियम 135 - जिसे 'भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024' की धारा 43(2) के तहत सुरक्षित रखा गया- यह अनिवार्य करता है कि टैरिफ (किराया) तय करते समय परिचालन लागत, उचित लाभ और आम तौर पर लागू टैरिफ को ध्यान में रखा जाए। साथ ही, यह DGCA को अत्यधिक या अनुचित रूप से ऊंचे टैरिफ के खिलाफ निर्देश जारी करने का अधिकार देता है। त्योहारों के दौरान टैरिफ में भारी उछाल भी सेवाओं में रुकावट जैसी ही परेशानी पैदा करता है; फर्क सिर्फ इतना है कि यह हर साल होता है और इसके बारे में पहले से पता होता है। प्रतिवादी संख्या 1 और 2 का चुप रहना - जबकि उनके पास अधिकार भी हैं और तथ्य सबके सामने हैं - एक तरह से जबरन वसूली को बढ़ावा देता है। यह मनमाना है और संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(d) और 21 का उल्लंघन करता है।”

Case Title : S. Laxminarayanan v. Union of India

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: