दिल्ली-NCR में दिवाली के दौरान पटाखों पर लगी पाबंदी लागू करने से जुड़े डेटा की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 अक्टूबर) को केंद्र और दिल्ली के अधिकारियों से पूछा कि पिछले साल दिल्ली-NCR में पटाखों पर लगी पाबंदी में दी गई अस्थायी ढील के बाद इसे लागू करने से जुड़ा डेटा रिकॉर्ड पर क्यों नहीं रखा गया। कोर्ट ने कहा कि जब आदेशों को ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं किया जाता, तो वे "सिर्फ एक मज़ाक" बनकर रह जाते हैं।
जस्टिस एम.एम. सुंदेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने कहा कि अधिकारियों को यह बताना होगा कि अक्टूबर 2025 में कोर्ट द्वारा सीमित समय के लिए 'ग्रीन पटाखों' की बिक्री की अनुमति देने के बाद उन्होंने क्या कदम उठाए। इसमें यह भी शामिल है कि क्या प्रवर्तन टीमें (Enforcement Teams) बनाई गईं, क्या जांच और तलाशी ली गई, क्या प्रतिबंधित पटाखे ज़ब्त किए गए और क्या कानूनी कार्रवाई शुरू की गई।
जस्टिस सुंदेश ने पूछा,
"क्या आपने टीमें बनाईं? क्या आपने कोई पूछताछ की? क्या आपने लाइसेंस धारकों के यहां तलाशी ली? आपको क्या मिला? आपने कितनी FIR दर्ज कीं? आपने और कितने मामले दर्ज किए? क्या आपने सामान ज़ब्त किया? आपने असल में क्या किया? अगर ज़मीनी स्तर पर आदेशों को लागू नहीं किया जाता, तो फिर ऐसे आदेश देने का कोई मतलब नहीं है। यह तो बस एक मज़ाक बनकर रह जाता है। प्रवर्तन से जुड़ा डेटा जमा नहीं किया गया, जो कि आपको करना चाहिए था। जब तक आदेश के साथ-साथ उसे लागू करने की व्यवस्था (Implementing Mechanism) काम नहीं करती, तब तक इन आदेशों का कोई असर नहीं होगा।"
कोर्ट ने कहा कि वह कुछ दिनों के भीतर एक आदेश जारी करेगा, जिसमें अधिकारियों को एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करना होगा। इसमें उठाए गए कदमों, लागू करने में आई दिक्कतों और प्रवर्तन को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी उपायों की जानकारी देनी होगी। कोर्ट ने संकेत दिया कि यह मामला अभी लंबित रहेगा, ताकि उसके निर्देशों के पालन की निगरानी की जा सके।
कोर्ट ने कहा कि लोगों की त्योहार से जुड़ी भावनाओं को देखते हुए वह अभी पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि अगर वे लगातार आदेशों का पालन नहीं करते हैं, तो कोर्ट को "बहुत सख्त रुख" अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
जस्टिस सुंदेश ने कहा,
“हम जनता की भावनाओं को भी समझते हैं। कोई व्यक्ति जब किसी मौके का जश्न मनाना चाहता है तो इससे उसका उत्साह बढ़ता है। तार्किक रूप से देखें तो, यह व्यक्ति के भीतर सकारात्मकता लाता है। इसलिए हम इस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इससे एक के बाद एक कई समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। लेकिन साथ ही, कृपया हमें इस मामले में कोई बहुत सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर न करें। आपको अपने सभी अधिकारियों को बुलाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे ज़मीनी स्तर पर जाकर देखें कि क्या हो रहा है। अगर आप चालान काटते हैं, किसी के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, कुछ लाइसेंस रद्द करते हैं और कुछ मामले दर्ज करते हैं तो हालात अपने आप काबू में आ जाएंगे।”
अदालत ने यह भी कहा कि इन प्रतिबंधों का टेलीविजन, समाचार पत्रों और अन्य सार्वजनिक मंचों के माध्यम से व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।
जस्टिस वराले ने रेडियो पर प्रसारित होने वाले जन-जागरूकता संदेशों का जिक्र किया, जबकि जस्टिस सुंदेश ने नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए जाने-माने खिलाड़ियों और अन्य प्रतिष्ठित हस्तियों को इसमें शामिल करने का सुझाव दिया।
उन्होंने कहा,
“जैसे कि कोई मशहूर क्रिकेटर, मान लीजिए विराट कोहली या कोई और, आप उनसे एक ऐसा संदेश देने का अनुरोध कर सकते हैं जिसमें वे कहें कि आइए इस दिवाली को आनंदमय बनाएं। आइए, रोशनी के इस त्योहार की भावना का आनंद लें। यह रोशनी का त्योहार है। जैसा कि सही कहा गया है, शुरुआत में ऐसा नहीं था। समस्या तब शुरू हुई जब आतिशबाजी का चलन आया। 14वीं-15वीं सदी में जब बारूद आया तो यह पूरी तरह से इसमें शामिल हो गया। क्योंकि यह तुरंत सामने आ जाता है। वरना, हम दीया जलाते हैं और सब लोग आराम से इसे मनाते हैं। यह कितना सुंदर लगता है। आखिरकार, यह आग ही तो है। फर्क बस इतना है कि जब आग दीये का हिस्सा होती है तो हम उसकी पूजा करते हैं। और जब यह किसी और रूप में सामने आती है, तो हम इसकी आलोचना करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा,
“लेकिन हम एक अलग रुख अपना रहे हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हम कुछ कह नहीं रहे हैं क्योंकि यह चलन बदला जा सकता है। आस्था एक अलग चीज़ है और परंपरा या चलन एक अलग चीज़ है। परंपरा तो आस्था को व्यक्त करने का एक तरीका है... लेकिन फिर भी, हमें यहाँ एक संदेश तो देना ही होगा।”
अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि शिक्षण संस्थानों को बच्चों को पटाखों से होने वाले प्रदूषण के प्रभावों के बारे में जागरूक करने का निर्देश दिया जाना चाहिए, क्योंकि बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
उन्होंने कहा,
"हमें यहाँ एक संदेश देना होगा। देखिए, मेरे थोड़े-बहुत अनुभव के अनुसार, आज की पीढ़ी (बच्चे) इस बात को लेकर काफी संशय में है। उन्हें लगता है कि यह समस्या दूसरों की है। लेकिन अगर बच्चों को सही तरीके से शिक्षित किया जाए तो वे अपने माता-पिता से ऐसा न करने के लिए कहेंगे। नई पीढ़ी ऐसा नहीं करना चाहती; वे दिवाली मनाएंगे, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन वे पटाखों में विश्वास नहीं रखते।"
सुनवाई के दौरान, एमिक्स क्यूरी (न्यायालय मित्र) और सीनियर एडवोकेट उत्तरा बब्बर ने कोर्ट को बताया कि 15 अक्टूबर 2025 के उस आदेश के क्रियान्वयन पर कोई विस्तृत रिपोर्ट दाखिल नहीं की गई है, जिसमें एक 'टेस्ट केस' के तौर पर सीमित समय के लिए 'ग्रीन पटाखों' की बिक्री की अनुमति दी गई। इस आदेश में कई उपाय बताए गए, जैसे कि बिक्री के लिए तय जगहें, गश्ती दल, QR-कोड वेरिफिकेशन, रैंडम सैंपलिंग, प्रतिबंधित उत्पादों को जब्त करना और हवा की गुणवत्ता की निगरानी करना।
उन्होंने बताया कि कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के साथ मिलकर हवा की गुणवत्ता की निगरानी करने और अपनी रिपोर्ट देने का निर्देश दिया। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस छूट के असर का कोई व्यापक आकलन नहीं किया गया—इसमें न तो रेत और पानी के नमूनों का विश्लेषण शामिल था और न ही जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का कोई विस्तृत मूल्यांकन किया गया।
उन्होंने बताया कि दिवाली के दौरान, 20 और 21 अक्टूबर 2025 की रात को दिल्ली के 39 'कंटीन्यूअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशनों' (हवा की गुणवत्ता मापने वाले केंद्रों) में से केवल 9 ने ही लगातार रीडिंग दी। उन्होंने कहा कि डेटा न मिलने के कारण—खासकर तब जब प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ गया था—हवा की गुणवत्ता में आई वास्तविक गिरावट का आकलन करना मुश्किल हो गया।
उन्होंने सितंबर 2025 में 'कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट' (CAQM) द्वारा जताई गई चिंताओं का भी हवाला दिया। इनमें पटाखों की फील्ड-लेवल टेस्टिंग न होना, निगरानी और नियमों को लागू करने में कमियां, और यह जांचने की जरूरत शामिल थी कि बाजार में बिकने वाले पटाखों में वास्तव में स्वीकृत 'ग्रीन-क्रैकर फॉर्मूलेशन' का इस्तेमाल हुआ है या नहीं।
उन्होंने बताया कि 'ग्रीन' लेबल लगाकर सामान्य पटाखे बेचे जा रहे थे, जबकि उन पर लगे QR-कोड या तो गायब थे, काम नहीं कर रहे थे, या फिर फर्जी थे। उन्होंने तर्क दिया कि 'ग्रीन पटाखे'—जिनके बारे में कहा जाता है कि वे सामान्य पटाखों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम प्रदूषणकारी कण (पार्टिकुलेट एमिशन) छोड़ते हैं—पूरी तरह से प्रदूषण-मुक्त नहीं होते हैं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 3 अप्रैल, 2025 के आदेश का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि पहले लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध पर तब तक पुनर्विचार नहीं किया जा सकता, जब तक कि कोर्ट को यह यकीन न हो जाए कि 'ग्रीन क्रैकर्स' (पर्यावरण के अनुकूल पटाखों) से होने वाला प्रदूषण न्यूनतम स्तर तक कम हो गया।
एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने इस बात को माना कि पटाखे फोड़ने के बाद प्रदूषण में बढ़ोतरी साफ तौर पर देखी गई। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल जब पटाखे फोड़ने की अनुमति दी गई, उस दौरान AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) के आंकड़ों में वृद्धि दर्ज की गई।
उन्होंने बताया कि CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) ने नवंबर 2025 में एक हलफनामा दाखिल किया, जिसमें AQI के आंकड़े शामिल थे। हालांकि, 'एमिक्स क्यूरी' (न्यायालय मित्र) ने ध्यान दिलाया कि इस हलफनामे में कोर्ट के 15 अक्टूबर के आदेश के तहत जरूरी सभी प्रवर्तन उपायों (Enforcement Measures) का जिक्र नहीं किया गया।
जस्टिस वराले ने पूछा कि क्या अधिकारियों ने उन तारीखों की जानकारी दी है, जब प्रवर्तन टीमों ने अलग-अलग जगहों का दौरा किया? साथ ही, किन जगहों का निरीक्षण किया गया, क्या आंकड़े जुटाए गए और उन निरीक्षणों के क्या नतीजे निकले?
जस्टिस सुंदरीश ने कहा कि अधिकारियों को यह स्पष्ट करना होगा कि कोर्ट के पिछले आदेश के बाद उन्होंने वास्तव में क्या कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तें तब तक बेमानी हैं, जब तक कि अधिकारी यह साबित न कर दें कि प्रवर्तन तंत्र (Enforcement Mechanism) को वास्तव में लागू कर दिया गया।
भाटी ने स्वीकार किया कि प्रवर्तन से जुड़े आंकड़े कोर्ट के सामने पेश नहीं किए गए।
जस्टिस सुंदरीश ने अधिकारियों से कहा कि वे इस मामले को उच्च स्तर पर उठाएं और यह सुनिश्चित करें कि कोर्ट के निर्देशों का गंभीरता से पालन किया जाए।
Case Title : Arjun Gopal v. Union of India