झूठे मामलों पर रोक की मांग वाली PIL पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र और राज्यों को नोटिस

Update: 2026-02-26 10:20 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को झूठी शिकायतों, फर्जी साक्ष्यों और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) पर रोक लगाने संबंधी जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया।

चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पचोली की खंडपीठ एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में निर्दोष नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए प्रशासनिक सुरक्षा उपाय लागू करने की मांग की गई है।

झूठी शिकायतों की समस्या पर कोर्ट की टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए समाज को दूसरों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा, “हमें 'गैगिंग' का आरोप लगाया जाएगा, लेकिन इससे डरना क्यों चाहिए? लोग दुरुपयोग करते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। हमें एक जागरूक समाज बनाना होगा, जहां लोग अपने पड़ोसी के मौलिक अधिकारों को भी समझें। बंधुत्व (Fraternity) के सिद्धांत को विकसित करना होगा।”

अदालत ने यह भी कहा कि कई बार झूठी शिकायतें वास्तविक शिकायतकर्ता की जानकारी के बिना भी दर्ज कर दी जाती हैं।

चीफ़ जस्टिस ने कहा, “समस्या तब होती है जब झूठी शिकायत दर्ज होती है और वास्तविक शिकायतकर्ता को पता ही नहीं होता। नकली हस्ताक्षर कर दिए जाते हैं और गरीब व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि उसका इस्तेमाल किया जा रहा है।”

याचिकाकर्ता की दलील

अदालत में स्वयं उपस्थित होकर अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि फर्जी मुकदमे न्याय प्रणाली पर भारी बोझ हैं।

उन्होंने कहा, “अदालतों पर असली मामलों से ज्यादा नकली मामलों का बोझ है। जमीन का विवाद होता है, लेकिन मामला SC/ST एक्ट के तहत दर्ज कर दिया जाता है। ईमानदार लोग डर के माहौल में जी रहे हैं। ग्रामीण समाज का ताना-बाना प्रभावित हो रहा है। सिविल मामला आपराधिक बना दिया जाता है।”

उन्होंने सुझाव दिया कि पुलिस थानों और अदालतों में झूठे मामलों की सजा संबंधी बोर्ड लगाए जाएं, ताकि यह एक निवारक उपाय बन सके। उन्होंने वैज्ञानिक नंबी नारायणन के मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के निर्दोष साबित होने तक वर्षों बीत जाते हैं।

मांगी गई राहतें

याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देने की मांग की गई है कि पुलिस थानों, अदालत परिसरों, पंचायत कार्यालयों, नगर निकाय कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे बोर्ड लगाए जाएं, जिनमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत झूठी शिकायत और झूठे साक्ष्य से संबंधित दंड का उल्लेख हो।

इसके अतिरिक्त यह भी मांग की गई है कि एफआईआर दर्ज करने से पहले शिकायतकर्ता को झूठी शिकायत के कानूनी परिणामों से अवगत कराया जाए।

याचिका में यह भी कहा गया है कि शिकायतकर्ता से एक अनिवार्य शपथपत्र या घोषणा ली जाए, जिसमें वह यह पुष्टि करे कि उसके आरोप सत्य हैं, ताकि दुर्भावनापूर्ण मुकदमों को रोका जा सके।

एक अन्य मांग यह है कि झूठी शिकायत, झूठे आरोप और झूठे साक्ष्य के मामलों में दी जाने वाली सजा क्रमिक (consecutive) रूप से चले।

कानून और आंकड़ों का हवाला

याचिकाकर्ता का कहना है कि झूठी शिकायतें, झूठे आरोप और फर्जी साक्ष्य कानून के शासन और मौलिक अधिकारों के लिए गंभीर खतरा हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 में ऐसे अपराधों के लिए दंड के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन इनके दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई प्रभावी प्रशासनिक तंत्र नहीं बनाया गया है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि कुछ विशेष आपराधिक कानूनों में दोषसिद्धि दर कम होने का एक प्रमुख कारण झूठी शिकायतें हैं। याचिका में धारा 498A, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, दहेज निषेध अधिनियम और पॉक्सो कानून का उल्लेख किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि झूठे मामलों को रोकने में विफलता संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन है तथा इससे स्वतंत्रता, गरिमा और त्वरित न्याय के अधिकार पर असर पड़ता है।

याचिका में विधि आयोग की 277वीं रिपोर्ट (गलत अभियोजन पर) और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय एस. नंबी नारायणन बनाम सिबी मैथ्यूज का भी हवाला दिया गया है, जिसमें प्रतिष्ठा को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया था।

याचिकाकर्ता का कहना है कि शिकायत दर्ज करने के समय चेतावनी और शपथपत्र जैसी प्रशासनिक व्यवस्थाएं लागू करने से दुर्भावनापूर्ण मुकदमों में कमी आएगी और निर्दोष लोगों की रक्षा होगी।

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