दलित-आदिवासी आरोपियों को थाने साफ करने की जमानत शर्त मामला: सुप्रीम कोर्ट बोला- हमारी टिप्पणी किसी जज के खिलाफ नहीं

Update: 2026-05-11 11:49 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा की अदालतों द्वारा दलित और आदिवासी समुदाय के आरोपियों को जमानत की शर्त के रूप में पुलिस स्टेशन साफ करने का निर्देश देने वाले मामले में स्पष्ट किया है कि उसकी पिछली टिप्पणियों को किसी हाईकोर्ट जज या न्यायिक अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने कहा कि यदि ऐसा समझा गया तो इससे न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिर सकता है। अदालत ने यह टिप्पणी ओडिशा हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा दाखिल अनुपालन रिपोर्ट पर सुनवाई के दौरान की।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर यह मामला तब उठाया था जब कुछ रिपोर्टों में सामने आया कि ओडिशा की अदालतों ने दलित और आदिवासी आरोपियों को जमानत देते समय दो महीने तक पुलिस स्टेशन साफ करने जैसी शर्तें लगाई थीं।

रिपोर्टों के अनुसार, ये आदेश ओडिशा में खनन विरोधी प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में दिए गए थे। मई 2025 से जनवरी 2026 के बीच ऐसे आठ आदेश पारित हुए, जिनमें से सात रायगड़ा जिले की अदालतों और एक आदेश हाईकोर्ट द्वारा पारित किया गया था। आठ मामलों में छह आरोपी दलित समुदाय और दो आरोपी आदिवासी समुदाय से थे।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 मई को इन जमानत शर्तों पर कड़ी नाराजगी जताई थी। अदालत ने इन शर्तों को “घृणित” (Obnoxious) बताते हुए कहा था कि यह राज्य न्यायपालिका में जातिगत पूर्वाग्रह को दर्शाता है।

कोर्ट ने कहा था कि इस तरह की अपमानजनक और मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली शर्तें न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाने के बजाय आरोपियों की गरिमा पर हमला करती हैं और उन्हें पहले से दोषी मानने जैसी हैं, जो कानूनन पूरी तरह अस्वीकार्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने इन जमानत शर्तों को “शून्य और अवैध” घोषित करते हुए ओडिशा की सभी अदालतों को ऐसे आदेश तुरंत हटाने का निर्देश दिया था। साथ ही अदालतों को ऐसी किसी समान शर्त को दोबारा न लगाने को कहा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि ओडिशा के बाहर की अदालतें भी भविष्य में ऐसी “जाति-आधारित और दमनकारी” जमानत शर्तें न लगाएं। कोर्ट ने कहा था कि ऐसी शर्तें सामाजिक तनाव पैदा कर सकती हैं।

इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति सभी हाईकोर्टों को भेजने का निर्देश दिया था ताकि प्रत्येक न्यायिक अधिकारी को सूचित किया जा सके कि किसी भी परिस्थिति में ऐसी जमानत शर्तें नहीं लगाई जाएं।

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