सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य चुनाव आयोग (SEC) को स्थानीय चुनावों से पहले मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अर्जी पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान राज्य चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह स्थानीय निकाय चुनावों से पहले राज्य में मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति मांगने वाले कुछ कार्यकर्ताओं की अर्जी पर फिर से विचार करे।
याचिकाकर्ताओं (अरुणा रॉय और निखिल डे) की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण की दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह आदेश पारित किया।
यह बेंच एक ऐसी अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, जो लोकसभा/विधानसभा चुनावों से पहले CrPC की धारा 144 के तहत लगाए गए 'ब्लैंकेट' (सभी तरह की सार्वजनिक सभाओं आदि पर रोक लगाने वाले) आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ी थी। 2024 में, जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने निर्देश दिया कि इस तरह की अर्जियों पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा अर्जी दाखिल किए जाने के 3 दिनों के भीतर फैसला लिया जाना चाहिए।
वकील प्रशांत भूषण ने इस मामले में एक अर्जी पर दलीलें पेश कीं। उन्होंने बताया कि स्थानीय निकाय चुनावों से पहले मतदाता जागरूकता अभियान चलाने के लिए राजस्थान राज्य चुनाव आयोग से अनुमति मांगी गई। उनके अनुसार, दो बार अनुमति मांगी गई, लेकिन यह कहते हुए मना कर दिया गया कि चुनाव होने वाले हैं।
उन्होंने कहा,
"यह बेतुका है। मतदाता जागरूकता अभियान तो लोगों को जागरूक करने के लिए ही होते हैं।"
जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि 2024 का वह आदेश संसदीय चुनावों के संदर्भ में दिया गया।
उन्होंने भूषण से कहा, "
आपको एक अलग रिट याचिका दाखिल करनी चाहिए थी।"
इस पर वकील ने जवाब दिया कि चूंकि मुद्दा एक जैसा ही था, इसलिए आवेदकों ने एक अर्जी दाखिल करना ही उचित समझा। CJI ने यह भी कहा कि ऐसे अभियान आमतौर पर तब चलाए जाने चाहिए, जब चुनाव एकदम करीब न हों।
उन्होंने टिप्पणी की,
"ऐसा लग सकता है कि आप किसी खास उम्मीदवार के लिए प्रचार कर रहे हैं।"
इससे असहमति जताते हुए प्रशांत भूषण ने कहा कि मतदाता जागरूकता अभियान तब सबसे ज्यादा असरदार होते हैं जब चुनाव करीब हों।
उन्होंने कहा,
"हम कुल 20 लोग हैं। हम 2024 से ही ऐसी यात्राएं कर रहे हैं। हम लोगों को बताते हैं कि वे अपने वोट के बदले रिश्वत न लें, हम उन्हें NOTA (नोटा) विकल्प के बारे में भी बताते हैं..."
राजस्थान SEC के वकील ने बताया कि आवेदकों के आवेदन की जांच की गई और अनुमति देने से इनकार किया गया, क्योंकि यह "किसी और के इशारे पर" हो सकता था। इसके अलावा, SEC खुद भी ऐसे कार्यक्रम चला रहा था।
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि SEC मतदाता जागरूकता अभियान पर अपना एकाधिकार नहीं जमा सकता।
जज ने कहा,
"यह आपके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। अगर आप ऐसे कार्यक्रम चला रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि कोई अन्य संस्था मतदाता जागरूकता अभियान नहीं चला सकती। आप लोगों को रोक नहीं सकते। अगर मतदाता जागरूकता के नाम पर कोई गलत काम होता है, तो उसे नियंत्रित करने के लिए आप मौजूद हैं। लेकिन आप मतदाता जागरूकता अभियान पर पूरी तरह से अपना कब्ज़ा या एकाधिकार नहीं कर सकते। आपको इसका स्वागत करना चाहिए।"
साथ ही जस्टिस बागची ने भूषण से कहा कि प्रस्तावित अभियान की जगह और समय पहले से तय होना चाहिए; कोई भी व्यक्ति सामान्य या खुली अनुमति नहीं मांग सकता। भूषण ने जोर देकर कहा कि कार्यक्रम आयोजित करने वाले लोग एक छोटा समूह हैं, और चुनाव के दौरान BNSS की धारा 163 को पूरी तरह से (बिना किसी अपवाद के) लागू नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि अब चुनाव का केवल एक चरण ही बाकी है।
जस्टिस बागची इस बात से सहमत हुए कि प्रतिबंध पूरी तरह से व्यापक (Blanket) नहीं हो सकता और कहा कि कोर्ट SEC से इस पर फिर से विचार करने के लिए कहेगा।
CJI ने टिप्पणी की,
"एक बार अनुमति मिल जाने का मतलब है कि धारा 163 के तहत एक अपवाद दिया गया।"
राजस्थान SEC को मामले में पक्षकार बनाते हुए कोर्ट ने अनुमति न देने का फैसला रद्द किया और SEC को निर्देश दिया कि वह आवेदकों की उस अर्जी पर 3 दिनों के भीतर फिर से विचार करे, जिसमें मतदाता जागरूकता अभियान चलाने की अनुमति मांगी गई थी।