वोट डालने के लिए मजबूर नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-16 08:38 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने देश में अनिवार्य मतदान लागू करने और वोट न डालने पर दंडात्मक कार्रवाई की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र में मतदान एक अधिकार है, जिसे जबरन लागू नहीं किया जा सकता।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पांचोली की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कानून के शासन वाले देश में नागरिकों से मतदान करने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन राज्य किसी व्यक्ति को वोट डालने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

अदालत की अहम टिप्पणी

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से सुझाव दिया गया कि चुनाव आयोग को अनिवार्य मतदान पर दिशानिर्देश बनाने के लिए समिति गठित करने का निर्देश दिया जा सकता है। साथ ही, बिना उचित कारण वोट न देने वालों के लिए कुछ सरकारी सुविधाओं पर रोक लगाने का भी प्रस्ताव रखा गया।

इस पर चीफ जस्टिस ने कहा,

“अगर कोई नागरिक वोट डालने नहीं जाता, तो हम क्या कर सकते हैं? क्या उसे गिरफ्तार करने का आदेश दें? लोकतंत्र में यह जागरूकता का विषय है, हम किसी को मजबूर नहीं कर सकते।”

'जागरूकता जरूरी, दंड नहीं'

अदालत ने कहा कि मतदान में भागीदारी बढ़ाने के लिए दंडात्मक उपायों के बजाय जन-जागरूकता अभियान चलाने पर ध्यान देना चाहिए। मतदान एक नागरिक कर्तव्य जरूर है, लेकिन इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता।

नीति का विषय बताया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मुद्दे नीति निर्माण के दायरे में आते हैं और इस पर निर्णय लेना विधायिका और कार्यपालिका का काम है। अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष अपनी मांग रखने की स्वतंत्रता दी।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में मतदान को अनिवार्य बनाने का फैसला अदालत के बजाय सरकार और संसद के स्तर पर ही लिया जा सकता है, और फिलहाल इसे जबरन लागू नहीं किया जा सकता।

Tags:    

Similar News