सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आज़ादी और विधायी विशेषाधिकारों के मुद्दे पर 7 जजों की बेंच के पास भेजा गया मामला बंद कर दिया। कोर्ट ने कहा कि तमिलनाडु विधानसभा के 2003 के उस प्रस्ताव को, जिसकी वजह से यह मामला शुरू हुआ था, 2004 में ही वापस ले लिया गया था।

इस मामले की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस पीके मिश्रा, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस विपुल पंचोली, जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस वी मोहना की बेंच बनाई गई थी। यह मामला लगभग दो दशकों से लंबित था।

मामले को बेअसर मानकर निपटाते हुए बेंच ने कहा कि रेफरेंस ऑर्डर पास करते समय कोर्ट का ध्यान इस बात पर नहीं गया था कि संबंधित प्रस्ताव वापस ले लिया गया।

बेंच ने माना कि रेफरेंस का आधार ही खत्म हो गया है, इसलिए मामला बंद कर दिया गया। हालांकि, बेंच ने कानून से जुड़े सवालों को किसी उपयुक्त मामले में तय करने के लिए खुला छोड़ दिया।

ऑर्डर लिखवाए जाने के बाद सीनियर एडवोकेट एएम सिंघवी ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में टिप्पणी की कि कोर्ट ने दो रिकॉर्ड बनाए हैं - सबसे छोटी सुनवाई और 7 जजों वाले मामले का सबसे तेज़ी से निपटारा।

सोमवार को मामले का ज़िक्र होने पर CJI सूर्यकांत ने कहा था कि रेफरेंस को शायद सिर्फ़ एक एकेडमिक मुद्दे के तौर पर निपटाया जा सकता है।

यह रेफरेंस 2003 के मामले 'एन. रवि बनाम स्पीकर, विधानसभा, चेन्नई' से शुरू हुआ था। इसमें तमिलनाडु विधानसभा के उस 2003 के फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसमें राज्य सरकार की आलोचना करने वाले लेखों के लिए 'द हिंदू' के 5 पत्रकारों को सज़ा सुनाई गई। आख़िरकार, संविधान के आर्टिकल 194(3), 19(1)(a) और 21 के बीच आपसी संबंध की जांच के लिए यह मामला 7 जजों की बेंच को भेजा गया। यह मामला दो दशकों से ज़्यादा समय से लंबित था, और अगस्त 2026 में कोर्ट ने 6 अक्टूबर से सुनवाई शुरू करने का फ़ैसला किया।

तमिलनाडु राज्य की ओर से सोमवार को सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच को बताया कि विधानसभा के 2003 के प्रस्ताव को 2004 में ही रद्द कर दिया गया था। हालाँकि इस घटनाक्रम के बारे में कोर्ट में एक हलफ़नामा दायर किया गया था, लेकिन रेफरेंस ऑर्डर में इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया। रामचंद्रन ने सुझाव दिया कि चूँकि मामले की वजह अब नहीं रही, इसलिए यह रेफरेंस शायद अब सिर्फ़ एक सैद्धांतिक मुद्दा (academic issue) बनकर रह गया है।

रामचंद्रन ने यह भी कहा कि वे यह बात इसलिए बता रहे हैं ताकि सुनवाई के दिन 7 जजों की बेंच को हैरानी न हो।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि इस जानकारी को देखते हुए यह मुद्दा शायद अब सिर्फ़ एक सैद्धांतिक मुद्दा बनकर रह गया है।

चीफ जस्टिस ने कहा कि कोर्ट सिर्फ़ सैद्धांतिक चर्चा में समय बर्बाद नहीं करेगा।

CJI ने कहा,

"अगर मुद्दा बना रहता है, तो हम फ़ैसला करेंगे। अगर नहीं, तो हम सही मौके का इंतज़ार कर सकते हैं। इसके बजाय, उन मामलों की सुनवाई की जा सकती है जिनकी सुनवाई आधी-अधूरी (part-heard) है।"

CJI ने आगे कहा कि 7 जजों की बेंच तय तारीख़ को सुबह 10.30 बजे बैठेगी और इस बात को रिकॉर्ड पर लेकर रेफरेंस का औपचारिक रूप से निपटारा करेगी कि विवादित प्रस्ताव वापस ले लिया गया। CJI ने कहा कि 7 जजों की बेंच को भंग किया जा सकता है। उस समय का इस्तेमाल उन मामलों की सुनवाई के लिए किया जा सकता है जिनकी सुनवाई आधी-अधूरी है।

इस चर्चा के दौरान, सीनियर एडवोकेट कपिल सिबल ने भी टिप्पणी की कि विधायी विशेषाधिकारों के दुरुपयोग का मुद्दा "बहुत महत्वपूर्ण" है, भले ही यह रेफरेंस अब सिर्फ़ एक सैद्धांतिक मुद्दा बनकर रह गया हो।

Case : N. Ravi v. Speaker, Legislative Assembly Chennai | W.P. (Cri.) No. 206 - 210/2003

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