Stray Dog Case : सुप्रीम कोर्ट ने 6 साल की बच्ची के माता-पिता की बात सुनी, जिसकी मौत के बाद स्वतः संज्ञान मामला शुरू हुआ

Update: 2026-01-21 04:45 GMT

आवारा कुत्तों के मामले में नाबालिग पीड़ित के माता-पिता, जिसकी मौत के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, उसने मंगलवार को अपनी दलीलें पेश कीं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में 6 साल की बच्ची की मौत पर छपे एक अखबार के लेख, "आवारा कुत्तों से परेशान परेशान शहर, बच्चे चुका रहे कीमत", के बाद पिछले अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया था।

उन्होंने आज कोर्ट को बताया कि अस्पताल इस मामले में लापरवाही के दोषी थे, क्योंकि उन्होंने समय पर इलाज करने से मना कर दिया था।

यह दलील देते हुए माता-पिता ने जांच की मांग की। हालांकि कुछ वकीलों ने पीड़ित की मौत के कारण पर यह तर्क देते हुए सवाल उठाने की कोशिश की कि नाबालिग की मौत रेबीज से नहीं हुई थी, लेकिन कोर्ट ने उन्हें इस मामले पर टिप्पणी करने से रोक दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजानिया की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की।

बता दें, यह स्वतः संज्ञान मामला 6 साल की बच्ची छवि शर्मा की मौत की खबर के बाद शुरू हुआ, जिस पर दिल्ली के पूथ कलां में एक आवारा कुत्ते ने हमला किया और कई बार काटा था। पीड़ित को रेबीज वैक्सीन की 3 खुराकें दी गईं, लेकिन दुख की बात है कि उसकी मौत हो गई। कथित तौर पर उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल रेफर किया गया, लेकिन उनमें से ज्यादातर ने इलाज या भर्ती करने से मना कर दिया।

इसी पृष्ठभूमि में मृतक पीड़ित के माता-पिता की ओर से वकील जसदीप ढिल्लों ने कोर्ट को बताया कि अस्पताल इस मामले को संभालने में लापरवाह थे और इसकी जांच होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि पीड़ित को अंबेडकर अस्पताल, रोहिणी में रेबीज वैक्सीन के टीके लगे थे, लेकिन जब उसे इलाज (चोटों आदि के लिए) के लिए दूसरे अस्पतालों में रेफर किया गया तो उन्होंने उसे भर्ती करने या इलाज करने से मना कर दिया। इन अस्पतालों में सफदरजंग अस्पताल, राम मनोहर लोहिया अस्पताल और लेडी हार्डिंग अस्पताल शामिल थे।

उन्होंने यह भी कहा कि जिस कुत्ते ने पीड़ित को काटा था, उसने पहले भी इलाके में 4 अन्य लोगों को काटा था, लेकिन अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की। मौत के कारण पर कोर्ट के सवाल के जवाब में उन्होंने जवाब दिया कि यह कुत्ते के काटने के बाद एक गंभीर वायरल का मामला था।

कुत्ते प्रेमियों की तरफ से कुछ वकीलों ने पीड़ित की मौत के कारण पर यह बताते हुए सवाल उठाने की कोशिश की कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट निर्णायक नहीं थी, क्योंकि रेबीज की पुष्टि के लिए मस्तिष्क के ऊतकों का विश्लेषण करना पड़ता है। एक वकील ने यह भी दावा किया कि पीड़ित अपने आखिरी दिनों में खा-पी रही थी, जो अगर उसे रेबीज़ होता तो मुमकिन नहीं था।

वकीलों पर सख़्त रुख अपनाते हुए बेंच ने ऐसे किसी भी तर्क पर रोक लगाई।

जस्टिस मेहता ने हैरानी जताते हुए कहा,

"आप यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि उसकी मौत नेचुरल कारणों से हुई?"

बाद में जस्टिस नाथ और जस्टिस मेहता दोनों ने सभी वकीलों को छवि के मामले पर कमेंट करने से रोक दिया।

ढिल्लों के अलावा, कुत्ते के काटने से पीड़ित एक और वकील ने कहा कि आवारा कुत्ते जो बार-बार काटते हैं, उनकी ज़िम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं है। उन्होंने आगे ज़ोर देकर कहा कि चूंकि भैंस जैसे जानवरों को इंसानों के खाने के लिए मारा जाता है, इसलिए आवारा कुत्ते खुद ही हिंसक होते हैं, उन्हें भी मार देना चाहिए।

Case Title: In Re : 'City Hounded By Strays, Kids Pay Price', SMW(C) No. 5/2025 (and connected cases)

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