जांच अधिकारी के सवालों का जवाब न देना 'असहयोग' नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा– केवल इस आधार पर जमानत से इनकार नहीं

Update: 2026-02-12 09:54 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल इस आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोपी ने जांच अधिकारी (IO) के सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सवालों का जवाब न देना स्वतः ही “जांच में असहयोग” नहीं माना जा सकता।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने कहा, “IO के प्रश्नों का उत्तर न देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आरोपी जांच में सहयोग नहीं कर रहा है।”

खंडपीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें समानता (parity) के आधार पर अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। मामले में अन्य सह-आरोपियों को उसी एफआईआर में जमानत मिल चुकी थी, जिसमें अतिक्रमण (trespass) का आरोप था। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए जमानत नहीं दी थी कि आरोपी ने जांच में पूर्ण सहयोग नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब अन्य सह-आरोपियों को जमानत मिल चुकी है, तो अपीलकर्ता भी अग्रिम जमानत का हकदार है।

गौरतलब है कि Tusharbhai Rajnikantbhai Shah v. State of Gujarat, 2024 LiveLaw (SC) 557 मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी थी कि सहयोग से इनकार करना जमानत न देने का आधार हो सकता है। अदालत ने दोहराया था कि आरोपी को मौन रहने और आत्म-अपराध स्वीकार न करने का अधिकार है।

टुशारभाई मामले में कोर्ट ने कहा था कि “आरोपी पर यह कोई बाध्यता नहीं है कि पूछताछ के दौरान वह अपराध स्वीकार करे, तभी जांच अधिकारी यह माने कि उसने सहयोग किया है।”

वर्तमान मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए आरोपी को अग्रिम जमानत देने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी जांच अधिकारी द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करेगा तथा सुनवाई की सभी तिथियों पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित रहेगा, जब तक कि किसी विशेष कारण से उसे छूट न दी जाए।

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