'एडहॉक जजों के नामों पर विवाद': HCBA को कॉलेजियम के प्रस्तावित नामों पर आपत्ति, राष्ट्रपति और CJI को लिखा पत्र
इलाहाबाद हाइकोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा संविधान के अनुच्छेद 224-ए के तहत इलाहाबाद हाइकोर्ट में पाँच रिटायर्ड जजों की एडहॉक नियुक्ति के प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई।
इस संबंध में HCBA ने 5 फरवरी, 2026 को राष्ट्रपति को एक औपचारिक पत्र लिखा है, जिसकी प्रति भारत सरकार के विधि मंत्री और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को भी भेजी गई।
बार एसोसिएशन ने कॉलेजियम के इस कदम को अस्पष्ट करार देते हुए कहा कि इससे प्रदेश के विधि जगत में गहरी चिंता और असंतोष उत्पन्न हुआ है।
पत्र में कहा गया कि अनुच्छेद 224-ए का प्रयोग सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा किया जाना स्वयं इस संवैधानिक प्रावधान की भावना के विपरीत है, क्योंकि इस अनुच्छेद के अनुसार एडहॉक जस्टिस की नियुक्ति का अधिकार संबंधित हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस को होता है, वह भी राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से।
HCBA का कहना है कि प्रस्तावित पाँचों नाम रिटायर्ड जजों के एक बड़े समूह में से अचानक चुने गए प्रतीत होते हैं और यह नहीं दर्शाया गया कि उपलब्ध रिटायर्ड जजों में से सर्वश्रेष्ठ चयन के लिए कोई ठोस प्रक्रिया अपनाई गई।
बार एसोसिएशन ने यह भी कहा कि सुझाए गए नाम लंबित मामलों के प्रभावी निस्तारण की क्षमता के संदर्भ में विश्वास उत्पन्न नहीं करते।
पत्र में आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया कि चुने गए पाँच जजों में से कम से कम चार ने अपने लगभग दो वर्षों के कार्यकाल में अत्यंत कम संख्या में फैसले दिए।
HCBA के अनुसार, जस्टिस मोहम्मद असलम ने 2021 से 2023 के बीच 46 निर्णय दिए जस्टिस रेनू अग्रवाल ने 2022 से 2024 के बीच 73 निर्णय, जस्टिस ज्योत्सना शर्मा ने 2022 से 2025 के बीच 93 निर्णय और जस्टिस सैयद अफ़ताब हुसैन रिज़वी ने 2021 से 2025 के बीच 151 निर्णय दिए।
एसोसिएशन ने यह भी तर्क दिया कि यदि रिटायर्ड जजों की नियुक्ति ही करनी थी, तो हाल में रिटायर हुए जस्टिस बेहतर विकल्प हो सकते थे, जिनकी निर्णय क्षमता और कार्य निष्पादन अधिक प्रभावी रहा है।
HCBA ने पत्र में यह भी कहा कि देशभर के विभिन्न हाइकोर्ट में रिक्त पदों को पात्र वकीलों और न्यायिक अधिकारियों की नियमित नियुक्ति के माध्यम से भरा जाना चाहिए। एडहॉक नियुक्तियों के बजाय स्थायी नियुक्तियां करना अधिक उपयुक्त और संवैधानिक रूप से संतुलित कदम होता।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि रिटायर जजों की नियुक्ति से योग्य वकीलों और न्यायिक अधिकारियों को एक संवेदनशील संवैधानिक पद पर नियुक्त होने का अवसर नहीं मिल पाता, जबकि जिन जस्टिसों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, उन्हें पुनः उसी प्रणाली में लाया जा रहा है।
यह पत्र HCBA के अध्यक्ष राकेश पांडे और मानद सचिव अखिलेश कुमार शर्मा द्वारा हस्ताक्षरित है।