सुप्रीम कोर्ट का सवाल- क्या सोनम वांगचुक ने कहा कि लद्दाख के लोग सेना की मदद नहीं करेंगे?, कपिल सिब्बल ने किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने आज (29 जनवरी) लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को सरकारी अस्पताल के किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से चिकित्सकीय जांच कराने की अनुमति दे दी। वांगचुक ने बार-बार पेट दर्द की शिकायत की थी। अदालत ने निर्देश दिया है कि उनकी मेडिकल जांच की रिपोर्ट सोमवार तक दाखिल की जाए।
यह आदेश जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ ने पारित किया। मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका से जुड़ा है, जो डॉ. गीताांजलि आंगमो ने अपने पति सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) के तहत हिरासत को चुनौती देते हुए दायर की है। वांगचुक को सितंबर 2025 में लद्दाख में राज्यhood की मांग को लेकर हुए आंदोलन के हिंसक होने के बाद हिरासत में लिया गया था।
शांति की अपील वाला भाषण नजरअंदाज किया गया : कपिल सिब्बल
याचिकाकर्ता की ओर से सिनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने आज अपनी दलीलें पूरी कीं। उन्होंने शुरुआत में कहा कि निरोधक प्राधिकारी के समक्ष चुनिंदा सामग्री ही रखी गई, जिससे वह स्वतंत्र रूप से अपना मन नहीं लगा सका। सिब्बल ने 24 सितंबर के उस भाषण का हवाला दिया, जिसमें वांगचुक ने आंदोलन के हिंसक होने के बाद अपना अनशन तोड़ते हुए शांति की अपील की थी। यह भाषण निरोधक प्राधिकारी के समक्ष नहीं रखा गया, जबकि यह सोशल मीडिया पर उपलब्ध है और प्राधिकारी के संज्ञान में था।
सिब्बल ने दलील दी कि महत्वपूर्ण सामग्री पर विचार न किया जाना निरोधक प्राधिकारी की “वस्तुनिष्ठ संतुष्टि” को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 22(5) की सही व्याख्या के अनुसार निरोध आदेश की सेवा तभी पूर्ण मानी जाएगी, जब सभी प्रासंगिक सामग्री निरोधक प्राधिकारी के समक्ष रखी जाए। ऐसा न होने से निरोध आदेश की बुनियाद ही कमजोर हो जाती है और निरंतर हिरासत अवैध हो जाती है।
वीडियो और आधार सामग्री की आपूर्ति में खामियां
सिब्बल ने यह भी दोहराया कि जिन चार वीडियो (10, 11 और 24 सितंबर) पर मुख्य रूप से भरोसा किया गया है, वे हिरासत के आधारों के साथ बंदी को उपलब्ध नहीं कराए गए। उन्होंने बताया कि आंगमो को 29 सितंबर को हिरासत के आधार दिए गए, जबकि वांगचुक को 28 दिनों की देरी से आधारों की जानकारी दी गई। उनका कहना था कि NSA की धारा 8 के तहत हिरासत के पूर्ण आधार उपलब्ध कराना अनिवार्य है।
'कॉपी-पेस्ट' आदेश, पुराने FIR पर भरोसा
सिब्बल ने आरोप लगाया कि निरोधक प्राधिकारी ने एसएसपी की सिफारिशों को यांत्रिक रूप से कॉपी-पेस्ट कर दिया। उन्होंने कहा कि अब उपलब्ध अन्य पन्नों से भी यह स्पष्ट है कि स्वतंत्र रूप से मन लगाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। उन्होंने यह भी बताया कि हिरासत आदेश में जिन FIR का हवाला दिया गया है, वे अधिकांशतः 2024 की पुरानी हैं, कई में वांगचुक का नाम तक नहीं है और अधिकतर 'अज्ञात व्यक्तियों' के खिलाफ दर्ज हैं। यहां तक कि लद्दाख हिंसा के बाद दर्ज नवीनतम FIR में भी वांगचुक को नामजद नहीं किया गया।
धारा 5A लागू नहीं होती
सिब्बल ने जोर देकर कहा कि NSA की धारा 5A स्वतंत्र और पृथक आधारों की मांग करती है, ताकि कुछ आधार अमान्य होने पर भी अन्य के आधार पर हिरासत बनी रह सके। लेकिन मौजूदा मामले में हिरासत एक ही 'श्रृंखलाबद्ध आधार' पर टिकी है, जिसे अलग-अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए धारा 5A का कोई उपयोग नहीं है। उन्होंने एजी बनाम अमृतलाल प्रजिवंदास (1994) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हिंसा के समर्थन जैसे स्वतंत्र कृत्य होने चाहिए, न कि घटनाओं की एक श्रृंखला।
सेना और राष्ट्र के खिलाफ बयान का आरोप गलत
सिब्बल ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया कि वांगचुक ने कभी यह कहा कि राज्यhood की मांग पूरी न होने पर लोग युद्धकाल में भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार के प्रश्न पर सिब्बल ने कहा कि यह गंभीर भाषा-भ्रम या जानबूझकर की गई विकृति का परिणाम है। उन्होंने वांगचुक के कथित बयान का हवाला देते हुए कहा कि वांगचुक ने ठीक इसके उलट कहा था—कि राजनीति को देशभक्ति और राष्ट्रीय रक्षा से नहीं जोड़ा जाना चाहिए और नागरिकों को सेना के साथ खड़ा रहना चाहिए।
जनमत संग्रह, देवी-अपमान और बंद के आरोपों का खंडन
सिब्बल ने यह भी स्पष्ट किया कि वांगचुक ने कभी लद्दाख में जनमत संग्रह (प्लेबिसाइट) का समर्थन नहीं किया। एक साक्षात्कार में पूछे गए प्रश्न के उत्तर को गलत तरीके से पेश किया गया। इसी तरह, हिंदू देवी के अपमान के आरोप को भी उन्होंने झूठा बताया और कहा कि यह आईटी सेल द्वारा फैलाई गई गलत व्याख्या है, जिसे फैक्ट-चेक ने खारिज किया है। उन्होंने कहा कि वांगचुक की पत्नी स्वयं प्रैक्टिसिंग हिंदू हैं।
दिल्ली तक पदयात्रा के दौरान कथित लद्दाख बंद पर सिब्बल ने कहा कि वांगचुक ने न तो इसे समर्थन दिया और न ही किसी तीसरे पक्ष की कार्रवाई के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
मेडिकल जांच पर अदालत की टिप्पणी
विशेषज्ञ से जांच की मांग पर अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने कहा कि वांगचुक की अब तक 21 बार जांच हो चुकी है और हाल में 26 जनवरी को भी जांच हुई। हालांकि, न्यायमूर्ति कुमार ने स्पष्ट किया कि वांगचुक किसी सामान्य चिकित्सक से नहीं, बल्कि विशेषज्ञ से जांच चाहते हैं।
अब तक की कार्यवाही
यह याचिका अनुच्छेद 32 के तहत दायर है, जिसमें जोधपुर केंद्रीय कारागार में बंद वांगचुक की रिहाई की मांग की गई है। केंद्र सरकार, लद्दाख प्रशासन और जेल अधीक्षक को प्रतिवादी बनाया गया है। पहले चरण में हिरासत के आधारों की आपूर्ति, मुलाकात की अनुमति और नोट्स तक पहुंच जैसे मुद्दों पर अदालत ने आदेश पारित किए थे। केंद्र सरकार ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वांगचुक की पेशी के अनुरोध का विरोध किया था।
मामले की सुनवाई जारी है और अगली सुनवाई में मेडिकल रिपोर्ट के साथ आगे की दलीलों पर विचार किया जाएगा।