सूर्यकुमार यादव से डेथ ओवर की उम्मीद नहीं — CJI सूर्यकांत ने टी-20 उदाहरण देकर वकीलों को विशेषज्ञता पर दिया जोर
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने शुक्रवार को युवा अधिवक्ताओं के लिए पेशेवर विशेषज्ञता (Professional Specialisation) के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि कोई भी वकील पेशे के हर क्षेत्र में उत्कृष्ट नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही जैसे टी-20 क्रिकेट में किसी खिलाड़ी से हर भूमिका निभाने की अपेक्षा नहीं की जाती।
28 फरवरी को गांधीनगर स्थित गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (GNLU) के 16वें दीक्षांत समारोह में संबोधन देते हुए CJI ने क्रिकेट की उपमा देकर कहा कि सफल टीमें स्पष्ट भूमिकाओं और व्यक्तिगत क्षमताओं के आधार पर बनती हैं।
टी-20 क्रिकेट का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी सूर्यकुमार यादव से डेथ ओवर फेंकने की उम्मीद नहीं करता और न ही जसप्रीत बुमराह से लक्ष्य का पीछा करते हुए पारी संभालने की। इसी प्रकार वकीलों को भी धीरे-धीरे यह पहचानना चाहिए कि उनकी क्षमता किस क्षेत्र में है और उसी के आधार पर अपनी पेशेवर पहचान विकसित करनी चाहिए।
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि विधि-पेशा उन लोगों को विरले ही पुरस्कृत करता है जो सब कुछ समान रूप से करने की कोशिश करते हैं। उनके अनुसार, जो वकील आगे चलकर प्रतिष्ठित बनते हैं, वे वे होते हैं जो समय के साथ यह पहचान लेते हैं कि उनकी सोच किस अनुशासन में स्वाभाविक रूप से फिट बैठती है।
उन्होंने स्नातकों से कहा कि इस पेशे में आपका स्थान कहाँ है — यह प्रश्न प्रारंभ में ही स्वयं से पूछना आवश्यक है, क्योंकि यह पेशा सब कुछ समान रूप से करने वालों को प्रोत्साहित नहीं करता। उन्होंने कहा कि सफल टीमें इस धारणा पर नहीं बनतीं कि हर खिलाड़ी सब कुछ करेगा, बल्कि इस स्पष्टता पर बनती हैं कि कौन किस काम में सर्वश्रेष्ठ है।
CJI ने कहा कि प्रतिष्ठित वकील वहाँ तक इसलिए नहीं पहुँचे क्योंकि उन्होंने हर चीज़ करने की कोशिश की, बल्कि इसलिए कि उन्होंने यह पहचान लिया कि उनकी सोच का प्राकृतिक क्षेत्र कौन-सा है।
उन्होंने आगे कहा, “यह प्रश्न पहले वर्ष या तीसरे वर्ष में ही हल नहीं होता, लेकिन इसे जल्दी पूछना और बार-बार उस पर लौटना आवश्यक है। जो वकील अपने आप से सबसे अधिक संतुष्ट दिखते हैं, वे वही हैं जिन्होंने किसी मोड़ पर प्रदर्शन करना छोड़कर वास्तविक अभ्यास शुरू कर दिया।”
स्नातकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वकालत के शुरुआती वर्ष अक्सर शैक्षणिक ज्ञान और पेशेवर वास्तविकताओं के बीच की खाई को उजागर करते हैं। पाठ्यपुस्तकें सिद्धांत सिखाती हैं, लेकिन वास्तविक अभ्यास अनुशासन, जिम्मेदारी और व्यावहारिक सीमाओं में काम करने की क्षमता मांगता है। उन्होंने इसे “नक्शा पढ़ने और वास्तविक भूभाग में रास्ता तय करने” के अंतर के रूप में बताया।
उन्होंने कहा कि वकील का अधिकांश काम अदृश्य और अप्रशंसित रहता है — शोध, ड्राफ्टिंग और रणनीतिक चर्चाएँ अक्सर बिना सार्वजनिक पहचान के होती हैं। विधि-पेशा में मेहनत का फल कई वर्षों बाद मिलता है।
जस्टिस सूर्यकांत ने ईमानदारी और पेशेवर विश्वसनीयता के महत्व पर भी जोर देते हुए कहा कि न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास वकीलों की निष्ठा और आचरण पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि वकील द्वारा लिया गया हर पेशेवर निर्णय न्याय प्रणाली पर विश्वास को या तो मजबूत करता है या कमजोर।
उन्होंने यह भी आशा व्यक्त की कि भारत में विधि-शिक्षा अधिकाधिक प्रशिक्षुता (Apprenticeship) आधारित होगी, जिससे विद्यार्थी केवल कानून के बारे में नहीं बल्कि कानून के पेशे के भीतर रहकर सीख सकेंगे।
अपने संबोधन के अंत में CJI ने तैत्तिरीय उपनिषद के वाक्य — “सत्यम वद, धर्मं चर” (सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो) — का उल्लेख करते हुए कहा कि यही सिद्धांत आज भी विधि-पेशा की नैतिक नींव हैं।
उन्होंने स्नातकों से कहा कि यह पेशा रोज़ असाधारण उपलब्धियों की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि कठिन परिस्थितियों में विश्वसनीय बने रहने की मांग करता है — और यही अंततः एक वकील के व्यक्तित्व को गढ़ता है।