मंदिर जाते समय उससे जुड़ी परंपराओं का पालन करना ज़रूरी: सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट
सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि भले ही हिंदू धर्म में कोई कठोर सांप्रदायिक ढांचा नहीं है, लेकिन किसी खास मंदिर में जाने वाले भक्तों को उस मंदिर से जुड़ी परंपराओं या रीति-रिवाजों का पालन करना ज़रूरी है।
इस मामले की सुनवाई 9 जजों की एक बेंच कर रही है, जिसमें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं।
नायर सर्विस सोसाइटी, अयप्पा सेवा समाजम और क्षेत्र संरक्षण समिति जैसे संगठनों की ओर से पेश हुए सीनियर वकील सी.एस. वैद्यनाथन ने दलील दी कि हिंदू धर्म का कोई कठोर ढांचा नहीं है। इसके भीतर कई तरह की अलग-अलग प्रथाएं मौजूद हैं।
उन्होंने कहा,
"हमारे यहां आर्कबिशप, पोप, बिशप या उस तरह का कोई धार्मिक ढांचा नहीं है।"
इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की:
"इसका मतलब है कि हिंदू धर्म में हिंदू अलग-अलग संप्रदायों से जुड़े हो सकते हैं और किसी भी मंदिर में जा सकते हैं। इस पर कोई रोक नहीं है, लेकिन अगर कोई हिंदू किसी खास मंदिर में जाना चाहता है तो उसे उस मंदिर से जुड़ी परंपराओं का पालन करना ही होगा।"
उन्होंने यह भी कहा कि सबरीमाला मंदिर में दूसरे धर्मों के लोगों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है, बशर्ते उन्हें वहां के देवता में आस्था हो और वे भक्तों के लिए तय किए गए धार्मिक नियमों का पालन करें।
उन्होंने कहा,
"सबरीमाला में इस बात को लेकर कोई भेदभाव नहीं किया जाता कि ईसाई या मुसलमान वहां नहीं जा सकते; वे जा सकते हैं, लेकिन उन्हें अयप्पा की दिव्यता में आस्था और विश्वास होना चाहिए। साथ ही उन्हें 40 दिनों का व्रत (व्रतम) रखना होगा और भक्तों के लिए तय की गई सभी प्रथाओं का पालन करना होगा। किसी पर भी रोक नहीं है, इसलिए इस अवधारणा को ठीक से समझा नहीं गया।"
वैद्यनाथन ने आगे तर्क दिया कि "धार्मिक संप्रदाय" की अवधारणा का मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि उसके सदस्य केवल किसी एक ही धर्म से जुड़े हों; उन्होंने इसके विपरीत विचार को एक गलतफहमी बताया।
इस बिंदु पर जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी की,
"केरल के कुछ मंदिरों में आप शर्ट पहनकर अंदर नहीं जा सकते। आप यह नहीं कह सकते कि मुझे तो शर्ट पहननी ही है।"
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि गुरुवायूर मंदिर में पुरुष शर्ट नहीं पहन सकते।
CJI ने आगे कहा कि जब कोई गुरुद्वारा जाता है, तो उसे अपना सिर ढकना पड़ता है।
इसके बाद जस्टिस बागची ने यह टिप्पणी की:
"ये सभी उदाहरण अनुच्छेद 26(b) की प्रधानता को दर्शाते हैं। यह अनुच्छेद धार्मिक मामलों के प्रबंधन के अधिकारों के संबंध में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करता है—जो कि प्रथाओं और अनुष्ठानों आदि के माध्यम से प्रकट होते हैं—और इसे मूल आंतरिक विश्वास (यानी अंतरात्मा की स्वतंत्रता और उसके अधिकारों) पर वरीयता देता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी धर्म में विश्वास नहीं रखता (नास्तिक है)। यदि वह किसी ऐसे मंदिर या मठ में जाता है, जिसका प्रबंधन किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय द्वारा किया जाता है तो उसे उस संप्रदाय के नियमों के अनुसार निर्धारित धार्मिक मामलों का पालन करना ही होगा। ऐसे में असली टकराव तब पैदा होता है, जब किसी नास्तिक व्यक्ति के अपने अधिकारों का प्रचार करने का अधिकार, उस अस्थायी अवधि के लिए गौण (या बाधित) हो जाता है, जिस दौरान वह स्वयं को उस धार्मिक संप्रदाय के प्रबंधन के अधिकार-क्षेत्र के अधीन कर देता है।"
वैद्यनाथन ने यह तर्क दिया कि अंतरात्मा की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, किसी धार्मिक संप्रदाय के अपने मामलों का प्रबंधन करने के सामूहिक अधिकारों को कमज़ोर नहीं कर सकती। उन्होंने दलील दी कि अनुच्छेद 26(b)—जो किसी धार्मिक संप्रदाय को अपने मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है—वह अनुच्छेद 25(2)(b) पर भारी पड़ता है (यानी उसे वरीयता प्राप्त है)। अनुच्छेद 25(2)(b) राज्य को किसी धर्म के भीतर सुधार के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
वैद्यनाथन ने कहा कि वे केंद्र सरकार के इस रुख से असहमत हैं कि अनुच्छेद 26(b) को अनुच्छेद 25(2)(b) के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने यह तर्क दिया कि 'श्री वेंकटरमण देवरु बनाम मैसूर राज्य' मामले में दिया गया फैसला—जिसमें यह माना गया कि अनुच्छेद 25(2)(b) को अनुच्छेद 26(b) पर वरीयता प्राप्त है—गलत था। उनके अनुसार, अनुच्छेद 25(2)(b) केवल एक 'सक्षमकारी प्रावधान' (Enabling Provision) है, जो राज्य को सुधार के लिए कानून बनाने की अनुमति देता है। दूसरी ओर, अनुच्छेद 26(b) अपने आप में एक मौलिक अधिकार है। इसलिए उन्होंने यह सवाल उठाया कि अनुच्छेद 25(2)(b) भला अनुच्छेद 26(b) को कैसे नियंत्रित कर सकता है।
उन्होंने आगे यह भी कहा कि सबरीमाला मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ ने एक गलत प्रश्न पूछा था। परिणामस्वरूप उन्हें एक गलत उत्तर मिला—कि किसी व्यक्ति के अधिकार को किसी धार्मिक संप्रदाय के अधिकार पर वरीयता मिलनी चाहिए।
वैद्यनाथन ने अपनी दलील में कहा,
"उन्होंने पूछा कि क्या व्यक्तिगत अधिकार, समूह या सामूहिक अधिकारों पर भारी पड़ेंगे और उन्होंने गलत तौर पर यह माना कि व्यक्तिगत अधिकार, सामूहिक धार्मिक अधिकारों पर भारी पड़ सकते हैं।"
वैद्यनाथन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अनुच्छेद 25 के विपरीत अनुच्छेद 26 संविधान के अन्य हिस्सों के अधीन नहीं है।