पुलिस को आगे की जांच करने के लिए मजिस्ट्रेट से अनुमति लेना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया
सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि मजिस्ट्रेट से स्पष्ट अनुमति के बिना, क्लोजर रिपोर्ट (जांच बंद करने की रिपोर्ट) दाखिल करने के बाद पुलिस आगे की जांच नहीं कर सकती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा,
"भले ही कानून में स्पष्ट अनुमति की ज़रूरत न हो, लेकिन कानून जिस तरह से विकसित हुआ है, उससे यह बिल्कुल साफ हो गया है कि संबंधित मजिस्ट्रेट से अनुमति लेना अब एक ज़रूरी शर्त बन गया है।"
बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता के खिलाफ आगे की जांच जारी रखने को सही ठहराया गया था; यह जांच मजिस्ट्रेट की मंज़ूरी के बिना ही शुरू की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील वी. मोहना ने हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए दलील दी कि उसने CrPC की धारा 173(8) की गलत व्याख्या की, जिसमें यह माना गया कि आगे की जांच के लिए मजिस्ट्रेट की पहले से अनुमति लेना ज़रूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि भले ही कानून में ऐसी अनुमति का स्पष्ट रूप से ज़िक्र न हो, लेकिन इस प्रावधान में यह शर्त शामिल मानी जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि आगे की कोई भी जांच केवल कोर्ट की अनुमति से ही की जाए।
अपीलकर्ता की दलील में दम पाते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में 'रामा चौधरी बनाम बिहार राज्य, (2013) 5 SCC 762' मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 173(8) की व्याख्या करने में गलती की, क्योंकि कोर्ट/मजिस्ट्रेट की अनुमति लिए बिना आगे की जांच करना कानूनन गलत है। [यह भी देखें: पीतांबरन बनाम केरल राज्य और अन्य, 2023 LiveLaw (SC) 402]
इस फैसले में 'विनय त्यागी बनाम इरशाद (2013) 5 SCC 762' मामले का भी हवाला दिया गया:
"'आगे की जांच' करने और/या 'पूरक रिपोर्ट' दाखिल करने के लिए कोर्ट से पहले अनुमति लेने की शर्त को कानून में शामिल माना जाना चाहिए। यह CrPC की धारा 173(8) के प्रावधानों का एक ज़रूरी निहितार्थ है।" रॉबर्ट लालचुननुंगा चोंगथू बनाम बिहार राज्य मामले में 2025 के फ़ैसले पर भी भरोसा किया गया।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए चूंकि अदालत से अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए आगे की जांच को अमान्य ठहराया गया।
अदालत ने कहा,
“रिकॉर्ड से पता चलता है कि हालांकि संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष तीसरी बार आगे की जांच के लिए एक आवेदन दायर किया गया, लेकिन रिकॉर्ड में विशेष रूप से अनुमति देने वाला कोई आदेश संलग्न नहीं है, और न ही पक्ष की ओर से यह दलील दी गई है कि अनुमति मिल गई थी।”
अपील स्वीकार की गई।
अदालत ने फ़ैसला सुनाया,
“अपीलकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई कानून के अधिकार के विपरीत होगी। इसलिए कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानी जाएगी, क्योंकि आगे की जांच का तीसरा दौर—जिसके परिणामस्वरूप आरोप पत्र दायर किया गया था—उसे संबंधित मजिस्ट्रेट की मंजूरी प्राप्त नहीं थी।”
Cause Title: PALINISWAMY VEERARAJA & ORS. VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ANR.