Sabarimala Reference | अंधविश्वास से जुड़ी प्रथाओं की न्यायिक पुनर्विचार पर रोक नहीं: सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट
सबरीमाला मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि अदालतों को ऐसी प्रथाओं या 'अंधविश्वासों' को रद्द करने से नहीं रोका जा सकता, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य का उल्लंघन करती हों। भले ही संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत धर्म सुधार के लिए कानून बनाने की शक्ति विधायिका के पास हो।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि किसी भी 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' (ERP) को केवल संबंधित धर्म के दार्शनिक दृष्टिकोण से ही देखा जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9-जजों की संविधान पीठ, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल हैं, इस मामले की सुनवाई कर रही है।
सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यह तय करना अदालतों के अधिकार क्षेत्र में नहीं है कि 'अंधविश्वास' किसे माना जाए; यह शक्ति पूरी तरह से अनुच्छेद 25(2)(b) के माध्यम से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आती है। उन्होंने यह दलील अजमेर दरगाह समिति मामले में चीफ जस्टिस गजेंद्रगडकर की उस राय की आलोचना के संदर्भ में दी, जिसमें कहा गया कि अंधविश्वास से जुड़ी मान्यताएं अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकतीं। उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या अदालतें यह तय कर सकती हैं कि क्या अंधविश्वास है और क्या आस्था।
मेहता ने अंधविश्वास पर अंकुश लगाने के लिए विधायिका द्वारा पारित कानून के उदाहरण के तौर पर 'अमानवीय कुप्रथाओं और काला जादू की रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम' (विशेष रूप से महाराष्ट्र, 2013 और कर्नाटक, 2017 में) का उल्लेख किया।
"मान लीजिए कोई अंधविश्वास से जुड़ी प्रथा है तो इसका फैसला करना अदालत का काम नहीं है। अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत यह विधायिका का काम है कि वह कहे कि 'नहीं, हम इसमें सुधार करेंगे'... यह कहना कि 'यह अंधविश्वास है', अदालत की न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता।"
हालांकि, इस बात से असहमति जताते हुए जस्टिस अमनुल्लाह ने राय दी कि यह तय करने में कि 'अंधविश्वास' किसे माना जाए, अदालत की न्यायिक पुनर्विचार की शक्ति को छीना नहीं जा सकता। अगर कोर्ट न्यायिक पुनर्विचिारर के तहत कोई फ़ैसला देता है तो उसके बाद कोई भी कानून लाने का काम विधायिका का होता है।
आगे कहा गया,
"आपने इसे बहुत ज़्यादा आसान बना दिया... न्यायिक पुनर्विचार में कोर्ट के पास यह तय करने का अधिकार और क्षेत्राधिकार है कि अंधविश्वास क्या है, और उसके बाद विधायिका को यह तय करना होता है कि उससे कैसे निपटना है। हालांकि, फिर आप कोर्ट से यह नहीं कह सकते कि जो भी अंतिम फ़ैसला होगा, वह विधायिका ही करेगी।"
एसजी ने जवाब दिया कि कोर्ट और जज, खासकर एक धर्मनिरपेक्ष समाज में यह तय नहीं कर सकते कि धार्मिक प्रथा क्या है, यह देखते हुए कि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, न कि उस धर्म के।
उन्होंने कहा:
"एक धर्मनिरपेक्ष कोर्ट किसी धार्मिक प्रथा को महज़ अंधविश्वास नहीं कह सकता, क्योंकि आपके पास उस विषय का ज्ञान नहीं है। मेरे लॉर्ड्स कानून के क्षेत्र के विद्वान हैं, धर्म के क्षेत्र के नहीं..."
उन्होंने आगे कहा कि भारत एक विविध और बहुलवादी समाज है, जिसमें जटिल मान्यताएं हैं। इसलिए जो एक राज्य या समुदाय में अंधविश्वास माना जा सकता है, उसे दूसरे में धार्मिक माना जा सकता है। ऐसे हालात में कोर्ट का दखल देना सही नहीं हो सकता।
कोर्ट ने कहा,
"जो चीज़ नागालैंड के लिए धार्मिक हो सकती है, वह मेरे लिए पूरी तरह से अंधविश्वास हो सकती है। हम एक बहुत ही बहुलवादी समाज हैं, जिसमें अलग-अलग तरह के लोग, धर्म और मान्यताएं हैं। कोर्ट के लिए इस पर कोई टिप्पणी करना बहुत जोखिम भरा होगा।"
क्या कोर्ट को अनुच्छेद 32 और 226 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करने से रोका जाएगा, जब कोई कानून किसी भेदभावपूर्ण प्रथा पर चुप हो?
जस्टिस बागची ने बीच में दखल देते हुए पूछा,
"अगर जादू-टोने को धार्मिक प्रथा का हिस्सा माना जाए तो क्या आप इसे अंधविश्वास कहेंगे या नहीं?"
एसजी ने माना कि वह ऐसा कहेंगे।
जस्टिस बागची ने तब समझाया कि केंद्र सरकार का यह रुख हो सकता है कि जादू-टोना पर रोक लगाना और जादू-टोना को बढ़ावा देने वाली किसी भी प्रथा को नियंत्रित करना विधायिका का काम है।
हालांकि, जस्टिस बागची ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जिन मामलों में किसी खास प्रथा को अनुच्छेद 32 या 226 के तहत चुनौती दी जाती है। उसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करने वाला कोई कानून नहीं होता, तब भी अदालत के पास उसे रद्द करने की शक्ति होगी, यदि वह सार्वजनिक स्वास्थ्य, नैतिकता और व्यवस्था के विपरीत हो।
"चूंकि जादू-टोना एक धार्मिक प्रथा है और विधायिका इस पर चुप है, तो क्या अदालत 'खाली क्षेत्र' (Unoccupied Field) के सिद्धांतों का उपयोग करके ऐसी प्रथाओं पर रोक लगाने के निर्देश नहीं दे सकती? इस बात को ध्यान में रखते हुए—और 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' (ERP) के मुद्दे में न जाते हुए—बल्कि रोक लगाने के उन पैमानों को देखते हुए, जैसे कि स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था।"
जस्टिस सुंदरेश ने भी टिप्पणी की कि धार्मिक प्रथाओं के मामलों में 'न्यायिक संयम' को ऊपर बताए गए जैसे मामलों में फैसला सुनाने की अदालत की शक्ति के पूर्ण बहिष्कार के साथ नहीं मिलाया जा सकता।
"हम (अदालतें) भले ही 'हस्तक्षेप न करने' (Hands-Off) का रवैया अपना सकते हैं, लेकिन यह कहना कि इस पर पूरी तरह से रोक लग जानी चाहिए—यह सही नहीं है।"
जस्टिस बागची ने समझाया कि भले ही विधायिका के पास पर्याप्त सुधारवादी कानून बनाने की शक्ति हो, लेकिन केवल इसी आधार पर अदालतों को 'न्यायिक पुनर्विचार' के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने से नहीं रोका जा सकता।
"हम अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत विधायिका के उद्देश्य को समझते हैं, लेकिन इससे किसी उचित मामले में अदालत का 'अवशिष्ट क्षेत्राधिकार' (Residual Jurisdiction) समाप्त नहीं हो जाता।"
एसजी (सॉलिसिटर जनरल) ने स्पष्ट किया कि अदालत निश्चित रूप से उन प्रथाओं को रद्द कर सकती है, जो स्पष्ट रूप से 'अदालत की अंतरात्मा को झकझोर देती हैं'—जैसे कि नरबलि, नरभक्षण या जादू-टोना।
CJI ने आगे कहा,
"जिस क्षण इस तरह की कोई प्रथा सामने आती है, अदालत सीधे तौर पर कह देगी कि यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य का उल्लंघन करती है।"
ERP (आवश्यक धार्मिक प्रथा) का निर्धारण करने में अदालतें किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती हैं?
पीठ इस पर विचार कर रही है।
पीठ ने चर्चा को इस दिशा में मोड़ा कि अदालतें किसी 'आवश्यक धार्मिक प्रथा' (ERP) का निर्धारण करने में किस हद तक हस्तक्षेप कर सकती हैं।
गौरतलब है कि ERP एक न्यायिक सिद्धांत है, जिसके तहत अदालत यह जांच करती है कि कोई प्रथा किसी धर्म के लिए 'आवश्यक' या 'मौलिक' है या नहीं, और क्या उसे अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण मिलना चाहिए। यदि कोई प्रथा 'गैर-आवश्यक' पाई जाती है तो राज्य उस पर प्रतिबंध लगा सकता है या उसे विनियमित कर सकता है। सात जजों की एक संविधान पीठ ने 1954 के ऐतिहासिक 'श्री शिरूर मठ मामले' में ERP टेस्ट की शुरुआत की थी।
इस मामले में मठ ने 'मद्रास हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1951' को चुनौती दी थी, जिसे राज्य सरकार ने धार्मिक बंदोबस्तियों को विनियमित करने के लिए पारित किया। पीठ ने यह फैसला दिया कि किसी भी ERP का निर्धारण उस धर्म के अपने सिद्धांतों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान, जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह तय करते समय कि कोई प्रथा ERP (ज़रूरी धार्मिक प्रथा) है या नहीं, कोर्ट को उस प्रथा को संबंधित धर्म के नज़रिए से देखना चाहिए, न कि किसी दूसरे धर्म के दर्शन से प्रभावित होना चाहिए।
जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि ऐसा करते समय अगर कोई प्रथा नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था वगैरह का उल्लंघन करती है, तो कोर्ट उसका मूल्यांकन करके उसे रद्द भी कर सकता है।
आगे कहा गया,
"ऐसे मामलों में कोर्ट का नज़रिया भी यही होना चाहिए कि वह ज़रूरी धार्मिक प्रथा (ERP) को उस खास धर्म के दर्शन के नज़रिए से तय करे। आप किसी दूसरे धर्म को लागू करके यह नहीं कह सकते कि यह ERP नहीं है। कोर्ट का नज़रिया उस खास धर्म के दर्शन को लागू करना है, बशर्ते वह सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के खिलाफ न हो। कोर्ट हमेशा उसे रद्द कर सकता है। कोर्ट की भूमिका अहम है, बजाय इसके कि यह कहा जाए कि कोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र है या नहीं। कोर्ट को उस खास धर्म के दर्शन, उस देवी-देवता के नज़रिए से कैसे देखना चाहिए..."
जस्टिस सुंदरेश ने बीच में टोकते हुए एक सावधानी बरतने की सलाह दी कि ERP टेस्ट लागू करते समय कोर्ट को खुद को सिर्फ़ संबंधित धार्मिक प्रथा तक ही सीमित रखना चाहिए, न कि धार्मिक मान्यताओं में तर्क खोजने की हद तक जाना चाहिए।
उन्होंने समझाया:
"यह एक ऐसे काम की तरह है, जो शून्य (Void) या शून्यकरणीय (Voidable) है। अगर वह शून्य है तो याचिकाकर्ता उसके लिए घोषणा का अनुरोध करता है। उस हद तक हम उसे रद्द कर सकते हैं। अगर कोई चीज़ सती या विधवा पुनर्विवाह की तरह साफ़ तौर पर गलत है। अगर उस पर कोई कानून नहीं बना है तो हम उस हद तक अपनी भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, मैं इस बात की सराहना करता हूं कि हम अपनी सीमा से बाहर जाकर कोई ऐसी भूमिका नहीं निभा सकते जो हमें सौंपी नहीं गई। आप धर्म पर सीधे तौर पर तर्क का सिद्धांत लागू नहीं कर सकते।"
एसजी ने सहमति जताते हुए कहा कि कोर्ट सिर्फ़ यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि मान्यताएं संवैधानिक सिद्धांतों और सीमाओं के दायरे में हों, न कि वे आस्था की अपनी खुद की व्याख्या करें।
"हम तर्कसंगतता को आस्था और विश्वास प्रणाली से नहीं जोड़ सकते। अगर मैं किसी चीज़ में विश्वास करता हूं तो जब तक वह सार्वजनिक हित, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ न हो, तब तक तर्कसंगतता, विज्ञान वगैरह के आधार पर उसकी योग्यता की समीक्षा नहीं की जा सकती।"
Case Details: KANTARU RAJEEVARU Versus INDIAN YOUNG LAWYERS ASSOCIATION THR.ITS GENERAL SECRETARY MS. BHAKTI PASRIJA AND ORS., R.P.(C) No. 3358/2018 in W.P.(C) No. 373/2006