सबरीमाला मामला: भारत पितृसत्तात्मक या जेंडर स्टीरियोटाइप समाज नहीं है—सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला संदर्भ मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि भारत को पश्चिमी सोच के अनुसार “पितृसत्तात्मक” (Patriarchal) या “जेंडर स्टीरियोटाइप” वाला समाज नहीं माना जा सकता। उन्होंने मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े प्रतिबंधों पर “अस्पृश्यता” जैसे संवैधानिक सिद्धांत लागू करने का भी विरोध किया।
भारत में महिलाओं की स्थिति पर SG की दलील
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भारतीय समाज ने हमेशा महिलाओं को सम्मान और उच्च स्थान दिया है।
उन्होंने कहा:
“भारत में महिलाओं को हमेशा बराबरी ही नहीं, बल्कि ऊंचा स्थान दिया गया है… हाल के कुछ फैसलों में 'पितृसत्तात्मक समाज' या 'जेंडर स्टीरियोटाइप' की बात कही गई है, लेकिन हमारे समाज में ऐसा कभी नहीं रहा।”
उन्होंने आगे कहा कि भारत एक ऐसा समाज है जहां महिलाओं की पूजा की जाती है और सार्वजनिक जीवन में भी उन्हें उच्च सम्मान दिया जाता है।
“Founding Mothers” की भूमिका
तुषार मेहता ने संविधान सभा की बहसों का जिक्र करते हुए राजकुमारी अमृत कौर और डॉ. हंसा मेहता की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि इन महिलाओं ने यह सुनिश्चित किया कि धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ में पुरानी सामाजिक बुराइयाँ वापस न आएं।
इस दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि इन महिलाओं को “Founding Fathers” की तरह “Founding Mothers of the Constitution” कहा जाना चाहिए।
अनुच्छेद 25 की व्याख्या
सॉलिसिटर जनरल ने अनुच्छेद 25 में दिए गए शब्द “सभी व्यक्तियों को समान अधिकार” (all persons equally entitled) की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य जेंडर समानता नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता (secularism) सुनिश्चित करना था।
उन्होंने कहा:
“यह प्रावधान इसीलिए जोड़ा गया था ताकि कोई धर्म अपनी संख्या के आधार पर अधिक अधिकार न मांग सके… इसका जेंडर से कोई संबंध नहीं है।”
उन्होंने यह भी कहा कि जेंडर समानता पहले से ही अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 में सुनिश्चित की गई है।
अनुच्छेद 26 पर दलील
अनुच्छेद 26 की व्याख्या करते हुए SG ने कहा कि इसमें “any section thereof” शब्द जानबूझकर जोड़े गए हैं, ताकि किसी धार्मिक संप्रदाय के भीतर छोटे-छोटे समूहों (sub-groups) के अधिकार भी सुरक्षित रह सकें।
उन्होंने कहा कि यह प्रावधान विभिन्न धार्मिक समूहों को अपने धार्मिक मामलों को स्वतंत्र रूप से संचालित करने का अधिकार देता है।