सुप्रीम कोर्ट ने नकली दवाओं की बिक्री के मुद्दे पर दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने याचिका की एक कॉपी केंद्र सरकार को विचार के लिए भेजने का निर्देश दिया।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर उस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कैंसर और अन्य जीवन रक्षक दवाओं की नकली बिक्री का मुद्दा उठाया गया।

संक्षेप में मामला

याचिकाकर्ता ने नकली दवाओं के मामलों में जांच समय पर पूरी करने और संगठित अपराध (ऑर्गनाइज्ड क्राइम) से जुड़े कानूनी ढांचे के तहत इस समस्या से निपटने के लिए सिस्टम बनाने का निर्देश देने की मांग की।

उनकी याचिका में कहा गया,

"नकली दवाएं संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों के लिए गंभीर खतरा हैं। कीमती साल, मौके और जानें कभी वापस नहीं लाई जा सकतीं; इसलिए यह नुकसान किसी भी भौतिक वस्तु के नुकसान से कहीं अधिक गंभीर है।"

मांगी गई राहतों में शामिल हैं - (i) नकली दवा बनाने वालों/बेचने वालों/फाइनेंसरों/उनके परिवार के सदस्यों की संपत्ति का तय समय में आकलन और ज़ब्ती, (ii) मिलावटी और नकली दवाओं की तलाशी, ज़ब्ती और सैंपलिंग के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) बनाना, (iii) नकली दवाओं के मामलों में FSL रिपोर्ट जमा करने के लिए समय-सीमा तय करना, आदि।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता उपाध्याय ने कहा कि 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट' में कड़े प्रावधान होने के बावजूद, नकली दवाओं का निर्माण और बिक्री 'संगठित अपराध' से निपटने वाले कानूनी ढांचे के दायरे में नहीं आता है। BNS की धारा 111 (संगठित अपराध) का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कानून में एक कमी है।

उपाध्याय ने तर्क दिया,

"आतंकवादी एक साल में ज़्यादा से ज़्यादा 1000 लोगों को मारते हैं। नकली दवा बनाने वाले लगभग 1 लाख लोगों की जान लेते हैं।"

इसके जवाब में जस्टिस बागची ने कहा कि मोटर दुर्घटनाओं में ज़्यादा लोग मारे जाते हैं।

आखिरकार बेंच ने कहा कि उपाध्याय ने याचिका दायर करने से पहले संबंधित अधिकारियों के सामने अपने सुझाव नहीं रखे थे।

याचिका का निपटारा करते हुए आदेश इस प्रकार लिखवाया गया:

"हालांकि, हमने पाया कि याचिकाकर्ता ने यह रिट याचिका दायर करने से पहले संबंधित अधिकारियों से संपर्क नहीं किया। ऐसी स्थिति में, जहां संबंधित अधिकारियों को कई तरह की कार्रवाई सख्ती से करनी है, हम इस रिट याचिका का निपटारा करते हैं। हम मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं, लेकिन रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वह रिट याचिका की कॉपी संबंधित अधिकारियों को उनके विचारार्थ भेज दे। याचिकाकर्ता एक सप्ताह के भीतर पेपर बुक की ज़रूरी प्रतियां जमा करने का वचन देता है।"

Case: Ashwini Kumar Upadhyay v. Union of India & Ors., W.P.(Crl) No. 373/2026

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