डिजिटल न्यूज़ आउटलेट 'द न्यूज़ मिनट' और उसकी एडिटर-इन-चीफ़ धन्या राजेंद्रन ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दायर की। वे संविधान के आर्टिकल 194(3) के तहत विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और आर्टिकल 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार के बीच संबंध से जुड़े लंबे समय से लंबित मामले में दखल देने की अनुमति मांग रहे हैं।

एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड पृथा श्रीकुमार अय्यर के ज़रिए दायर दखल अर्ज़ी में उन्होंने तर्क दिया कि अगर विधायी निकायों को पत्रकारिता की रिपोर्टिंग और कमेंट्री को रोकने के लिए विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही करने की अनुमति दी जाती है, तो इसका प्रेस की आज़ादी और जनता के सूचना के अधिकार पर बुरा असर पड़ेगा और भारतीय लोकतंत्र भी प्रभावित होगा।

याचिका में कहा गया,

"इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विधायिका के सदस्यों के कामों पर रिपोर्टिंग और कमेंट्री को सिर्फ़ कुछ खास व्यक्तियों के बारे में बातचीत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे चुने हुए प्रतिनिधियों और संवैधानिक पद संभालने वालों के बारे में बातचीत के तौर पर देखा जाना चाहिए। इस तरह विधायिका के सदस्यों के बारे में प्रेस की बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी विधायिका की शक्तियों और अधिकार पर एक ज़रूरी अंकुश का काम करती है। भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां विधायिका के सदस्य राजनीतिक कार्यपालिका का भी हिस्सा होते हैं। यह एक स्थापित बात है कि सार्वजनिक अधिकारियों के आचरण में नागरिक की जायज़ और बड़ी दिलचस्पी होती है और प्रेस की आज़ादी में सार्वजनिक मुद्दों और घटनाओं में सार्वजनिक हस्तियों की भागीदारी के बारे में खुलकर बहस करना भी शामिल है। इसलिए प्रेस की बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी को कम करने के लिए विधायी विशेषाधिकार का इस्तेमाल भारतीय लोकतंत्र की सेहत पर गंभीर असर डालेगा।"

अर्ज़ी में कहा गया कि याचिकाकर्ता इस मामले से जुड़े संवैधानिक सवालों से सीधे और काफ़ी हद तक प्रभावित हैं, क्योंकि 'द न्यूज़ मिनट' नियमित रूप से विधायी कार्यवाही के अंदर और बाहर विधायकों के आचरण पर रिपोर्ट करता है और उसे चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा दायर मामलों में बोलने पर रोक (गैग ऑर्डर) का सामना करना पड़ा है।

यह मामला तमिलनाडु विधानसभा के 2003 के उस फ़ैसले से जुड़ा है, जिसमें तत्कालीन राज्य सरकार की आलोचना करने वाले लेखों के लिए पांच पत्रकारों और 'द हिंदू' के प्रकाशक को 15 दिन की जेल की सज़ा सुनाई गई। सात जजों की संविधान पीठ 6 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक इस मामले की सुनवाई करेगी। यह मामला संविधान के अनुच्छेद 194(3), 19(1)(a) और 21 की व्याख्या से जुड़ा है, खासकर विधायी विशेषाधिकारों की सीमाओं और मौलिक अधिकारों के साथ उनके संबंध से।

आवेदकों का तर्क है कि अगर विधायी विशेषाधिकारों के तहत विधायकों के बारे में रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जाती है तो पत्रकारों को अपने पेशेवर कर्तव्यों को निभाने के लिए जेल की सज़ा जैसे बुरे कानूनी नतीजों का सामना करना पड़ सकता है।

आवेदकों का कहना है कि विधायी विशेषाधिकारों के ज़रिए पत्रकारिता रिपोर्टिंग पर कोई भी रोक न केवल अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रेस की बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रभावित करेगी, बल्कि जनता के सूचना के अधिकार को भी प्रभावित करेगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार का एक अहम हिस्सा माना है।

उन्होंने अनुच्छेद 19(1)(g) का भी ज़िक्र किया, जो किसी भी पेशे को अपनाने या किसी भी काम, व्यापार या कारोबार को करने के अधिकार की गारंटी देता है। याचिका में कहा गया कि राजनीतिक रिपोर्टिंग 'द न्यूज़ मिनट' के प्रकाशनों का अहम हिस्सा है। ऐसी रिपोर्टिंग पर रोक से संगठन के कारोबार और राजेंद्रन की पेशेवर आज़ादी को खतरा हो सकता है।

याचिका में मीडिया पेशेवरों के खिलाफ विधायी विशेषाधिकारों के इस्तेमाल के उदाहरण दिए गए, जिसमें कर्नाटक विधानसभा का 2017 का वह फैसला भी शामिल है, जिसमें दो संपादकों को एक साल की जेल और जुर्माना लगाया गया।

आवेदकों ने जन प्रतिनिधियों द्वारा मीडिया संगठनों के खिलाफ दायर दीवानी मुकदमों और निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की मांग का भी ज़िक्र किया। याचिका में अदालती रोक के आदेशों और राजनेताओं द्वारा मीडिया कवरेज के खिलाफ एकतरफा निषेधाज्ञा की मांग का भी ज़िक्र है।

आवेदकों का तर्क है कि विधायी विशेषाधिकार की कार्यवाही और अन्य कानूनी कार्रवाई का सामना करने की संभावना पत्रकारों को चुने हुए प्रतिनिधियों और जनहित के मामलों पर रिपोर्टिंग करने से हतोत्साहित करेगी।

व्यंग्यकार कुणाल कामरा, पत्रकार अजीत अंजुम, सीमा चिश्ती, परंजॉय गुहा ठाकुरता, CPI(M) नेता सुभाषिनी अली आदि ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की।

7 जजों की पीठ 6 अक्टूबर से सुनवाई शुरू करेगी।

Case Title : N. Ravi v. Speaker Legislative Assembly Chennai

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