कानूनी प्रतिनिधि आर्बिट्रल अवार्ड को सिर्फ़ आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 के तहत ही चुनौती दे सकते हैं, अनुच्छेद 227 के तहत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-04-21 04:20 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि आर्बिट्रल अवार्ड से पीड़ित किसी कानूनी प्रतिनिधि के लिए सही उपाय यह है कि वह आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत आवेदन दायर करे, न कि संविधान के अनुच्छेद 227 या सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 115 के तहत याचिका दायर करे।

कोर्ट ने कहा,

"इस कोर्ट की राय में किसी आर्बिट्रल अवार्ड को चुनौती देने के लिए कानूनी प्रतिनिधि के पास सही उपाय आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 के तहत है, न कि संविधान के अनुच्छेद 227 या CPC की धारा 115 के तहत।"

कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत पक्षकार के कानूनी प्रतिनिधि भी एक्ट में दिए गए उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट अपने आप में एक संपूर्ण संहिता है।

धारा 34 में इस्तेमाल किया गया शब्द 'पक्षकार' में वे 'कानूनी प्रतिनिधि' भी शामिल होंगे, जो उसके तहत दावा कर रहे हैं। किसी पक्षकार की मृत्यु होने पर इसका स्वाभाविक परिणाम—जो परिभाषा खंड से ही स्पष्ट है—यह है कि पक्षकार की मृत्यु के बाद कानूनी प्रतिनिधि इस एक्ट के उद्देश्यों के लिए उस पक्षकार की जगह ले लेते हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा,

"...यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि आर्बिट्रेशन एक्ट की योजना में यह परिकल्पना नहीं की गई कि किसी पक्षकार की मृत्यु के साथ ही आर्बिट्रेशन की कार्यवाही समाप्त हो जाए। आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 35, आर्बिट्रल अवार्ड की अंतिम वैधता को न केवल अवार्ड के पक्षकारों तक बढ़ाती है, बल्कि 'उनके तहत दावा करने वाले पक्षकारों' तक भी बढ़ाती है।"

यह विवाद 2007 के एक बिक्री समझौते से जुड़ा था, जिसे अपीलकर्ता के चाचा अप्पू जॉन ने निष्पादित किया, जिनकी उसके कुछ ही समय बाद मृत्यु हो गई। आर्बिट्रेशन की कार्यवाही शुरू की गई, लेकिन कथित तौर पर एक गलत कानूनी प्रतिनिधि के ख़िलाफ़। 2011 के आर्बिट्रल अवार्ड में बिक्री विलेख (सेल डीड) को निष्पादित करने का निर्देश दिया गया।

अपीलकर्ता ने खुद को एकमात्र कानूनी वारिस बताते हुए और यह दावा करते हुए कि उसे कोई नोटिस नहीं मिला था, अनुच्छेद 227 के तहत मद्रास हाईकोर्ट में इस अवार्ड को चुनौती दी। हाईकोर्ट ने याचिका ख़ारिज की और उसे इसके बजाय धारा 34 के तहत उपलब्ध उपाय का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए एक फ़ैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि किसी मध्यस्थता कार्यवाही में शामिल किसी पक्षकार की मृत्यु हो जाने पर उसके कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि कानूनी वारिस (LRs) इस एक्ट की धारा 34 के तहत मध्यस्थता ट्रिब्यूनल के सामने अवार्ड को चुनौती देने के हकदार हैं।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...किसी कानूनी प्रतिनिधि को धारा 34 के तहत अवार्ड को चुनौती देने के अधिकार से वंचित करना, मध्यस्थता एक्ट के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देगा और विवाद समाधान के लिए अपने-आप में पूर्ण संहिता (Code) के तौर पर इसके मकसद को भी नाकाम कर देगा... हमारी राय में किसी मृत पक्षकार के कानूनी प्रतिनिधियों को एक तरफ तो इस कानून के तहत किसी भी उपाय से वंचित नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ उन्हें अवार्ड को पूरा करने के लिए ज़िम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता।"

उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने अपील खारिज की और विवादित निष्कर्षों को सही ठहराते हुए अपीलकर्ता को इस एक्ट की धारा 34 के तहत अवार्ड को चुनौती देने का निर्देश दिया।

Cause Title: V.K. JOHN VERSUS S. MUKANCHAND BOTHRA AND HUF (DIED) REPRESENTED BY LRS. & ORS.

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