सीनियर पत्रकार अजीत अंजुम ने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी दाखिल की। इसमें उन्होंने विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और सीमाओं से जुड़े 7 जजों की बेंच के लंबित रेफरेंस में दखल देने की इजाज़त मांगी। उनका कहना है कि विधायी विशेषाधिकार और मौलिक अधिकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने ऐसे मानक तय करने की मांग की, जिनसे यह साफ हो सके कि विधायी कार्यवाही की निष्पक्ष आलोचना कब विशेषाधिकार का उल्लंघन मानी जाएगी।

सीनियर पत्रकार ने इस रेफरेंस से जुड़े व्यापक संवैधानिक मुद्दों पर ज़ोर दिया, जैसे कि विधायी विशेषाधिकार, जनता के सूचना के अधिकार, प्रेस की आज़ादी और अदालतों द्वारा विधायी विशेषाधिकार से जुड़े सवालों की जांच करने की सीमा के बीच संबंध।

AoR नेहा राठी के ज़रिए दाखिल इस अर्ज़ी में कहा गया कि विधायी विशेषाधिकार इसलिए दिए जाते हैं ताकि सदन अपने संवैधानिक और विधायी कार्यों को प्रभावी ढंग से पूरा कर सके। इसलिए इनका मकसद बिना रोक-टोक वाली शक्तियां देना नहीं, बल्कि कामकाज से जुड़ा मकसद पूरा करना है।

इसमें कहा गया कि ऐसे विशेषाधिकारों की व्याख्या पूरे संविधान के संदर्भ में की जानी चाहिए। इसमें यह भी तर्क दिया गया कि बोलने की आज़ादी की गारंटी और विधायी विशेषाधिकार से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या में तालमेल बिठाना ज़रूरी है। ऐसा खासकर उन संवैधानिक और कानूनी बदलावों को देखते हुए ज़रूरी है, जो केशव सिंह रेफरेंस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मुद्दे पर विचार करने के बाद हुए हैं।

याचिका में कहा गया,

"अनुच्छेद 105 और 194 के तहत विशेषाधिकारों की व्याख्या असीमित शक्तियों के तौर पर नहीं की जानी चाहिए। उन्हें संवैधानिक सर्वोच्चता और लागू करने योग्य मौलिक अधिकारों के दायरे में ही काम करना चाहिए।"

अनुच्छेद 19(1)(a) (बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी) के व्यापक दायरे को देखते हुए पत्रकार ने पंडित MSM शर्मा बनाम श्री कृष्ण सिन्हा मामले में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार की भी मांग की।

अंजुम से पहले स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने भी दखल देने के लिए अर्ज़ी दाखिल की थी। उन्होंने कहा कि ऐसे विशेषाधिकार का इस्तेमाल नागरिकों की आवाज़ दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। अपनी अर्ज़ी में कामरा ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 194(3) के तहत विधायी विशेषाधिकार और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी के मौलिक अधिकार के बीच आपसी संबंध पर सुप्रीम कोर्ट का विचार महाराष्ट्र विधानसभा के सामने उनके खिलाफ लंबित विशेषाधिकार उल्लंघन की कार्यवाही पर सीधा असर डालता है।

7 जजों की बेंच 6 अक्टूबर को सुनवाई शुरू करेगी।

Case : N. Ravi v. Speaker, Legislative Assembly Chennai | W.P. (Crl.) No. 206-210/2003

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