बिना ट्रायल के जेल में रखना सज़ा के बराबर: सुप्रीम कोर्ट ने दो साल की अंडरट्रायल कस्टडी के बाद व्यक्ति को ज़मानत दी

Update: 2026-03-29 07:49 GMT

यह देखते हुए कि किसी आरोपी को बिना ट्रायल शुरू हुए लगभग दो साल तक हिरासत में रखना सज़ा के बराबर है, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में प्रदीप कुमार नाम के एक व्यक्ति को ज़मानत दे दी, जिस पर कथित तौर पर रंगदारी मांगने और हत्या की कोशिश का आरोप था।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के 11 जुलाई, 2025 के उस आदेश के खिलाफ अपील को मंज़ूरी दी, जिसमें ज़मानत देने से इनकार कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा,

"अपीलकर्ता की गिरफ्तारी को लगभग दो साल बीत चुके हैं, जबकि ट्रायल अभी तक शुरू भी नहीं हुआ है। उसके खत्म होने की भी कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही है। बिना ट्रायल के जेल में रखना सज़ा के बराबर है।"

अपीलकर्ता को 13 अप्रैल, 2024 को एक मामले में गिरफ्तार किया गया, जिसमें रंगदारी मांगने, हत्या की कोशिश, आपराधिक धमकी और आपराधिक साज़िश के आरोपों के साथ-साथ आर्म्स एक्ट के तहत भी अपराध शामिल थे।

कोर्ट ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष 23 गवाहों की जांच करने का प्रस्ताव रखता है, लेकिन अब तक किसी की भी जांच नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल खत्म होने में समय लगने की संभावना है और इसके जल्द शुरू होने का कोई संकेत नहीं है।

कुल मिलाकर स्थिति को देखते हुए बेंच ने कहा कि ट्रायल के दौरान आरोपी को और हिरासत में रखना ज़रूरी नहीं है। बेंच ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि अपीलकर्ता को ज़मानत पर रिहा किया जाए, बशर्ते वह ज़मानत बांड जमा करे और ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तों का पालन करे।

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार उन अंडरट्रायल कैदियों के मुद्दे को उठाया है, जो बिना ट्रायल और दोषसिद्धि के लंबे समय तक जेल में बंद रहते हैं।

2024 में तमिलनाडु के पूर्व मंत्री सेंथिल बालाजी को ज़मानत देते हुए कोर्ट ने कहा था कि PMLA, UAPA और NDPS एक्ट जैसे कड़े दंडात्मक कानूनों में ज़मानत देने के लिए तय की गई कड़ी शर्तें, किसी आरोपी को बिना ट्रायल के जेल में रखने का ज़रिया नहीं बन सकतीं।

जुलाई, 2025 में कोर्ट ने NIA ट्रायल में हो रही देरी के मुद्दे को उठाया और कहा कि अगर सरकार तेज़ी से ट्रायल कराने के लिए ज़रूरी बुनियादी ढांचा तैयार करने में नाकाम रहती है तो कोर्ट के पास अंडरट्रायल कैदियों को ज़मानत देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा।

कोर्ट ने पूछा,

"संदिग्धों को अनिश्चित काल तक हिरासत में कब तक रखा जा सकता है?"

सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत की अर्ज़ियों पर फैसला लेने में होने वाली देरी के मुद्दे पर भी बात की। पिछले साल, कोर्ट ने कहा था कि ज़मानत की अर्ज़ियों पर आमतौर पर दो महीने के भीतर फैसला ले लिया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसी अर्ज़ियों का लंबे समय तक लंबित रहना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करता है। एक अन्य मामले में कोर्ट ने ज़मानत की अर्जियों पर फ़ैसला लेने में हो रही देरी की आलोचना की और ज़ोर देकर कहा कि कोर्ट को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामलों में संवेदनशील होना चाहिए, खासकर उन मामलों में जहाँ ज़मानत की सुनवाई ही लंबे समय तक लंबित रखी जाती है।

फ़रवरी, 2025 में कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यदि कोई आरोपी अंतिम फ़ैसले से पहले विचाराधीन कैदी के तौर पर जेल में छह से सात साल बिता देता है तो यह अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा।

हाल ही में, इसी महीने की शुरुआत में कोर्ट ने महाराष्ट्र में चल रहे मुकदमों में हो रही "अस्पष्ट और भारी देरी" की ओर ध्यान दिलाया और यह कहा कि मुकदमों को पूरा करने में बार-बार होने वाली देरी एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई।

इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सिद्धांत की भी कुछ सीमाएं हैं। जनवरी, 2026 में दिल्ली दंगों की "बड़ी साज़िश" से जुड़े मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की ज़मानत की अर्जियों को खारिज करते हुए कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया कि मुकदमे में होने वाली देरी, अपने आप ज़मानत पाने का कोई "अचूक हथियार" (Trump Card) नहीं है; बल्कि इस देरी पर विचार करते समय आरोपी पर लगाए गए आरोपों की प्रकृति को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

Case Title – Pardeep Kumar @ Banu v. State of Punjab

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