सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कहा कि वह ऐसी केंद्रीय अथॉरिटी तय करे, जो यह पक्का करे कि जहां भी सड़क हो, वहां फुटपाथ भी हो। साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऐसे पाँच शहर चुनने का निर्देश दिया, जहां कोर्ट के निर्देशों को शुरुआती तौर पर एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू किया जा सके।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा कि वे ऐसी अथॉरिटी तय करने के बारे में निर्देश लें और कोर्ट के सामने रिपोर्ट दाखिल करें। बेंच जून में दिए गए अपने उस फैसले के पालन की निगरानी कर रही थी, जिसमें कहा गया कि फुटपाथ पर चलने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और हर सड़क पर एक अलग फुटपाथ होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि जिस अथॉरिटी को यह काम सौंपा जाए, उसके पास इस ज़िम्मेदारी को ठीक से निभाने के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर, जगह, मानव संसाधन और फंड होने चाहिए।

जस्टिस नरसिम्हा ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा,

"सबसे पहले, एक केंद्रीय अथॉरिटी होनी चाहिए, जो प्लानिंग करे। दूसरी बात, इसे पहचानना और पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू करना। अथॉरिटी के पास जगह, इंफ्रास्ट्रक्चर, मानव संसाधन और फंड होने चाहिए, जिसका मतलब है कि उसे ठीक से काम करने वाली अथॉरिटी होना चाहिए।"

अपने आदेश में बेंच ने कहा कि यह पक्का करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए कि जहां भी सड़कें हों, वहां फुटपाथ भी हों।

इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया:

"हमारे फ़ैसले को आगे बढ़ाते हुए... हमारी राय है कि यह पक्का करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए कि जहां भी सड़क हो, वहां फ़ुटपाथ ज़रूर हो। हम भारत सरकार को निर्देश देते हैं कि वह उस अथॉरिटी की पहचान करे, जो फ़ुटपाथ बनाने की ज़रूरत को पूरा करने के लिए ज़िम्मेदार होगी। अगर ऐसी कोई अथॉरिटी पहले से मौजूद नहीं है या कानूनी ढांचे के तहत उसकी पहचान नहीं की गई तो ऐसी अथॉरिटी बनाई जा सकती है। यह ज़रूरी है कि ऐसी अथॉरिटी के पास इंफ्रास्ट्रक्चर, जगह, मानव संसाधन और फ़ंड के मामले में सभी ज़रूरी चीज़ें उपलब्ध हों।

मिस्टर नटराज ऐसी अथॉरिटी की पहचान के बारे में कोर्ट को रिपोर्ट करेंगे। हमारी यह भी राय है कि भारत में पांच शहरों की पहचान की जा सकती है जहाँ हम उन जगहों पर फ़ुटपाथ बनाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू कर सकते हैं, जहां सड़कें मौजूद हैं। मिस्टर नटराज निर्देश लेंगे और सुनवाई की अगली तारीख पर हमें जानकारी देंगे। 3 हफ़्ते बाद लिस्ट करें।"

कोर्ट ने अपने जून के आदेश में ये निर्देश दिए:

1. पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग III के तहत एक मौलिक अधिकार है। यह अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत गारंटीकृत आवाजाही के अधिकार का अहम हिस्सा है, जिसे अनुच्छेद 19(1)(a), अनुच्छेद 19(1)(b), अनुच्छेद 19(1)(c) और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिए। पैदल चलने के मौलिक अधिकार में तय फ़ुटपाथ का अधिकार भी शामिल होगा। ये अधिकार प्राथमिक हैं और मोटर वाले वाहनों से आवाजाही की तुलना में इन्हें प्राथमिकता दी जाएगी।

2. तय फ़ुटपाथ पर पैदल चलने के मौलिक अधिकार के साथ एक संबंधित कर्तव्य भी जुड़ा है। अगर सड़क मौजूद है, तो यह पक्का करना कर्तव्य है कि पैदल चलने वालों के लिए तय और अच्छी तरह से बनाए गए फ़ुटपाथ हों। शहरी विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगरपालिकाएं और यहां तक कि पंचायतें भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं; उन्हें फ़ुटपाथ और पैदल चलने वालों के लिए ज़रूरी अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर को तय करने, बनाने, बनाए रखने और सुरक्षित रखने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि पैदल चलना जीवन का एक अहम हिस्सा है।

3. तय फ़ुटपाथ पर पैदल चलने के अधिकार का उल्लंघन होने पर नागरिक ज़िम्मेदार अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुआवज़े और सुधार के लिए संवैधानिक और कानूनी उपाय अपना सकते हैं। यह उपाय मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत उपलब्ध उपायों से अलग है।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट की कई अन्य बेंचों ने भी यह माना कि फ़ुटपाथ का इस्तेमाल करने का अधिकार अनुच्छेद 19 और 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। 'एस राजशेखरन बनाम भारत संघ' मामले में जस्टिस एएस ओक और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने फ़ुटपाथ के बिना किसी रुकावट और दिव्यांग-अनुकूल इस्तेमाल के लिए निर्देश जारी किए।

जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच भी इन निर्देशों के लागू होने पर नज़र रख रही है और एक लंबे समय से चल रही रिट याचिका में सड़कों और फ़ुटपाथों पर पैदल चलने वालों की सुरक्षा से जुड़े और निर्देश भी जारी किए। इनमें हेलमेट पहनना, गलत लेन में गाड़ी चलाना और कारों पर अनधिकृत हूटर का इस्तेमाल करना जैसी बातें शामिल हैं।

Case Title : IN RE: FUNDAMENTAL RIGHT TO WALK AND FOOTPATH Vs MINISTRY OF HOUSING AND URBAN AFFAIRS

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