सीनियर एडवोकेट रेबेका जॉन ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे की आलोचना की। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों को वे सुरक्षा उपाय भी नहीं मिलते, जो हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के लिए गिरफ्तार किए गए लोगों को मिलते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में 'लाइवलॉ' (LiveLaw) से बातचीत करते हुए रेबेका जॉन ने कहा कि 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS), 'दिल्ली पुलिस अधिनियम' और पुलिस के 'स्टैंडिंग ऑर्डर्स' (नियमों) में मौजूद प्रावधान मिलकर पुलिस को यह व्यापक अधिकार देते हैं कि वे बिना कोई आपराधिक मामला दर्ज किए ही प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले सकें।

उन्होंने तर्क दिया कि यह कानूनी ढांचा पुलिस को ऐसी कठोर शक्तियां देता है, जिसमें न तो न्यायिक निगरानी होती है और न ही वे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय होते हैं, जो आमतौर पर किसी औपचारिक गिरफ्तारी के समय मिलते हैं।

रेबेका जॉन ने कहा,

"अगर किसी व्यक्ति पर हत्या या बलात्कार जैसा कोई बहुत जघन्य अपराध करने का आरोप हो और उसे गिरफ्तार किया जाए, तो भी उसे कहीं बेहतर अधिकार प्राप्त होते हैं।"

उन्होंने बताया कि किसी आपराधिक मामले में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की गिरफ्तारी का रिकॉर्ड रखा जाता है, उसे गिरफ्तारी के कारणों के बारे में बताया जाता है, उसे वकील तक पहुंच मिलती है और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने से पहले उसका मेडिकल परीक्षण भी कराया जाता है। इसके अलावा, मजिस्ट्रेट मामले की डायरी की जांच करते हैं और यह भी देखते हैं कि कहीं उस व्यक्ति को प्रताड़ित तो नहीं किया गया।

हालांकि, उन्होंने कहा कि जिन प्रदर्शनकारियों को बिना FIR दर्ज किए या बिना औपचारिक गिरफ्तारी के हिरासत में लिया जाता है, उन्हें अक्सर इस तरह के सुरक्षा उपाय नहीं मिल पाते।

रेबेका जॉन ने कहा,

"जिस व्यक्ति के खिलाफ कोई FIR नहीं है, उससे ज्यादा-से-ज्यादा एक 'बॉन्ड' (मुचलका) भरवाया जा सकता है, लेकिन उसे इनमें से कोई भी सुरक्षा नहीं मिलती।"

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे लोग आपराधिक कानून के तहत मिलने वाले सामान्य सुरक्षा दायरे से बाहर रह जाते हैं।

'प्रावधानों का पूरा समूह' मनमानी हिरासत को संभव बनाता है

रेबेका जॉन ने कहा कि प्रदर्शनकारियों की हिरासत को केवल किसी एक प्रावधान को अलग से देखकर नहीं समझा जा सकता। इसके बजाय, उन्होंने प्रावधानों के एक ऐसे "पूरे समूह" (Entire Basket) की ओर इशारा किया, जो सामूहिक रूप से पुलिस को यह अधिकार देता है कि वे प्रदर्शनकारियों की आवाजाही पर रोक लगा सकें और उन्हें हिरासत में ले सकें। उन्होंने BNSS की धारा 163 (जो पहले CrPC की धारा 144 थी) का जिक्र किया। यह धारा कार्यकारी मजिस्ट्रेटों (Executive Magistrates) को खतरे की आशंका वाले तत्काल मामलों में आदेश जारी करने का अधिकार देती है। इसके अलावा, उन्होंने धारा 126 और 170 का भी उल्लेख किया, जो शांति भंग होने से रोकने की कार्यवाही और एहतियाती गिरफ्तारी (Preventive Arrests) से संबंधित हैं।

उन्होंने BNSS की धारा 172 की ओर भी ध्यान दिलाया, जो पुलिस अधिकारियों को उन लोगों को हिरासत में लेने या वहां से हटाने का अधिकार देती है जो पुलिस के निर्देशों का विरोध करते हैं, मानने से इनकार करते हैं या उनकी अनदेखी करते हैं।

जॉन ने कहा कि धारा 172 एक नया प्रावधान है, जिसका पहले के 'दंड प्रक्रिया संहिता' (Code of Criminal Procedure) में कोई समकक्ष प्रावधान नहीं था। उन्होंने इस अधिकार के दायरे पर सवाल उठाया, खासकर तब जब किसी व्यक्ति को बिना कोई आपराधिक मामला दर्ज किए 24 घंटे तक हिरासत में रखा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि ये प्रावधान पुलिस को "मनमाना और पूरी तरह से असंवैधानिक अधिकार" देते हैं, जिससे वे किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से हिरासत में ले सकते हैं।

सीनियर एडवोकेट ने दिल्ली पुलिस अधिनियम (धारा 28, 36) के प्रावधानों का भी जिक्र किया, जो पुलिस को सभाओं और जुलूसों को नियंत्रित करने, सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच को सीमित करने और प्रदर्शनों पर शर्तें लगाने की अनुमति देते हैं।

इसका मकसद प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को परेशान करना है।

जॉन ने हिरासत की अवधि के दौरान औपचारिक रिकॉर्डिंग और न्यायिक निगरानी (ऱudicial धversight) न होने पर चिंता जताई। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब प्रदर्शनकारियों को उस जगह से बहुत दूर ले जाया जाता है जहां से उन्हें पकड़ा गया।

उन्होंने कहा कि हालांकि कानून में हिरासत की अधिकतम सीमा 24 घंटे तय है, लेकिन अगर उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के समय को औपचारिक रूप से रिकॉर्ड नहीं किया जाता, तो यह पता लगाने का कोई प्रभावी तरीका नहीं है कि किसी व्यक्ति को वास्तव में कितने समय तक हिरासत में रखा गया।

उन्होंने कहा,

"औपचारिक रिकॉर्डिंग तब शुरू होती है जब आपको हिरासत केंद्र (Detention Centre) में रखा जाता है, न कि उस समय जब आपको वहां ले जाया जा रहा होता है।"

जॉन ने प्रदर्शनकारियों को पास के पुलिस स्टेशनों के बजाय दूर-दराज के पुलिस स्टेशनों या स्टेडियमों में ले जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की यह प्रक्रिया ही लोगों के लिए अतिरिक्त परेशानी का कारण बन जाती है। एक गिरफ्तार व्यक्ति को आमतौर पर किसी पहचाने जा सकने वाले पुलिस स्टेशन ले जाया जाता है, लेकिन हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अज्ञात जगहों पर ले जाया जा सकता है और कहीं दूर छोड़ दिया जा सकता है। अगर महिला प्रदर्शनकारियों को देर रात या तड़के किसी सुनसान या दूर-दराज की जगह पर छोड़ दिया जाए तो उनके लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

उन्होंने कहा,

"इसका मकसद नागरिकों को, यानी विरोध प्रदर्शन कर रहे नागरिकों को परेशान करना है।"

उन्होंने आगे कहा कि गिरफ्तारी का कोई औपचारिक रिकॉर्ड न होना, वकीलों तक पहुंच न मिलना और न्यायिक निगरानी का अभाव, प्रदर्शनकारियों को मनमाने बर्ताव का शिकार बना देता है।

'कानून का ढांचा ही ऐसा है कि विरोध प्रदर्शन करना मुश्किल हो जाए'

जॉन ने दिल्ली पुलिस के उन स्टैंडिंग ऑर्डर्स (10/2018, 48/2022) की भी आलोचना की, जो प्रदर्शनों को नियंत्रित करते हैं। इन नियमों के तहत, तय जगहों पर विरोध प्रदर्शन करने के लिए पहले से आवेदन देना और पुलिस से अनुमति लेना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि इन दिशानिर्देशों के तहत प्रदर्शनकारियों की संख्या, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल, प्रदर्शन के समय और जुलूस के रास्तों पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गईं।

उनके बताए ढांचे के अनुसार, प्रदर्शन के लिए पहले से आवेदन देना होता है, और फिर पुलिस उपायुक्त (DCP) यह तय करते हैं कि अनुमति दी जाए या नहीं, और अगर दी जाए तो किन शर्तों पर।

जॉन ने सवाल उठाया कि जब विरोध करने का अधिकार पूरी तरह से पुलिस अधिकारियों की मर्जी पर निर्भर हो, तो कोई व्यक्ति वास्तव में इस अधिकार का इस्तेमाल कैसे कर सकता है?

इन पाबंदियों के असर के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा,

"कानून का ढांचा ही इस तरह से बनाया गया है कि विरोध प्रदर्शन करना जितना हो सके, उतना मुश्किल और कष्टदायक हो जाए।"

उन्होंने आगे कहा कि अधिकारी एक तरफ तो विरोध प्रदर्शन को मौलिक अधिकार मानने का दावा करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उन्होंने ऐसा ढांचा बना रखा है जो इस अधिकार का इस्तेमाल करना लगातार मुश्किल बनाता जा रहा है।

जॉन ने कहा,

"आप इस मौलिक अधिकार का मजाक उड़ा रहे हैं।"

पुलिस का नेम टैग न लगाना किसी भी तरह से जायज नहीं

जॉन ने इस बात पर भी चिंता जताई कि विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी कार्रवाई के दौरान पुलिस अधिकारी बिना किसी नेम टैग या पहचान के काम करते हैं।

उन्होंने कहा कि भले ही पुलिस के पक्ष को सच मान लिया जाए—जिसमें यह संभावना भी शामिल है कि भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा हो—फिर भी उनकी पहचान उजागर होनी चाहिए।

उन्होंने कहा,

"अगर कोई अपनी पहचान छिपा रहा है, तो यह अपने आप में एक गंभीर चेतावनी (रेड फ्लैग) है।"

जॉन का तर्क है कि पहचान न होने की स्थिति तब और भी चिंताजनक हो जाती है, जब हिरासत के दौरान मारपीट या दुर्व्यवहार के आरोप लगते हैं।

उन्होंने कहा कि असली मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि पुलिस के पास सार्वजनिक सभाओं को नियंत्रित करने की शक्ति है या नहीं, बल्कि यह है कि इस शक्ति का इस्तेमाल करते समय क्या पुलिस की कोई जवाबदेही तय होती है या नहीं।

सीनियर वकील ने कहा कि सबसे बड़ा मुद्दा नागरिकों का वह अधिकार है, जिसके तहत वे बिना किसी मनमानी गिरफ्तारी या ऐसे बर्ताव के डर के विरोध प्रदर्शन कर सकें, जो उन्हें आपराधिक कानून के तहत मिलने वाले सुरक्षा कवच से ही बाहर कर दे।

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