तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व लाभ से वंचित करने के प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

Update: 2021-10-02 06:15 GMT

सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 (''आपेक्षित प्रावधान'')की धारा 5(4) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है, जो केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली माताओं को 12 सप्ताह की अवधि के लिए मातृत्व लाभ का हकदार बनाती है।

जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता (हंसानंदिनी नंदूरी) के पास ''उचित कारण'' है और उसके बाद केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उक्त प्रावधान न केवल मातृत्व लाभ अधिनियम की योजना और उद्देश्य और विशेष रूप से 2017 के संशोधन के विपरीत हैं, बल्कि किशोर न्याय बालकों की देखभाल और संरक्षण अधिनियम, 2015(जेजे एक्ट) की मूल भावना और अर्थ के विपरीत भी हैं, चूंकि यह प्रावधान जेजे एक्ट के तहत परिकल्पित गोद लेने की प्रक्रिया और उसके तहत बनाए गए विनियमों को ध्यान में नहीं रखता है।

याचिका में कहा गया है कि,

''यहां तक कि जेजे एक्ट का सख्ती से पालन करते हुए अपनाई जाने वाली गोद लेने की प्रक्रिया के तहत यह आवश्यक है कि किसी भी अनाथ, परित्यक्त या छोड़े गए बच्चे को जेजे एक्ट के तहत बाल कल्याण समिति द्वारा ''गोद लेने के लिए कानूनी रूप से मुक्त'' घोषित किया जाना चाहिए, जिसके बाद गोद लेने की प्रक्रिया का पालन मातृत्व लाभ अधिनियम की धारा 5(4) में संदर्भित तीन महीने की अल्प अवधि में पूरा नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा, कानून के अनुसार दत्तक ग्रहण विनियमों में एक बच्चे को ''गोद लेने के लिए कानूनी रूप से मुक्त'' घोषित करने के लिए न्यूनतम दो महीने की अवधि की परिकल्पना की गई है। अनिवार्य रूप से, ऐसी प्रक्रियाएं और कार्यवाही देरी करने वाली होती हैं।''

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा है कि यह मान भी लिया जाए कि बच्चा अनाथ है, उसे जन्म के बाद ही छोड़ दिया गया है, फिर भी एक मां के लिए तीन महीने से कम उम्र के अनाथ, परित्यक्त या छोड़े गए बच्चे को गोद लेना लगभग असंभव है।

यह भी तर्क दिया गया है कि तीन महीने से अधिक उम्र के अनाथ, परित्यक्त या छोड़े गऐ बच्चे को गोद लेने वाली माताओं के लिए मातृत्व अवकाश के प्रावधान का अभाव, अधिकांश महिलाओं / माताओं को उन वैधानिक मातृत्व लाभों का आनंद लेने में सक्षम होने से रोकता है/अस्वीकार करता है,जो मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम 2017,गोद लेने वाली माताओं को प्रदान करने का इरादा रखता है।

याचिका में कहा गया है कि,

''गोद लेने वाले बच्चे की उम्र पर धारा 5(4) को सशर्त बनाकर, राज्य बड़े/किशोर अनाथ, परित्यक्त या आत्मसमर्पण करने वाले बच्चों की बजाय केवल नवजात बच्चों को गोद लेने को बढ़ावा दे रहा है। धारा 5(4) गोद लेने वाली माताओं के प्रति भेदभावपूर्ण करने वाली और मनमानी होने के अलावा तीन महीने से अधिक उम्र के अनाथ, परित्यक्त या छोड़े गए बच्चों के साथ भी मनमाने ढंग से भेदभाव करती है, जो कि मातृत्व लाभ अधिनियम के साथ-साथ जेजे एक्ट के उद्देश्य के लिए भी पूरी तरह से अनुचित है।''

यह कहने के लिए कि धारा 5(4) प्रभावहीन, निरर्थक और एक कागजी लाभ के अलावा कुछ नहीं है, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि गोद लेने के लिए उपलब्ध सभी अनाथ, परित्यक्त या छोड़े गए बच्चे नवजात नहीं होते हैं।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि,''धारा 5(4) न केवल गोद लेने वाली माताओं के साथ भेदभाव करती है, बल्कि यह प्रथम दृष्टया मनमानी, कृत्रिम और टालमटोल करने वाली भी है, और इसका उन उद्देश्यों से कोई लेना-देना नहीं है जिन्हें कानून हासिल करना चाहता है, जिसमें अन्य के साथ-साथ सभी कामकाजी महिलाओं और माताओं की समानता भी शामिल है। यह दिमाग के गैर-अनुप्रयोग से ग्रस्त है क्योंकि यह उस समय लागू कानून के तहत गोद लेने की प्रक्रिया को ध्यान में नहीं रखती है। इसके अलावा यह जैविक और दत्तक माताओं के बीच मौजूद भेदभाव को और गहरा करती है।''

नंदूरी ने अपनी याचिका में यह भी कहा कि केवल ''सशर्त'' मातृत्व लाभ प्रदान करके, जो गोद लेने की प्रक्रिया से संबंधित कानून के अनुसार लागू करना संभव नहीं है, धारा 5 (4) ने भारत के संविधान के तहत गोद लेने वाली माताओं को मिली स्वतंत्रता का भी उल्लंघन किया है।

केस का शीर्षक- हंसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ, डब्ल्यूपी (सी) 960/2021

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