चेक में साफ दिख रहे फेरबदल पर अलग सबूत की जरूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामले में दोषसिद्धि रद्द की

Update: 2026-07-25 09:24 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी चेक में किया गया फेरबदल पहली नजर में ही स्पष्ट दिखाई देता है, तो उसे साबित करने के लिए अलग से अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता नहीं होती।

इसी आधार पर अदालत ने परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत एक व्यक्ति की दोषसिद्धि और सजा रद्द की।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने कहा कि निचली अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से बदले गए चेक के बावजूद अतिरिक्त साक्ष्य की मांग कर कानूनन गलती की।

पीठ ने कहा,

"जब चेक में किया गया परिवर्तन पहली नजर में ही स्पष्ट दिखाई दे रहा हो तब निचली अदालतों को इस संबंध में किसी अतिरिक्त साक्ष्य पर जोर नहीं देना चाहिए था।"

मामला चेक बाउंस से जुड़े आपराधिक मुकदमे का था। शिकायतकर्ता का दावा था कि आरोपी ने 1 लाख 10 हजार रुपये का चेक जारी किया था। वर्ष 2014 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया था। इसके बाद कोप्पल की सेशन जज ने भी उसकी अपील खारिज की।

बाद में कर्नाटक हाईकोर्ट ने केवल मुआवजे की राशि में संशोधन करते हुए उसे 1 लाख 15 हजार रुपये से घटाकर 1 लाख 10 हजार रुपये कर दिया, लेकिन यह दलील स्वीकार नहीं की कि चेक में फेरबदल किया गया था। हाईकोर्ट के आदेश के बाद आरोपी संशोधित राशि का भुगतान भी कर चुका था।

सुप्रीम कोर्ट ने मूल चेक का अवलोकन करने के बाद पाया कि उसमें स्पष्ट रूप से छेड़छाड़ की गई।

अदालत ने कहा कि चेक पर टेन थाउज़ेंड ओनली से पहले वन लाख शब्द जोड़े गए और अंकों वाले खाने में 10,000 से पहले 1 अंक भी जोड़ा गया था, जिससे राशि 10 हजार रुपये से बदलकर 1 लाख 10 हजार रुपये की गई।

अदालत ने कहा कि चेक में यह भौतिक फेरबदल स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था, इसलिए इसे साबित करने के लिए किसी अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता नहीं थी। ऐसे में आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि रद्द की। साथ ही अदालत ने शिकायतकर्ता को निर्देश दिया कि हाईकोर्ट के आदेश के तहत प्राप्त राशि चार सप्ताह के भीतर आरोपी को वापस लौटाई जाए। यदि मामले में जमा कोई अन्य राशि संबंधित अदालत के पास शेष है, तो आरोपी को उस पर ब्याज सहित वापस लेने के लिए आवेदन करने की भी स्वतंत्रता दी गई।

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