2027 की जनगणना के संबंध में अपनाई जा रही स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर को कोर्ट के सामने रखे केंद्र: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह 2027 की जनगणना के संबंध में अपनाई जा रही स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को कोर्ट के सामने रखे।
जनगणना के तहत जाति संबंधी डेटा इकट्ठा करने में खामियों का आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने शुरू में कहा कि "सरकारी अधिकारी सिर्फ़ फ़ॉर्म के आधार पर जानकारी इकट्ठा नहीं करते हैं"। लेकिन बाद में जज ने कोर्ट में मौजूद सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कोर्ट के सामने एक नोट रखने को कहा।
याचिका पर कोई नोटिस जारी किए बिना CJI की बेंच (जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं) ने SG मेहता को याचिकाकर्ता की चिंता से अवगत कराया कि जाति संबंधी डेटा इकट्ठा करने के लिए केवल जानकारी के स्व-प्रकटीकरण (सेल्फ-डिक्लेरेशन) के लिए एक आवेदन फ़ॉर्म दिया जा रहा है।
CJI ने SG से यह स्पष्ट करने को कहा कि किसी व्यक्ति के लिए खुद को OBC, ST आदि घोषित करने की प्रक्रिया क्या है; उदाहरण के लिए, क्या उन्हें जाति प्रमाण पत्र संलग्न करना आवश्यक है, ऐसा प्रमाण पत्र कौन जारी करेगा, और ऐसे प्रमाण पत्र की प्रमाणिकता की जांच कैसे की जाएगी।
याचिकाकर्ता को याचिका की कॉपी सॉलिसिटर जनरल को सौंपने का निर्देश देते हुए CJI ने नकली जाति प्रमाण पत्रों के मुद्दे पर भी जोर दिया और कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए सत्यापन महत्वपूर्ण है कि वास्तविक लोगों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट मुक्ता गुप्ता ने दोहराया कि कोर्ट ने अधिकारियों से याचिकाकर्ता के कानूनी नोटिस और अभ्यावेदन (रिप्रेजेंटेशन) पर विचार करने को कहा। सीनियर वकील ने इस बात पर जोर दिया कि अधिकारी केवल एक फ़ॉर्म/प्रश्नावली के आधार पर जाति संबंधी डेटा इकट्ठा कर रहे हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा,
"आप जो चाहें दे सकते हैं, आप जो चाहें भर सकते हैं।"
गुप्ता ने जनगणना डेटा में गलत जानकारी आने के खतरों पर भी प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाएं जनगणना डेटा पर आधारित होती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ता की उस RTI का जवाब नहीं दिया जिसमें उस सामग्री और "सत्यापन योग्य डेटा" के बारे में जानकारी मांगी गई थी जिसे अधिकारी इस संबंध में देखेंगे।
गुप्ता ने तर्क दिया,
"उनका कहना है कि उन्होंने एक विस्तृत प्रश्नावली तैयार की। वे इस जनगणना पर 13,000 करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं। इसी जनगणना के आधार पर कल्याणकारी योजनाएं बनाई जाएंगी। उसी के अनुसार बजट आवंटित किया जाएगा। और यह अगले 10-15 वर्षों तक मान्य रहेगी। देखिए, एक छोटी सी गलती का क्या नतीजा हो सकता है, जिससे पूरी जनगणना का डेटा ही बेकार हो सकता है। ऐसी गलती का क्या मतलब है?"
सीनियर वकील ने कहा कि जब अधिकारी जनगणना के लिए जाते हैं, तो वे केवल इस बात पर निर्भर नहीं रह सकते कि कोई व्यक्ति अपनी जाति की स्थिति के बारे में क्या बताना चाहता है।
उन्होंने कहा,
"उन्हें दिशानिर्देश दिखाने होंगे कि जाति डेटा दर्ज करने का आधार क्या होना चाहिए। कल को कोई दावा कर सकता है कि जाति जनगणना में मैं..."
आकाश गोयल द्वारा दायर जनहित याचिका में प्रतिवादी अधिकारियों से यह बताने का निर्देश देने की मांग की गई कि सरकार द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्र के विवरण को दर्ज करने और प्रमाणित करने के संबंध में क्या निर्णय लिया गया।
इसमें 14.08.2026 की अधिसूचना S.O.4505(E) के आइटम 10 के तहत रिकॉर्डिंग और सत्यापन को नियंत्रित करने वाली कार्यप्रणाली और सुरक्षा उपायों का खुलासा करने की भी मांग की गई, जिसमें लागू घरेलू अनुसूची और संबंधित निर्देश शामिल हैं। साथ ही व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता बनाए रखना भी जरूरी है। याचिकाकर्ता सरकार द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्रों के पहचान विवरण को दर्ज करने और उनकी प्रमाणिकता की जांच करने के लिए एक तंत्र की भी मांग करता है।
यह प्रार्थना की गई कि जनगणना 2027 प्रश्नावली के तहत एकत्र किए गए जाति डेटा को आरक्षण नीतियों को बनाने या संशोधित करने, या कल्याणकारी संसाधनों के जाति-आधारित आवंटन को निर्धारित करने के एकमात्र आधार के रूप में तब तक इस्तेमाल न किया जाए, जब तक कि सरकार द्वारा जारी जाति प्रमाण पत्रों की प्रमाणिकता की जांच करने के लिए एक पारदर्शी और सत्यापन योग्य प्रोटोकॉल लागू न किया जाए और उस प्रोटोकॉल को हलफनामे के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश न किया जाए।
Case Title : AAKASH GOEL Versus UNION OF INDIA AND ANR.