सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व ज़िला जज की मामले की जल्द सुनवाई की मांग को ठुकरा दिया और याद दिलाया कि संविधान हर व्यक्ति को समान मानता है।

पूर्व न्यायिक अधिकारी ने नौकरी से बर्खास्तगी के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित अपनी रिट याचिका के जल्द निपटारे के लिए एक और रिट याचिका दायर की थी। इसे खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि संविधान किसी को भी प्राथमिकता देने की इजाज़त नहीं देता।

संक्षेप में मामला

यह रिट याचिका राकेश कुमार नैन ने दायर की, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत मामलों को देखने वाले विशेष जज के तौर पर तैनात थे। भ्रष्टाचार के आरोपों में न्यायिक कदाचार का दोषी पाए जाने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने नैन को बर्खास्त किया था। उनकी सेवाएँ तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी गईं। इसके ख़िलाफ़ उन्होंने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी, जिस पर अभी फ़ैसला होना बाकी है।

निपटारे में देरी से परेशान होकर उन्होंने एक रिट याचिका दायर की, जो जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने आई। शुरुआत में ही बेंच ने उनकी अर्ज़ी पर विचार करने से इनकार किया और उन्हें हाईकोर्ट के सामने जल्द सुनवाई के लिए अपनी अर्ज़ी पर ज़ोर देने की छूट दी।

जस्टिस बागची ने कहा कि जब तक देरी के बारे में कोई बहुत गंभीर बात न कही गई हो, तब तक याचिकाकर्ता के प्रति "गलत सहानुभूति" नहीं दिखाई जा सकती, सिर्फ़ इसलिए कि वह पूर्व न्यायिक अधिकारी हैं।

उन्होंने कहा,

"हम इस तरह की याचिकाओं को पसंद नहीं करते, क्योंकि निपटारे में बहुत ज़्यादा देरी की वजह से दिखाई गई गलत सहानुभूति, उसी हाई कोर्ट में फ़ैसले के इंतज़ार में कतार में खड़े बिना प्रतिनिधित्व वाले मुक़दमेबाज़ों के समान अधिकारों का उल्लंघन कर सकती है। मामले की प्रकृति को देखते हुए हम याचिकाकर्ता को छूट देते हैं कि वह संबंधित हाईकोर्ट के सामने जल्द सुनवाई के लिए इस अर्ज़ी पर ज़ोर दे।"

जस्टिस बागची ने आगे कहा कि जहां तक मौजूदा बेंच का सवाल है, कोर्ट "मौकापरस्त दखल" को रोकने की हर मुमकिन कोशिश करेगा। जब याचिकाकर्ता के वकील ने यह बात कहने की कोशिश की कि आम मुक़दमेबाज़ के विपरीत यह याचिका एक पूर्व न्यायिक अधिकारी ने दायर की है, तो जस्टिस बागची ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और इस तर्क को संविधान के बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ बताया।

जस्टिस बागची ने कहा,

"आप जो बात कह रहे हैं, वह संविधान के उस बुनियादी विचार के ख़िलाफ़ है, जिसके तहत हर नागरिक को, चाहे उसका पद या ओहदा कुछ भी हो, न्याय पाने का अधिकार है। कानूनी समाधान के लिए न्याय तक पहुंचने का अधिकार बस कंडक्टर और राज्य के प्रधान सचिव, दोनों को समान रूप से है। इसलिए संवैधानिक समानता के इस दायरे में हम व्यक्तिगत आधार पर कोई दखल नहीं देंगे। हमारे सामने आने वाली हर तेज़ी से निपटारे की मांग वाली याचिका पर जब तक हमें यह यकीन न हो जाए कि हाई कोर्ट ने कोई गंभीर उल्लंघन किया है जो अनुचित या बेईमानीपूर्ण है..."

Case Title : RAKESH KUMAR NAIN v STATE OF UTTAR PRADESH AND ORS.

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: