सुप्रीम कोर्ट ने 27 जनवरी को वादी की उस चुनौती को खारिज कर दिया, जिसमें कोर्ट के रजिस्ट्रार ने प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) को हिंडनबर्ग रिसर्च-अदानी ग्रुप मामले में अपनी जांच रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश देने के लिए उसके आवेदन को रजिस्टर्ड करने से इनकार कर दिया था।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ ने एडवोकेट विशाल तिवारी द्वारा दायर विविध आवेदन खारिज करते हुए आदेश पारित किया।

संक्षेप में मामला

3 जनवरी, 2024 को अदानी ग्रुप की कंपनियों द्वारा स्टॉक मूल्य हेरफेर के संबंध में हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों की SIT/SBI जांच का आदेश देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने SEBI को "अधिमानतः" तीन महीने के भीतर चल रही जांच पूरी करने का निर्देश दिया।

कुछ महीने बाद जून में एडवोकेट तिवारी, जो अडानी-हिंडेनबर्ग मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक थे, उन्होंने जनवरी के फैसले में उल्लिखित समयसीमा के अनुसार जांच पूरी करने के लिए SEBI को निर्देश देने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया।

5 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार न्यायिक (सूचीबद्ध) ने यह कहते हुए आवेदन रजिस्टर्ड करने से इनकार कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 3 जनवरी के फैसले के अनुसार SEBI के लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं की है। कोर्ट ने केवल यह कहा है कि जांच "अधिमानतः" 3 महीने के भीतर पूरी की जानी चाहिए।

तिवारी द्वारा मांगी गई अन्य राहत (कि संघ और SEBI को शेयर बाजार विनियमन को मजबूत करने पर विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों की स्वीकृति पर स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए) के बारे में रजिस्ट्रार ने कहा कि कोर्ट ने ऐसी स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश नहीं दिया। रजिस्ट्रार ने यह भी उल्लेख किया कि जनवरी के फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी गई।

रजिस्ट्रार द्वारा आवेदन प्राप्त करने से इनकार करने को चुनौती देते हुए तिवारी ने तत्काल आवेदन दायर किया। उन्होंने हिंडनबर्ग रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें आरोप लगाया गया कि SEBI अध्यक्ष और उनके पति ने अडानी कंपनियों से जुड़े ऑफशोर फंड में निवेश किया। यह तर्क देते हुए कि रिपोर्ट ने "संदेह का माहौल" पैदा किया, तिवारी ने कहा कि "SEBI के लिए लंबित जांच को समाप्त करना और जांच के निष्कर्ष की घोषणा करना अनिवार्य हो गया।"

उन्होंने तर्क दिया कि निर्णय में "अधिमानतः" शब्द के उपयोग मात्र का अर्थ यह नहीं है कि न्यायालय ने कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया है।

आवेदन में कहा गया,

""अधिमानतः"" शब्द का उपयोग करने से यह नहीं समझा जा सकता कि कोई समयसीमा तय नहीं की गई। जब आदेश में विशेष रूप से तीन महीने का उल्लेख किया गया तो यह विवेकपूर्ण रूप से समझने के लिए पर्याप्त है कि लंबित जांच को पूरा करने के लिए एक निश्चित समय अवधि निर्धारित की गई।"

केस टाइटल: विशाल तिवारी बनाम भारत संघ और अन्य, एमए 2346/2024 डब्ल्यू.पी.(सी) नंबर 162/2023 में

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