एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य': सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' माना है, जिस पर रिट क्षेत्राधिकार लागू होता है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट का फ़ैसला पलट दिया, जिसमें एयर फ़ोर्स ग्रुप इंश्योरेंस सोसाइटी (सोसाइटी) को 'राज्य' मानने से इनकार किया गया। बेंच ने कहा कि चूंकि सोसाइटी एक सार्वजनिक कार्य करती है, जो भारतीय वायु सेना के सदस्यों के प्रति राज्य के दायित्वों से गहराई से जुड़ा है, इसलिए यह 'राज्य' की श्रेणी में आती है।
कोर्ट ने कहा,
"हमारा सुविचारित मत है कि AFGIS वास्तव में एक सार्वजनिक कर्तव्य निभाती है। सशस्त्र बलों के कर्मियों की सुरक्षा और कल्याण सरकार का एक मुख्य कार्य है। सशस्त्र बलों की भूमिका सीधे तौर पर राष्ट्र की संप्रभुता और सुरक्षा से जुड़ी है। इसकी रक्षा के लिए बलों के सदस्यों को नियमों के एक सख़्त सेट का पालन करना, उनका सम्मान करना और उन्हें बनाए रखना होता है; उनका आचरण निर्विवाद होना चाहिए। कई बार उन्हें सबसे गंभीर और विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार, बीमा कवरेज प्रदान करना सार्वजनिक कार्य है, क्योंकि यह उस सामूहिक दायित्व को पूरा करता है, जो राज्य का एक निश्चित सार्वजनिक वर्ग के प्रति है, जिनकी सेवा अनिवार्य है।"
कोर्ट ने कई ऐसे कारकों का ज़िक्र किया, जो सरकार की गहरी संलिप्तता को दर्शाते हैं, जैसे कि सोसाइटी की स्थापना और उसके प्रतिनियुक्ति नियम भारत के राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत हैं। इसके वित्तीय कार्यों की रिपोर्ट समय-समय पर वायु सेना के सीनियर अधिकारियों को दी जाती है। इसके ट्रस्टी बोर्ड तथा प्रबंध समिति दोनों में पूरी तरह से सेवारत वायु सेना के अधिकारी शामिल होते हैं, जिन्हें निश्चित कार्यकाल के लिए प्रतिनियुक्त किया जाता है। इन सभी बातों को एक साथ देखते हुए कोर्ट ने पाया कि ये विशेषताएं स्पष्ट रूप से सोसाइटी को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य की एक संस्था' के दायरे में लाती हैं।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब AFGIS के ट्रस्टी बोर्ड ने दिसंबर, 2016 में शुरू में यह प्रस्ताव पारित किया कि कर्मचारियों के वेतनमान को छठे केंद्रीय वेतन आयोग के अनुसार संशोधित किया जाएगा। हालांकि, 13 फरवरी 2017 को हुई एक बाद की बैठक में बोर्ड ने अपने पिछले फ़ैसले को पलट दिया और यह प्रस्ताव पारित किया कि सोसाइटी के वेतन ढांचे को केंद्र सरकार के वेतनमानों से अलग कर दिया जाएगा।
22 मई, 2017 को जारी एक नोटिस के माध्यम से कर्मचारियों से संशोधित सेवा शर्तों को स्वीकार करने के लिए कहा गया। इस फ़ैसले को चुनौती देते हुए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। हाईकोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए यह माना कि AFGIS एक अपने आप में पूरी (Self-Contained) कल्याण और बीमा योजना है, जिसे सदस्यों के योगदान से फंड मिलता है। इसलिए यह अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" (State) नहीं है। नतीजतन, कोर्ट ने फैसला दिया कि रिट याचिकाएं सुनवाई योग्य नहीं हैं, जिसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
विवादित फैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में उन पिछले फैसलों का हवाला दिया गया, जिन्होंने अनुच्छेद 12 के तहत "राज्य" के दायरे को परिभाषित किया था। फैसले में यह कहा गया कि कोर्ट को सभी प्रासंगिक कारकों के मिले-जुले प्रभाव का आकलन करना चाहिए ताकि यह तय किया जा सके कि कोई संस्था वित्तीय, कार्यात्मक और प्रशासनिक रूप से "राज्य" के नियंत्रण में है या नहीं।
कोर्ट ने कहा,
"जिस कसौटी पर खरा उतरना ज़रूरी था, वह संस्था के कार्यों की प्रकृति, उसकी गतिविधियों के स्वरूप और उस पर सरकारी नियंत्रण के स्तर से संबंधित थी। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि जब भी यह सवाल उठता है तो जांच का दायरा या विस्तार केवल संस्था के स्वामित्व या उसकी उत्पत्ति तक ही सीमित न रहे, बल्कि इसके बजाय वह जवाबदेही और व्यावहारिक शासन को बढ़ावा देने वाले 'कानून के शासन' (Rule of Law) से भी निर्देशित हो।"
'सार्वजनिक कार्य' (Public Function) की कसौटी के अलावा, कोर्ट ने संस्था पर 'गहरे और व्यापक नियंत्रण' (Deep and Pervasive Control) के साथ-साथ 'प्रशासनिक नियंत्रण' की भी जांच की, और यह टिप्पणी की:
"भारत के माननीय राष्ट्रपति ने AFGIS की स्थापना को मंज़ूरी दी थी। साथ ही इसके लिए बनाए गए 'डेपुटेशन नियमों' (Deputation Rules) को भी विशेष रूप से अनुमोदित किया था। AFGIS के 'प्रधान निदेशक' (Principal Director) को हर महीने 'सहायक वायु सेना प्रमुख' (Assistant Chief of Air Staff) को AFGIS के नकदी प्रवाह (Cash Flow) के बारे में जानकारी देनी होती है; यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि IAF का एक प्रमुख सदस्य AFGIS की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखे। IAF में सेवा के दौरान AFGIS की सदस्यता लेना और उससे जुड़ी कटौतियां (Deductions) अनिवार्य हैं; इसका अर्थ यह है कि इस मामले में किसी भी अधिकारी के पास अपनी मर्ज़ी से चुनने का कोई विकल्प नहीं होता, बल्कि यह नियोक्ता (IAF) की ओर से जारी किया गया एक अनिवार्य आदेश होता है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"जब संस्था पर 'प्रशासनिक नियंत्रण' के पहलू की जांच की जाती है तो यह पाया जाता है कि 'बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज़' और 'प्रबंध समिति' (Managing Committee) के सभी सदस्य IAF के ही सेवारत अधिकारी हैं, जिन्हें एक निश्चित अवधि के लिए AFGIS में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर भेजा गया है। संक्षेप में कहें तो, इस संस्था का पूरा प्रशासन पूरी तरह से सरकारी कर्मचारियों के हाथों में ही है, भले ही यह संस्था कागज़ों में एक 'निजी' या 'अपने आप में पूरी' (Self-contained) संस्था के रूप में जानी जाती हो।"
उपर्युक्त बातों के आधार पर न्यायालय ने अपील स्वीकार कर ली और AFGIS को अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' माना। साथ ही हाईकोर्ट से यह अनुरोध किया कि वह अपीलकर्ताओं की रिट याचिका पर शीघ्रता से निर्णय ले। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि यह याचिका वर्ष 2017 में दायर की गई।
Cause Title: RAVI KHOKHAR & ORS Versus UNION OF INDIA & ORS.