भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी: कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य को नौ जिलों में अधिग्रहित ज़मीन 31 मार्च तक BSF को सौंपने का निर्देश दिया

Update: 2026-01-27 14:00 GMT

कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार (27 जनवरी) को पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह भारत-बांग्लादेश सीमा (IB) के पास नौ जिलों में अधिग्रहित ज़मीन 31 मार्च तक सीमा सुरक्षा बल (BSF) को बाड़बंदी के मकसद से सौंप दे।

ये निर्देश चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की डिवीजन बेंच ने एक पूर्व डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ द्वारा दायर जनहित याचिका पर विचार करते हुए जारी किए, जिसमें पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा के बड़े हिस्से पर बाड़बंदी न होने की बात कही गई।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 4,096.70 किमी लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा में से अकेले पश्चिम बंगाल में 2,216.70 किमी है, जिससे यह बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा वाला राज्य बन गया। 2016 से बार-बार कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बावजूद, सीमा का लगभग 26% हिस्सा बिना बाड़ के है, जिससे कथित तौर पर सीमा पार घुसपैठ, नशीले पदार्थों की तस्करी, मवेशियों और सोने की तस्करी और नकली भारतीय मुद्रा का प्रचलन आसान हो रहा है।

कथित सीमा पार घुसपैठ, जिसमें नशीले पदार्थों की तस्करी आदि शामिल है, उससे संबंधित डेटा कोर्ट के सामने पेश किया गया, जो संसदीय जवाबों से लिया गया।

याचिकाकर्ता ने ज़ोर दिया कि सीमा पर बाड़ लगाना रक्षा, संप्रभुता और राष्ट्रीय अखंडता का मामला है। कोर्ट से आग्रह किया कि ज़मीन का अधिग्रहण और BSF को सौंपने की प्रक्रिया तेज़ी से पूरी की जाए।

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अशोक कुमार चक्रवर्ती ने कहा कि भूमि अधिग्रहण सूची II की एंट्री 23 के तहत राज्य का विषय है, लेकिन एक बार मुआवज़ा दिए जाने और कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बाद राज्य संवैधानिक रूप से कब्ज़ा सौंपने के लिए बाध्य है।

उन्होंने बताया कि ज़रूरी 235 किमी हिस्से में से केंद्रीय गृह मंत्रालय से बार-बार बातचीत के बावजूद, जिसमें 20 जून, 2025 को केंद्रीय गृह सचिव द्वारा पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को लिखा गया एक पत्र भी शामिल है, BSF को केवल लगभग 71 किमी ज़मीन ही सौंपी गई है।

ASG ने तर्क दिया,

“ज़रूरी 235km ज़मीन में से सिर्फ़ 71km ज़मीन ही BSF को सौंपी गई... यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो 2016 से चल रही है... इस प्रक्रिया को बार-बार कैबिनेट की मंज़ूरी मिली है... क्या एस्टोपेल और वैध अपेक्षा का सिद्धांत ऐसे मामले में लागू होगा, खासकर जहां देश की संप्रभुता का सवाल हो?”

ASG ने आगे संविधान के अनुच्छेद 256, 257, और 355 को एक साथ पढ़ने पर ज़ोर दिया। साथ ही तर्क दिया कि जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी आक्रमण से सुरक्षा का मामला हो, वहां केंद्र सरकार राज्यों को बाध्यकारी निर्देश जारी करने के लिए सशक्त है।

उन्होंने राज्य के इस स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया कि देरी चुनावी सूचियों के चल रहे विशेष गहन संशोधन (SIR) और आने वाले विधानसभा चुनावों के कारण हुई। साथ ही तर्क दिया कि कोई भी काम सीमा सुरक्षा उपायों को रोकने का कारण नहीं बन सकता।

उन्होंने आगे कहा,

“इन 3 अनुच्छेदों को एक साथ पढ़ने से हमें कदम उठाने की ज़रूरत है। और हमने कदम उठाए हैं। अब (राज्य द्वारा) आगे कब्ज़ा सौंपने की ज़रूरत है। क्या यह कोई स्पष्टीकरण है कि SIR चल रहा है या चुनाव होने वाले हैं और सभी लोग चुनाव ड्यूटी में लगे हुए हैं? SIR उन लोगों से संबंधित है, जो मतदाता हैं, कुछ BLO की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए, सरकारी अधिकारियों का SIR से कोई लेना-देना नहीं है। SIR कोई आधार नहीं है... कि पूरी सरकारी मशीनरी SIR में लगी हुई? चुनाव का इससे कोई लेना-देना नहीं है... यह पूरी तरह से सीमावर्ती क्षेत्र और वहां रहने वाले आस-पास के नागरिकों की सुरक्षा और बचाव का मामला है, ताकि अपराध से बचा जा सके।”

सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने पूछा कि राइट टू फेयर कंपनसेशन एंड ट्रांसपेरेंसी इन लैंड एक्विजिशन, रिहैबिलिटेशन एंड रिसेटलमेंट एक्ट, 2013 की धारा 40 को मौजूदा मामले में क्यों लागू नहीं किया गया।

कोर्ट ने पूछा,

"हम यह समझने में नाकाम हैं कि जब इतनी हाई लेवल मीटिंग हो रही थीं और वे (राज्य) अपनी पॉलिसी पर ज़ोर दे रहे थे, जो पहली नज़र में लागू नहीं होती, तो उन्हें (केंद्र द्वारा) इस बारे में क्यों नहीं बताया गया और धारा 40 को लागू करने पर ज़ोर क्यों नहीं दिया गया?"

बता दें, धारा 40 कुछ मामलों में ज़मीन अधिग्रहण के लिए इमरजेंसी की स्थिति में विशेष शक्तियों से संबंधित है।

केंद्र ने कहा कि गृह सचिव और अंडर सेक्रेटरी द्वारा लिखे गए सभी पत्रों को एक्ट की धारा 40 के तहत जारी किया गया माना जा सकता है।

दूसरी ओर, राज्य ने तर्क दिया कि धारा 40 नियमों का एक अपवाद है और इसे केवल इमरजेंसी की स्थिति में ही लागू किया जा सकता है।

राज्य के वकील ने कहा,

"नियम यह है कि पहले सूचित किया जाए, उसके बाद प्रकाशित किया जाए, ज़मीन का अधिग्रहण किया जाए, मुआवज़ा दिया जाए और अगर कोई शिकायत है तो ज़मीन मालिक आवेदन कर सकता है... यह नियम है। धारा 40 अपवाद है। इसे इमरजेंसी की स्थिति में लागू किया जा सकता है... पहले उचित सरकार का यह फैसला होना चाहिए कि हम इस विशेष इमरजेंसी प्रावधान को लागू करेंगे। तभी एक्ट की योजना को बाईपास किया जा सकता है..... हम सीधे खरीद रहे हैं, अधिग्रहण नहीं कर रहे हैं। इसलिए धारा 40, जो अधिग्रहण की कार्यवाही को बाईपास करने के लिए है, लागू नहीं होती है।"

राज्य ने यह भी कहा कि डायरेक्ट परचेज पॉलिसी (DPP) मुकदमों और असमान मुआवज़े के अवार्ड को कम करने के लिए बनाई गई।

बेंच ने DPP पर राज्य की निर्भरता पर यह देखते हुए चिंता व्यक्त की कि यह पॉलिसी रुके हुए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए डिज़ाइन की गई थी, न कि राष्ट्रीय रक्षा के मामलों के लिए।

बेंच ने सवाल किया,

"आपकी पॉलिसी का मकसद बहुत अलग है... इसे इसलिए बनाया गया, क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स नहीं हो रहे थे, पुलों का निर्माण पूरा नहीं हो रहा था... आपने इसे उस ज़मीन पर कैसे लागू किया जो राष्ट्रीय हित के लिए ज़रूरी है... यह सच में परेशान करने वाला है... पॉलिसी में स्पष्ट रूप से महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के मकसद का ज़िक्र है... जबकि हम राष्ट्रीय हित को लेकर चिंतित हैं... आपकी पॉलिसी यहां कैसे लागू होती है?"

राज्य ने यह भी तर्क दिया कि कोर्ट किसी खास तरीके से अधिग्रहण का निर्देश देने वाला मैंडमस जारी नहीं कर सकते, इसके लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम सिटी एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (2010 SCC ऑनलाइन All 1124) मामले के फैसले का हवाला दिया गया।

सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने इस मुद्दे को तीन बड़ी कैटेगरी में बांटा, जिसमें शामिल हैं-

(i) वह ज़मीन जो पहले ही अधिग्रहित/खरीदी जा चुकी है और जिसके लिए भुगतान किया जा चुका है, लेकिन उसका केवल कुछ हिस्सा ही BSF को सौंपा गया।

(ii) वह ज़मीन जहां डायरेक्ट परचेज पॉलिसी के तहत अधिग्रहण या खरीद की प्रक्रिया शुरू हो गई।

(iii) वह ज़मीन जहां अभी तक कोई अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।

पहली कैटेगरी के लिए कोर्ट ने कहा कि और देरी का कोई औचित्य नहीं है। राज्य को 31 मार्च 2026 को या उससे पहले BSF को कब्ज़ा सौंपने का यह स्पष्ट करते हुए निर्देश दिया कि SIR या चुनाव ड्यूटी को बाधा नहीं माना जा सकता।

दूसरी कैटेगरी के लिए, राज्य को एक एक्शन टेकन रिपोर्ट दाखिल करने और 31 मार्च 2026 तक प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया।

तीसरी कैटेगरी के लिए, बेंच ने कहा कि यह मुद्दा 2013 के एक्ट की धारा 40 को लागू करने की संभावना और व्यवहार्यता पर निर्भर करेगा, जिसकी जांच आगे की सुनवाई के बाद की जाएगी।

इन निर्देशों के साथ कोर्ट ने मामले को अप्रैल 2026 में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

Case Title: Lt. Gen. Dr. Subrata Saha v Union of Indian and Ors.

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