अगर पहली शादी अभी भी कायम है तो महिला अपने दूसरे पति के परिवार के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत मामला दर्ज नहीं करा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक व्यक्ति के परिवार के सदस्यों और एक दोस्त के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द करते हुए कहा कि अगर किसी महिला की पहली शादी अभी भी कायम है, तो उसके दूसरे पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत FIR कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकती। [2026 LiveLaw (Bom) 303]
सिंगल-जज जस्टिस रंजीतसिंह भोंसले ने कहा कि दूसरे पति के परिवार के सदस्यों को IPC की धारा 498A में बताए गए 'रिश्तेदारों' की परिभाषा के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
जस्टिस भोंसले ने 10 जून के आदेश में कहा,
"दूसरे पति और उसके परिवार के सदस्यों (यानी मौजूदा याचिकाकर्ताओं और दोस्त) के खिलाफ IPC की धारा 498-A के तहत दर्ज FIR के संबंध में यह स्पष्ट है कि धारा 498-A के प्रावधान मौजूदा याचिकाकर्ताओं पर लागू नहीं किए जा सकते, क्योंकि FIR की तारीख पर शिकायतकर्ता महिला की किसी अन्य पुरुष के साथ पहली शादी कायम थी। इसलिए दूसरे पति को उसका पति और उसके परिवार को पति के रिश्तेदार नहीं कहा जा सकता। मेरी राय में भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A का इस्तेमाल पूरी तरह से गलत और कानूनी रूप से अमान्य है।"
खास बात यह है कि एक अलग आदेश में हाईकोर्ट ने इसी मामले में शिकायतकर्ता के खिलाफ ससुराल वालों द्वारा जबरन वसूली (extortion) के आरोपों में दर्ज एक अलग FIR को रद्द करने से इनकार किया, क्योंकि उसने पहली शादी कायम रहने के बावजूद अपने दूसरे पति से 25 लाख रुपये के गुजारे-भत्ते (alimony) की मांग की।
इस आदेश में जस्टिस भोंसले ने गौर किया कि शिकायतकर्ता पत्नी ने सितंबर 2015 में याचिकाकर्ता के बेटे के साथ दूसरी शादी की, जबकि उसकी पहली शादी अभी भी कायम है।
जज ने आगे कहा कि दूसरा पति (याचिकाकर्ताओं का बेटा और भाई) ऑस्ट्रेलिया में काम करता था और हर महीने याचिकाकर्ता के बैंक खाते में पैसे भेजता था। साथ ही पुणे में रहने वाली उसकी माँ (याचिकाकर्ता) भी उसे तोहफे और पैसे देती रहती थीं, जबकि दूसरी शादी के बाद वह अपने ससुराल में नहीं रहती थी। जज ने गौर किया कि जब पत्नी अपने ससुराल वालों या पति को बताए बिना दुबई गई और जब उससे इस बारे में पूछा गया तो उसने ससुराल वालों से झगड़ा किया और उनके घर के बाहर हंगामा किया। वह ऑस्ट्रेलिया में अपने पति के ऑफिस भी गई और वहाँ भी बेवजह हंगामा किया।
जज ने देखा कि शिकायत करने वाली पत्नी ने याचिकाकर्ताओं पर आरोप लगाया कि उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के लिए वीज़ा अप्लाई करने में उसकी मदद नहीं की और उनसे फ़्लैट और दहेज की मांग की। पत्नी ने अपने पति के दोस्त पर भी आरोप लगाया कि उसने उसे पति की दहेज की गैर-कानूनी मांगों को मानने के लिए कहा था।
जस्टिस भोंसले ने 10 जून के आदेश में कहा,
"मेरी राय में कल्याणकारी या फ़ायदेमंद कानून का इस्तेमाल लोगों को डराने और परेशान करने के लिए हथियार के तौर पर नहीं किया जा सकता, जैसा कि इस मामले में शिकायत करने वाली पत्नी ने किया है। कानून का मकसद या इरादा यह नहीं है। कल्याणकारी कानून असली मामलों के लिए होते हैं और इनका गलत इस्तेमाल बदला लेने, हिसाब बराबर करने या निजी दुश्मनी निकालने के लिए नहीं किया जा सकता।"
भले ही धारा 498-A एक फ़ायदेमंद कानून है, लेकिन जज ने ज़ोर दिया कि इस धारा की व्याख्या आम तौर पर उस धारा के मकसद के अनुरूप और उससे मेल खाने वाली होनी चाहिए।
जज ने टिप्पणी की,
"इस मामले में शिकायत करने वाली पत्नी ने जानकारी होने के बावजूद अपनी पहली शादी के कायम रहने की बात छिपाई, एक मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर अपनी वैवाहिक स्थिति के बारे में गलत जानकारी दी। साथ ही दोनों शादियों के संबंध में कानूनी कार्यवाही शुरू की। ऐसे पक्ष/मुकदमेबाज़ के आचरण पर विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि इसमें साफ़ तौर पर बुरी नीयत और बेईमानी झलकती है। अदालतें तब चुपचाप तमाशबीन बनकर नहीं रह सकतीं और न ही इसकी इजाज़त दे सकती हैं, जब किसी कल्याणकारी कानून का इस्तेमाल देश के नागरिकों को परेशान करने और धमकाने के लिए किया जाए। उसका आचरण साफ़ तौर पर IPC की धारा 498A के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल है, जो एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है। इसका इस्तेमाल याचिकाकर्ताओं और पति के खिलाफ़ एक हथियार के तौर पर किया गया।"
इसके अलावा, इस बात पर भी ध्यान दिया गया कि याचिकाकर्ता के चाचा और उसके परिवार के सदस्यों ने दूसरे पति और उसकी माँ पर 25 लाख रुपये का गुज़ारा-भत्ता (एलिमनी) देने और विवाद सुलझाने के लिए दबाव डाला और उन्हें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत झूठे मामले दर्ज करने की धमकी दी। जज ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता महिला ने 2004 में पहली शादी की और 2007 में अपने पहले पति को छोड़ दिया, लेकिन उस शादी को कानूनी तौर पर खत्म नहीं करवाया। इसके बावजूद, मैट्रिमोनियल साइट पर मौजूदा याचिकाकर्ता के बेटे से मिलने के बाद उसने उससे शादी की और उस साइट पर खुद को 'अविवाहित और कुंवारी' बताया।
हालांकि, शिकायतकर्ता महिला का कहना था कि अपनी पहली शादी के समय वह नाबालिग थी, इसलिए उस शादी को वैध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस भोंसले ने कहा,
"शिकायतकर्ता पत्नी का व्यवहार और इस मामले का रिकॉर्ड साफ तौर पर उसकी बुरी नीयत को दिखाता है, क्योंकि कहा जाता है कि उसने अपने दूसरे पति और उसके परिवार से गुज़ारे-भत्ते (एलिमनी) के तौर पर 25 लाख रुपये की मांग की। इस मामले के तथ्यों और हालात को देखते हुए यह साफ़ है कि उसने यह FIR दर्ज कराकर कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया। अगर सही तथ्य रिकॉर्ड पर रखे जाते तो FIR दर्ज नहीं होती। याचिकाकर्ताओं ने FIR रद्द कराने के लिए CrPC की धारा 482 के तहत मामला बनाया। यह एक ऐसा मामला है, जिसमें कानूनी प्रक्रिया के गलत इस्तेमाल को रोकने और न्याय सुनिश्चित करने के लिए कार्यवाही रद्द करने की अपनी खास शक्तियों (inherent powers) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।"
इन बातों को ध्यान में रखते हुए जज ने दूसरे पति की सास, देवर/जेठ, ननद और दोस्त के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की।
Case Title: SSD vs State of Maharashtra (Criminal Writ Petition 2063 of 2017)