बहू को घरेलू हिंसा कानून के तहत मिली सुरक्षा खत्म करने के लिए सीनियर सिटिज़न एक्ट का हथियार की तरह प्रयोग नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने फैसला सुनाया कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत किसी सीनियर सिटीजन की अर्जी का इस्तेमाल अदालती आदेशों को नाकाम करने या कोर्ट के आदेश से सुरक्षित किसी पक्ष को परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अजीत बी. कदेथांकर ने अपनी बहू को घर से बेदखल करने की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए कहा,
"यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि ऐसे कल्याणकारी कानून [2007 का अधिनियम] के तहत कार्यवाही नेक नीयत, नेक इरादे और नेक मकसद से की जानी चाहिए।"
यह याचिका 2007 के अधिनियम के तहत पहली अथॉरिटी (सब-डिविजनल ऑफिसर) और अपीलीय अथॉरिटी (डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर) के आदेशों को चुनौती देते हुए दायर की गई। दोनों अथॉरिटी ने याचिकाकर्ता की उस अर्जी को खारिज किया था, जिसमें उसने अपनी बहू को घर से बेदखल करने की मांग की थी; बहू को मजिस्ट्रेट ने 'महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण (PWDV) अधिनियम, 2005' की धारा 12 के तहत कार्यवाही में पारित आदेश के अनुसार वहां रहने की अनुमति दी थी।
कोर्ट ने कहा,
"2007 के अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत दी गई सुरक्षा का इस्तेमाल हथियार के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए। इस संदर्भ में, 2007 के अधिनियम के तहत अधिकार पूरी तरह से असीमित नहीं है। इन प्रावधानों का इस्तेमाल सक्षम अदालतों द्वारा पारित आदेशों को नाकाम करने या किसी ऐसे पक्ष को परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता, जिसे किसी अन्य कानून के तहत अदालती आदेश से सुरक्षा मिली हो।"
कोर्ट ने पाया कि 70 वर्षीय याचिकाकर्ता द्वारा शुरू की गई कार्यवाही नेक नीयत से नहीं थी और इसे "कानून की उचित प्रक्रिया" नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने आगे कहा,
"ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता ने यह कार्यवाही अपनी बहू और दो नाबालिग पोतियों के दावों को नाकाम करने के लिए शुरू की। निश्चित रूप से, 2007 के अधिनियम का मकसद ऐसा करने की इजाज़त नहीं देता है।"
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की अर्ज़ी, जिसमें बहू को घर खाली करने और उसका कब्ज़ा उसे सौंपने का निर्देश देने की मांग की गई, वह "असल में प्रतिवादी नंबर 1 और उसकी नाबालिग बेटियों को सुरक्षा देने वाले अदालती आदेशों को दरकिनार करने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं थी।"
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज किया कि उसे अपनी बहू की धमकियों के कारण घर छोड़ना पड़ा था। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि शिरपुर में याचिकाकर्ता की एक से ज़्यादा प्रॉपर्टी हैं, और कहा कि किराए के घर में रहने जाने के लिए उसके "निजी कारण" सही नहीं है।
कोर्ट ने कहा,
"सिर्फ़ यह आरोप लगाना कि प्रतिवादी नंबर 1 की धमकियों के कारण याचिकाकर्ता को घर छोड़ना पड़ा, याचिकाकर्ता के किसी काम का नहीं है। साफ़ है कि यह एक मनगढ़ंत कहानी है।"
जस्टिस कदेथांकर ने एस. वनिता बनाम एम. वन्ननकुट्टी (2021) 15 SCC 730 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 2007 के एक्ट और 2005 के PWDV Act की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए कि दोनों में तालमेल बना रहे।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए सीनियर सिटिज़न एक्ट, 2007 के तहत आसान प्रक्रिया अपनाकर बेदखली का आदेश हासिल करके किसी महिला के साझा घर में रहने का आदेश पाने के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।"
याचिका को याचिकाकर्ता के बेटे के कहने पर दायर "प्रॉक्सी याचिका" मानते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की और याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का भारी जुर्माना लगाया। कोर्ट ने बहू को अपने और अपनी दो नाबालिग बेटियों के लिए वह रकम निकालने की इजाज़त दी।
Case: Devba Pauladsing Girase vs Kavita Himmatsing Girase & others