सिर्फ यह मान लेना कि आरोपी को जमानत मिल जाएगी, निवारक हिरासत का आधार नहीं हो सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर निवारक हिरासत का आदेश कायम नहीं रखा जा सकता कि आरोपी को जमानत मिल सकती है क्योंकि संबंधित अपराध में अनिवार्य रूप से मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसी संतुष्टि जांच से जुड़े ठोस तथ्यों और सामग्री पर आधारित होनी चाहिए।
जस्टिस रणजीतसिंहा राजा भोंसले और जस्टिस सारंग वी. कोतवाल की खंडपीठ पुणे के पुलिस आयुक्त की ओर से महाराष्ट्र खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम, 1981 के तहत जारी हिरासत आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि हिरासत आदेश में आरोपी की गतिविधियों और उसके खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर दो अलग-अलग आधार अपनाए गए। आदेश के दूसरे पैराग्राफ में उसकी पिछली गतिविधियों और दर्ज अपराधों के आधार पर उसे “खतरनाक व्यक्ति” मानने की संतुष्टि दर्ज की गई, जबकि आठवें पैराग्राफ में तीन हालिया मामलों और दो गुप्त बयानों के आधार पर यह संतुष्टि जताई गई।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि हिरासत प्राधिकारी को पता था कि अंतिम मामले में उसकी जमानत याचिका अभी लंबित थी। इसके बावजूद आदेश में कहा गया कि उसके जमानत पर रिहा होने की संभावना है, क्योंकि संबंधित अपराध में अनिवार्य रूप से मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है।
हाईकोर्ट ने माना कि हिरासत आदेश में परस्पर विरोधी आधार मौजूद थे। पीठ ने कहा कि दूसरे पैराग्राफ में पिछली गतिविधियों पर भरोसा किया गया, जबकि आठवें पैराग्राफ में तीन हालिया अपराधों और दो गुप्त बयानों को आधार बताया गया।
अदालत ने यह भी पाया कि दूसरे पैराग्राफ में हत्या के प्रयास के अपराध का उल्लेख किया गया, जबकि हिरासत के आधार में बताए गए किसी भी मामले में ऐसा अपराध दर्ज नहीं है।
खंडपीठ ने कहा,
“यह स्पष्ट रूप से सोच-विचार का अभाव है। इसके अलावा, हिरासत के आधार के दूसरे और आठवें पैराग्राफ में दर्ज परस्पर विरोधी रुख ने याचिकाकर्ता के प्रभावी और शुरुआती प्रतिवेदन देने के अधिकार को प्रभावित किया।”
अदालत ने यह भी पाया कि निवारक कार्रवाई के तहत दो वर्ष के बंधपत्र पर छोड़े जाने का आदेश हिरासत आदेश जारी होने के समय प्रभावी था। संबंधित अध्याय मामले को वापस लिए जाने की तारीख को लेकर भी अभिलेखों में विसंगतियां मिलीं।
हाईकोर्ट ने अपने पहले के अमन यूसुफ पठान उर्फ खान बनाम पुलिस आयुक्त और अमन शाकिर शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य मामलों के फैसलों पर भरोसा करते हुए कहा कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि अपराध में अनिवार्य मृत्युदंड का प्रावधान नहीं होने के कारण आरोपी को जमानत मिलने की संभावना है।
खंडपीठ ने कहा कि आरोपी के जमानत पर रिहा होने की संभावना के संबंध में हिरासत प्राधिकारी की संतुष्टि केवल इस अनुमान पर आधारित है कि संबंधित अपराध में अनिवार्य मृत्युदंड नहीं है। यह संतुष्टि जांच से संबंधित किसी ठोस सामग्री पर आधारित नहीं है।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने 6 दिसंबर 2025 को जारी हिरासत आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी जरूरत न हो।