बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि एक बार मजिस्ट्रेट किसी शिकायत का संज्ञान लेकर CrPC के Chapter XV के तहत कार्यवाही शुरू कर देता है, तो वह दोबारा संज्ञान-पूर्व चरण में वापस जाकर धारा 156(3) CrPC के तहत पुलिस जांच का आदेश नहीं दे सकता।

जस्टिस रणजीत सिंह राजा भोंसले ने एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। आवेदन में Judicial Magistrate First Class के आदेश और उस आदेश के आधार पर दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की गई थी। FIR में IPC की धाराओं 420, 406, 465, 467 और 34 के तहत आरोप लगाए गए थे।

जमीन की Power of Attorney से जुड़ा मामला

मामला जमीन से जुड़ी Power of Attorney को कथित तौर पर फर्जी तरीके से तैयार और उसमें हेरफेर करने तथा उसके आधार पर शिकायतकर्ता की जमीन ट्रांसफर करने के आरोपों से संबंधित था।

शिकायत मिलने के बाद मजिस्ट्रेट ने शिकायतकर्ता को धारा 200 CrPC के तहत अपना बयान और साक्ष्य पेश करने का निर्देश दिया। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने धारा 202 CrPC के तहत पुलिस से रिपोर्ट मांगी।

पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रथम दृष्टया कोई अपराध नहीं बनता। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट ने बाद में धारा 156(3) CrPC के तहत पुलिस को जांच करने का निर्देश दे दिया।

'संज्ञान के बाद संज्ञान-पूर्व चरण में वापस नहीं जा सकते'

हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 200 के तहत शिकायतकर्ता का साक्ष्य लेने और धारा 202 के तहत जांच/रिपोर्ट मंगाने के बाद धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देना CrPC की योजना और उद्देश्य के अनुरूप नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि धारा 202 CrPC का उद्देश्य यह पता लगाना है कि मामले में आगे कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद है या नहीं। वहीं, धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश उस चरण में दिया जाता है जब मजिस्ट्रेट पुलिस जांच की आवश्यकता महसूस करता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“जब धारा 202 CrPC के तहत संज्ञान लिया जा चुका हो, तब मजिस्ट्रेट के लिए संज्ञान-पूर्व चरण में वापस जाकर धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश देना स्वीकार्य नहीं होगा।”

अवैध आदेश के आधार पर FIR कायम नहीं रह सकती

हाईकोर्ट ने कहा कि 1 अक्टूबर 2016 का धारा 156(3) के तहत जांच का आदेश प्रक्रियात्मक रूप से अवैध था। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे अस्थिर या अवैध आदेश के आधार पर FIR दर्ज या कायम नहीं रखी जा सकती।

इसके बाद हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट का 1 अक्टूबर 2016 का आदेश रद्द कर दिया और उसके आधार पर दर्ज FIR को भी क्वैश कर दिया।

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