बॉम्बे हाईकोर्ट ने अरुण फरेरा की 2011 की गिरफ्तारी को अवैध करार दिया, 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया
महाराष्ट्र पुलिस को उसके आदर्श वाक्य 'सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय' (यानी सज्जनों की रक्षा करना और दुष्टों को दंडित करना) की याद दिलाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सितंबर 2011 में एक्टिविस्ट अरुण फरेरा की गिरफ्तारी "अवैध" थी। कोर्ट ने राज्य सरकार को उन्हें 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस राज वाकोडे की खंडपीठ ने मुआवजा देने का आदेश देते हुए कहा कि जब पुलिस ही कानून का उल्लंघन करती है तो समाज में भरोसा बनाए रखने के लिए सजा भी उतनी ही सख्त होनी चाहिए।
खंडपीठ ने कहा,
"जब पुलिसकर्मी, जिनकी मुख्य जिम्मेदारी कानून की रक्षा करना है, खुद ही कानून का उल्लंघन करते हैं तो ऐसी गलती के लिए सजा काफी सख्त होनी चाहिए ताकि इसका असर दिखे और समाज में भरोसा कायम हो सके। पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी कानून की रक्षा करना और उसे बनाए रखना है। यह याद दिलाना गलत नहीं होगा कि महाराष्ट्र राज्य पुलिस का आदर्श वाक्य 'सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय' (संस्कृत: सज्जनों की रक्षा करना और दुष्टों को दंडित करना) है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए। जो लोग आपराधिक कानून लागू करने का काम करते हैं, उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि उनकी जिम्मेदारी केवल अपने सामने मौजूद आरोपी के प्रति ही नहीं, बल्कि राज्य और पूरे समाज के प्रति भी है।"
27 अक्टूबर को दिए गए अपने आदेश में खंडपीठ ने राज्य सरकार को फरेरा को 2 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
जजों ने आदेश दिया,
"राज्य सरकार को आज से आठ सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को 2,00,000 रुपये (दो लाख रुपये) का मुआवजा देना होगा। मुआवजे की यह राशि इस कोर्ट में जमा की जानी चाहिए। अगर याचिकाकर्ता को दी गई मुआवजे की रकम से वह संतुष्ट नहीं है तो वह उचित अदालत में मुकदमा दायर कर सकता है।"
जज फरेरा की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। फरेरा ने बताया कि आठ आपराधिक मामलों से बरी होने के बाद 27 सितंबर 2011 को उन्हें जेल से रिहा किया गया। उसी दिन, जैसे ही वे जेल से बाहर निकले, उनके वकील, माँ और भाई उनका इंतज़ार कर रहे थे। तभी सादे कपड़ों में कुछ अधिकारी वहाँ आए, उन्हें उठाया और बिना नंबर वाली गाड़ी में बैठाकर ले गए। उन्होंने आरोप लगाया कि उनका "अपहरण" किया गया।
हालांकि, पुलिस का दावा था कि चूँकि उन्हें नक्सलवाद से जुड़े मामले में गिरफ़्तार किया गया, इसलिए "गोपनीयता" बनाए रखना ज़रूरी था। पुलिस का कहना था कि उन्होंने कानून के सभी ज़रूरी नियमों का पालन किया और उन्हें गिरफ़्तारी के कारणों आदि के बारे में बता दिया।
लेकिन जजों ने गौर किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि पुलिस ने फरेरा के परिवार या वहाँ मौजूद उनके वकीलों को गिरफ़्तारी के कारणों के बारे में बताया हो।
जजों ने कहा,
"यह माना जा सकता है कि जब याचिकाकर्ता जेल से बाहर आए तो पुलिस के पास उन्हें गिरफ़्तारी के कारण बताने के लिए काफ़ी समय था। उस समय उनके रिश्तेदार, माँ और भाई भी वहाँ मौजूद थे। लेकिन स्टेशन डायरी या जनरल डायरी में ऐसी कोई एंट्री नहीं है जिससे पता चले कि याचिकाकर्ता की माँ और भाई को यह बताया गया हो कि वे किस अपराध में शामिल थे या उन्हें किस वजह से हिरासत में लिया गया। इसके विपरीत, रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेज़ बताते हैं कि याचिकाकर्ता के वकील तुरंत धंतोली पुलिस स्टेशन गए और शिकायत दर्ज कराई, क्योंकि उन अधिकारियों ने वकील को अपनी पहचान नहीं बताई। भले ही यह मान लिया जाए कि आरोपी अपराध में शामिल था और गोपनीयता बनाए रखने के लिए बिना नंबर वाली गाड़ी का इस्तेमाल किया गया, फिर भी यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता को न तो किसी नक्सल-संबंधी गतिविधि के लिए ले जाया गया और न ही गोपनीयता बनाए रखने के मकसद से उस गाड़ी में ले जाया गया।"
इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने फरेरा की याचिका को मंज़ूरी दी।